भक्त प्रह्लाद
पाँच बरस का वह बालक, जिसकी बात सच करने के लिए भगवान खंभे से प्रकट हुए
संक्षेप में
प्रह्लाद दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पुत्र थे, और बचपन से ही भगवान विष्णु के भक्त। पिता ने उन्हें मारने के लिए शस्त्र, विष, साँप, हाथी, आग और समुद्र तक का सहारा लिया, पर प्रह्लाद ने हरि का नाम नहीं छोड़ा। श्रीमद्भागवत कहता है कि उनकी बात सच करने के लिए भगवान खंभे से नृसिंह रूप में प्रकट हुए।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.4.30–36; विष्णु पुराण, अंश 1–2 (Wilson अनु., vol. 2), Book I, ch. XVII, pp. 34–35 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.1.41–47; 7.4–7.10; विष्णु पुराण, अंश 1–2 (Wilson अनु., vol. 2), Book I, ch. XVI–XX, pp. 31–65 |
| पौत्र | राजा बलि | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 6.18.16 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, सातवाँ स्कंध
भागवत में यह कथा देवर्षि नारद राजा युधिष्ठिर को सुनाते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि माता-पिता तो बिगड़े हुए बेटे को भी सुधारने के लिए ही डाँटते हैं, फिर इस पिता ने ऐसे साधु पुत्र से इतना द्वेष क्यों किया कि उसे मार डालना चाहा। इसी प्रश्न के उत्तर में नारद चौथे से दसवें अध्याय तक प्रह्लाद की कथा कहते हैं।
विष्णु पुराण, पहला अंश
विष्णु पुराण में यही कथा पराशर मुनि मैत्रेय को सुनाते हैं। मैत्रेय ने सुना था कि प्रह्लाद को न आग जला सकी, न शस्त्र काट सके, न समुद्र डुबा सका; वे जानना चाहते हैं कि यह सब क्यों हुआ। उत्तर में सत्रहवें से बीसवें अध्याय तक कथा आती है।
दोनों ग्रंथों की कथा मोटे तौर पर एक है, पर कई बातों में अलग है: पहला उत्तर, मारने के उपायों की सूची, और सबसे बढ़कर अंत। इस पृष्ठ पर जहाँ दोनों अलग कहते हैं, वहाँ "ग्रंथों में अंतर" में दोनों रूप दिए गए हैं।
पृष्ठभूमि
माता-पिता और वंश
भागवत के अनुसार हिरण्यकशिपु की पत्नी का नाम कयाधु था, जो जम्भ नाम के दानव की बेटी थीं। उनके चार पुत्र हुए: संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्राद, यानी प्रह्लाद। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन हुए, और विरोचन के पुत्र राजा बलि।
भागवत यह भी कहता है कि हिरण्यकशिपु और उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष पिछले जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल थे। उन्होंने बालक-रूप सनकादि मुनियों को भीतर जाने से रोका, और मुनियों के शाप से असुर-योनि में जन्मे। हिरण्याक्ष को भगवान ने वराह रूप में मारा था, इसलिए हिरण्यकशिपु विष्णु को अपने भाई का हत्यारा मानता था।
हिरण्यकशिपु का वरदान
अजर-अमर बनने के लिए हिरण्यकशिपु ने मंदराचल की घाटी में कठोर तप किया: बाँहें ऊपर उठाए, आकाश की ओर देखते हुए, पैर के अँगूठे पर खड़े होकर। तप इतना लंबा चला कि उसकी देह पर दीमक की बाँबी और घास जम गई, और चींटियाँ मांस खा गईं।
ब्रह्मा प्रसन्न होकर आए, तो उसने वर माँगा कि उसकी मृत्यु ब्रह्मा के बनाए किसी प्राणी से न हो; न घर के भीतर, न बाहर; न दिन में, न रात में; न किसी अस्त्र से; न धरती पर, न आकाश में; न मनुष्य से, न पशु से। ब्रह्मा ने कहा कि ये वर दुर्लभ हैं, फिर भी दिए।
उसके अत्याचार से डरे देवता और लोकपाल भगवान की शरण गए। तब मेघ जैसी गंभीर एक निराकार वाणी हुई: जब यह अपने शांत, वैर-रहित पुत्र प्रह्लाद से द्रोह करेगा, तब वरदान के बल के बावजूद मैं इसे मारूँगा।
गर्भ में ही नारद का उपदेश
प्रह्लाद ख़ुद बताते हैं कि जब पिता तप के लिए मंदराचल गए थे, देवताओं ने दैत्यों पर चढ़ाई की, और इन्द्र उनकी माता को पकड़कर ले जाने लगे। रास्ते में देवर्षि नारद मिले। उन्होंने इन्द्र से कहा कि इसके गर्भ में भगवान का बड़ा भक्त है, तुम उसे नहीं मार सकोगे। इन्द्र ने माता को छोड़ दिया।
नारद माता को अपने आश्रम ले गए, और पिता के लौटने तक वे वहीं रहीं। उस समय नारद ने गर्भ में बैठे बालक को लक्ष्य करके धर्म और ज्ञान का उपदेश दिया। माता समय बीतने पर वह उपदेश भूल गईं, पर प्रह्लाद को वह याद रहा।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
भागवत प्रह्लाद को चार भाइयों में सबसे महान कहता है: ब्राह्मणों का आदर करने वाले, सच्चे, इंद्रियों को जीतने वाले, सबके लिए अपने जैसे प्रिय, बड़ों के आगे दास की तरह झुकने वाले और दीनों पर पिता जैसा स्नेह रखने वाले। विद्या, धन, रूप और कुल होते हुए भी उनमें घमंड नहीं था।
वासुदेव में उनका प्रेम स्वाभाविक था। बचपन में ही खिलौने छोड़कर वे भगवान में खोए रहते। कभी उनकी याद में रोते, कभी हँसते, कभी ऊँचे स्वर में गाते, कभी लाज छोड़कर नाचने लगते, और कभी रोमांचित होकर चुपचाप आँखें मूँदे बैठे रहते।
गुरुकुल में जब उनसे पूछा गया कि यह उलटी बुद्धि कहाँ से आई, तो प्रह्लाद बोले: जैसे लोहा चुम्बक के पास अपने-आप खिंचता है, वैसे ही मेरा मन चक्रपाणि भगवान की ओर खिंच जाता है। गुरु-पुत्र ने भी राजा से यही कहा कि यह मति न मेरी सिखाई है, न किसी और की; यह बालक का स्वभाव है।
प्रमुख कथाएँ
गुरुकुल से लौटा बालक: "सबसे अच्छी बात"
मूल ग्रंथ मेंप्रह्लाद को शुक्राचार्य के पुत्र शण्ड और अमर्क पढ़ाते थे। एक दिन हिरण्यकशिपु ने बेटे को गोद में बिठाया, उसका माथा सूँघा, और पूछा कि जो सबसे अच्छी बात सीखी हो, वह सुनाओ। प्रह्लाद ने भक्ति के नौ रूप गिना दिए: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।
यह सुनते ही पिता के होंठ क्रोध से फड़कने लगे। उसने बेटे को गोद से धरती पर पटक दिया और राक्षसों से कहा कि इसे मार डालो: यह मेरे भाई के हत्यारे विष्णु के पैर दास की तरह पूजता है, और पाँच बरस की उम्र में ही माँ-बाप का स्नेह छोड़ बैठा है।
ग्रंथों में अंतर
विष्णु पुराण में पहला उत्तर अलग है। वहाँ प्रह्लाद पिता से कहते हैं कि मैंने उसकी आराधना सीखी है, जिसका न आदि है, न मध्य, न अंत, जो सब कारणों का कारण है। क्रोधित राजा गुरु से पूछता है कि यह मेरे शत्रु की प्रशंसा तुमने सिखाई? गुरु कहते हैं, यह मैंने नहीं सिखाया।
मारने के उपाय, जो सब विफल हुए
मूल ग्रंथ मेंभागवत के अनुसार भयानक राक्षसों ने त्रिशूलों से बैठे हुए प्रह्लाद के मर्मस्थानों पर वार किए, पर वार ऐसे निष्फल हुए जैसे पापी के अच्छे काम। फिर पिता ने एक-एक कर उपाय किए: दिशाओं के हाथी, बड़े-बड़े साँप, मारण-प्रयोग, ऊँचाई से गिराना, माया, कैद, विष, भूखा रखना, बर्फ़, हवा, आग, पानी, और पहाड़ों से कुचलना। कोई उपाय निर्दोष बालक को मार न सका।
अंत में हिरण्यकशिपु गहरी चिंता में पड़ गया: यह बालक किसी से नहीं डरता, और लगता है कि इसी से वैर में मेरी मृत्यु होगी। गुरु-पुत्रों ने सलाह दी कि शुक्राचार्य के लौटने तक इसे वरुण के पाश में बाँधकर रखें।
ग्रंथों में अंतर
विष्णु पुराण में ये उपाय विस्तार से हैं। दानवों ने प्रह्लाद के चारों ओर लकड़ियों का बड़ा ढेर लगाकर आग लगाई, और राजा ने वायु को उसे भड़काने को कहा। प्रह्लाद बोले: पिताजी, यह आग मुझे नहीं जलाती; चारों ओर आकाश ठंडा और सुगंधित है, जैसे कमलों की सेज।
फिर रसोइयों ने उनके भोजन में विष मिलाया; प्रह्लाद अविनाशी भगवान का नाम लेते हुए खा गए और विष पच गया। उन्हें कई योजन ऊँचे महल से पहाड़ों पर फेंका गया, और धरती ने उन्हें अपनी गोद में थाम लिया। अंत में नाग-पाश में बाँधकर समुद्र में डाला गया, और ऊपर से चट्टानें लाद दी गईं।
असुर बालकों को उपदेश
मूल ग्रंथ मेंगुरु घर के कामों में लगे, तो साथी बालकों ने प्रह्लाद को खेलने बुलाया। प्रह्लाद ने उन्हें प्यार से पास बिठाया, और वे खिलौने छोड़कर सुनने लगे। उनकी पहली बात थी: समझदार को बचपन से ही भगवान का धर्म अपनाना चाहिए, क्योंकि मनुष्य का जन्म दुर्लभ है और कब छिन जाए, पता नहीं।
उन्होंने बालकों से यह भी कहा कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण, देवता या ऋषि होना काफ़ी नहीं; न आचरण, न बहुत पढ़ाई, न दान, न तप, न यज्ञ, न व्रत। हरि केवल निर्मल भक्ति से प्रसन्न होते हैं; दैत्य, यक्ष, राक्षस, स्त्रियाँ, शूद्र, व्रज के ग्वाले, पक्षी और पशु भी इसी से भगवान को पा चुके हैं।
खंभे से नृसिंह
मूल ग्रंथ मेंजब असुर बालक भी प्रह्लाद की बात मानने लगे, तो हिरण्यकशिपु तलवार लेकर उठा: तेरा वह जगदीश्वर कहाँ है? अगर वह सब जगह है, तो इस खंभे में क्यों नहीं दिखता? उसने खंभे पर मुक्का मारा। उसी क्षण एक भयानक गर्जना हुई, और अपने सेवक की बात सच करने के लिए भगवान खंभे से ऐसे रूप में प्रकट हुए जो न पशु का था, न मनुष्य का।
नृसिंह ने हिरण्यकशिपु को पकड़ा, सभा के द्वार पर अपनी जाँघों पर रखा, और नखों से उसका वक्ष चीर दिया।
ग्रंथों में अंतर
विष्णु पुराण में खंभे का प्रसंग नहीं है। वहाँ भगवान प्रह्लाद की स्तुति पर पीताम्बरधारी रूप में प्रकट होते हैं, वर देते हैं, और फिर पिता बेटे को गले लगाकर रो पड़ता है और पछताता है। नृसिंह का ज़िक्र केवल एक पंक्ति में है: जब नृसिंह-रूपी विष्णु ने पिता का अंत किया, तब प्रह्लाद दैत्यों के राजा बने।
वरदान, जो प्रह्लाद ने नहीं माँगे
मूल ग्रंथ मेंभगवान ने प्रह्लाद को मुँहमाँगा वर देना चाहा। प्रह्लाद ने कहा कि मुझे वरों का लालच मत दीजिए; जो सेवक स्वामी से अपने लिए कुछ माँगता है, वह सेवक नहीं, व्यापारी है। अगर वर देना ही है, तो यह दीजिए कि मेरे मन में कोई कामना उगे ही नहीं।
फिर उन्होंने अपने लिए नहीं, पिता के लिए माँगा: पिता ने आपकी निंदा की और आपके भक्त से द्रोह किया, उन्हें इस पाप से मुक्त कर दीजिए। भगवान ने कहा कि तुम्हारे जैसे पुत्र के कारण तुम्हारे पिता अपनी इक्कीस पीढ़ियों के साथ पवित्र हो गए।
भगवान के कहने पर प्रह्लाद ने पिता का अंतिम संस्कार किया, और ब्रह्मा ने उन्हें दैत्यों और दानवों का राजा बनाया। भगवान ने यह भी कहा कि तुम मेरे सब भक्तों के आदर्श हो।
ग्रंथों में अंतर
इस बात में दोनों ग्रंथ एक हैं कि प्रह्लाद ने पिता की क्षमा माँगी। विष्णु पुराण में उनका पहला वर है कि हज़ारों जन्मों में जहाँ भी जन्म लूँ, आपमें मेरी भक्ति अटल रहे; और दूसरा, कि शस्त्र, आग, साँप, विष, समुद्र और चट्टानों से मुझे मारने का जो पाप पिता ने किया, वह क्षमा हो।
होलिका की कथा
लोक-परंपराहोलिका-दहन के साथ प्रह्लाद की जो कथा सुनाई जाती है, जिसमें बुआ होलिका उन्हें गोद में लेकर आग में बैठती है, वह न श्रीमद्भागवत में मिली, न विष्णु पुराण में; दोनों के पाठ में होलिका का नाम ही नहीं आता। दोनों ग्रंथों में आग वाला प्रसंग है: भागवत में आग मारने के उपायों की सूची में है, और विष्णु पुराण में लकड़ियों का ढेर जलाया जाता है, जो प्रह्लाद को कमलों की सेज जैसा ठंडा लगता है।
भक्ति और शरणागति की सीख
नवधा भक्ति
भक्ति के जिन नौ रूपों को आज नवधा भक्ति कहा जाता है, उनकी सबसे प्रसिद्ध सूची प्रह्लाद के मुँह से है: सुनना, गाना, याद करना, चरणों की सेवा, पूजा, वंदना, दास का भाव, सखा का भाव, और अपने को सौंप देना। उनके अनुसार यह भक्ति भगवान को सीधे अर्पित हो, तो वही सबसे उत्तम पढ़ाई है।
भक्ति जन्म से नहीं मिलती
नृसिंह की स्तुति में प्रह्लाद कहते हैं कि धन, कुल, रूप, तप, विद्या, तेज और बल से भगवान प्रसन्न नहीं होते; गजेन्द्र से वे भक्ति के कारण प्रसन्न हुए थे। बारह गुणों वाला ब्राह्मण भी, अगर भगवान से विमुख है, तो उस चाण्डाल से छोटा है जिसने मन, वचन, कर्म और प्राण भगवान को अर्पित कर दिए; ऐसा भक्त अपने पूरे कुल को पवित्र करता है।
सबको साथ लेकर
प्रह्लाद कहते हैं कि मुझे संसार-सागर से डर नहीं, क्योंकि मेरा मन आपके गुण गाने के अमृत में डूबा है; मुझे दुःख उन लोगों का है जो आपसे विमुख होकर इंद्रियों के सुख का बोझ ढो रहे हैं। मुनि प्रायः अपनी मुक्ति के लिए एकांत में मौन रहते हैं, पर मैं इन दुखियों को छोड़कर अकेला मुक्त होना नहीं चाहता।
नाम का सहारा
विष्णु पुराण में हाथियों के दाँत टूट जाने पर प्रह्लाद पिता से कहते हैं कि यह मेरी शक्ति नहीं; जनार्दन का स्मरण ही ऐसी विपत्ति में मेरा कवच है। विष वाले भोजन को भी वे भगवान का नाम लेते हुए खा गए।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
चुम्बक और लोहा
यथा भ्राम्यत्ययो ब्रह्मन्स्वयमाकर्षसन्निधौ।
तथा मे भिद्यते चेतश्चक्रपाणेर्यदृच्छया॥हे ब्राह्मण, जैसे चुम्बक के पास लोहा अपने-आप घूमकर उसकी ओर खिंच जाता है, वैसे ही चक्रपाणि भगवान की इच्छा से मेरा मन अपने-आप उनकी ओर खिंच जाता है।
बचपन से ही
कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान्भागवतानिह।
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम्॥समझदार मनुष्य को बचपन से ही भगवान के धर्म का आचरण करना चाहिए। मनुष्य का जन्म दुर्लभ है, और वह परम लक्ष्य दे सकता है, पर टिकाऊ नहीं; कब छिन जाए, पता नहीं।
अकेले मुक्ति नहीं
प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्तिकामा
मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः।
नैतान्विहाय कृपणान्विमुमुक्ष एको
नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये॥हे देव, मुनि प्रायः अपनी मुक्ति चाहते हुए एकांत में मौन रहते हैं; दूसरों के हित में नहीं लगते। मैं इन दुखियों को छोड़कर अकेला मुक्त होना नहीं चाहता, और भटकते हुए इन जीवों के लिए आपके सिवा कोई शरण नहीं देखता।
सेवक और व्यापारी
नान्यथा तेऽखिलगुरो घटेत करुणात्मनः।
यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्॥हे जगद्गुरु, करुणामय होकर भी आप वर का लालच देते हैं, तो यह मेरी परीक्षा ही होगी। जो आपसे अपने लिए आशीर्वाद माँगता है, वह सेवक नहीं, व्यापारी है।
परंपरा में स्थान
भागवत में यमराज अपने दूतों को बारह लोगों के नाम बताते हैं, जो भगवान के गूढ़ धर्म को जानते हैं: ब्रह्मा, नारद, शिव, सनत्कुमार, कपिल, मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बलि, शुकदेव और स्वयं यम। प्रह्लाद और उनके पौत्र बलि, दोनों इस सूची में हैं।
दोनों ग्रंथ इस कथा को सुनने का फल भी बताते हैं। भागवत में भगवान कहते हैं कि जो प्रह्लाद की इस स्तुति का कीर्तन करे और समय पर उन्हें और मुझे याद करे, वह कर्म के बंधन से छूट जाता है। विष्णु पुराण कहता है कि जैसे हरि ने हर विपत्ति में प्रह्लाद की रक्षा की, वैसे ही वे इस कथा को सुनने वाले की रक्षा करते हैं।
संबंधित भक्त
- राजा बलि — पौत्र
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कथाएँ
- नृसिंह अवतार: खंभे से प्रकट हुए भगवान — हिरण्यकशिपु का वरदान, खंभे की चुनौती और सभा के द्वार पर वध — श्रीमद्भागवत से, विष्णु पुराण के अंतर के साथ
देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
भक्ति-पाठ
- श्री नृसिंह भगवान आरती — भगवान नृसिंह की परंपरागत आरती
ऋषि
- देवर्षि नारद — जिन्होंने गर्भ में प्रह्लाद को उपदेश दिया (भागवत 7.7)
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 6.3, 6.18, 7.1–7.10
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 7, पृ. 10–23 (scan leaf n339–n352)
- The Vishnu Purana, vol. 2 (Book I ch. XV – Book II) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1865) · Book I, ch. XVI–XX, pp. 31–65
