काकभुशुण्डि
नीलगिरि पर कौए के रूप में रहने वाले राम-भक्त, जिनसे गरुड़ ने रामकथा सुनी
संक्षेप में
काकभुशुण्डि रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड के एक राम-भक्त हैं, जो कौए के शरीर में सुमेरु के उत्तर में नील पर्वत पर रहकर हरि-भजन और रामकथा करते थे। राम ने उन्हें सिद्धियाँ, ऋद्धियाँ और मोक्ष तक देने को कहा, पर उन्होंने केवल राम की अविरल, विशुद्ध भक्ति माँगी। गरुड़ ने उन्हीं से रामकथा सुनकर अपना संदेह मिटाया।
श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), उत्तरकाण्ड, दोहा 56–58, पृ. 406 (scan leaf n416) |
| कथा किस ग्रंथ में | रामचरितमानस | रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), उत्तरकाण्ड, दोहा 56–58, पृ. 406 (scan leaf n416); रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), उत्तरकाण्ड, दोहा 83–85, पृ. 417 (scan leaf n429) |
कथा किन ग्रंथों में है
रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड
बाद के ग्रंथ मेंकाकभुशुण्डि केवल तुलसीदास के रामचरितमानस में हैं, वाल्मीकि रामायण में नहीं। उत्तरकाण्ड में शिव पार्वती को बताते हैं कि वे ख़ुद हंस का शरीर धरकर कुछ समय भुशुण्डि के पास रहे और उनसे रघुपति के गुण सुने; और फिर गरुड़ के भुशुण्डि के पास जाने की कथा कहते हैं।
पृष्ठभूमि
नीलगिरि पर निवास
बाद के ग्रंथ मेंशिव कहते हैं: सुमेरु के उत्तर में दूर एक सुंदर नील पर्वत है, जिसके चार सोने के शिखर हैं; उन पर बरगद, पीपल, पाकड़ और आम के बड़े पेड़ हैं, और ऊपर एक निर्मल सरोवर। उस पर्वत पर वह पक्षी रहता है, जिसका कल्प के अंत में भी नाश नहीं होता; माया से बने मोह और काम जैसे दोष उस पर्वत के पास भी नहीं जाते।
वहाँ भुशुण्डि पीपल के नीचे ध्यान करते, पाकड़ के नीचे जप, आम की छाया में मानस-पूजा, और बरगद के नीचे हरि-कथा कहते; हरि-भजन के सिवा उनका कोई काम नहीं था। अनेक पक्षी आकर प्रेम से वह रामकथा सुनते थे।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
भुशुण्डि की भक्ति वह है, जो सब कुछ मिलने पर भी केवल भक्ति माँगे। राम ने उनसे कहा: अणिमा आदि सिद्धियाँ, ऋद्धियाँ, मोक्ष, ज्ञान, विवेक, वैराग्य, देवताओं को भी दुर्लभ गुण, जो चाहो आज दूँगा। भुशुण्डि ने मन में सोचा: प्रभु ने सब सुख देने को कहा, पर अपनी भक्ति देने को नहीं कहा; भक्ति के बिना सब गुण और सुख वैसे हैं, जैसे बिना नमक के तरह-तरह के व्यंजन।
प्रमुख कथाएँ
गरुड़ का संदेह
बाद के ग्रंथ मेंलंका के युद्ध में जब मेघनाद ने राम को नागपाश में बाँधा, तो नारद ने गरुड़ को भेजा, और गरुड़ ने बंधन काट दिए। पर उनके मन में बड़ा संदेह उठा: जो सर्वव्यापी, माया-मोह से परे परमेश्वर हैं, जिनका नाम जपकर मनुष्य भव-बंधन से छूटते हैं, उन्हें एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश में बाँध लिया? यह कैसा अवतार?
इसी संदेह को मिटाने के लिए गरुड़ नील पर्वत पर काकभुशुण्डि के पास गए, और उनसे रामकथा सुनी।
अविरल भक्ति का वर
बाद के ग्रंथ मेंभुशुण्डि ने कहा: यदि प्रभु प्रसन्न होकर वर देते हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो मैं मन चाहा वर माँगता हूँ: आपकी वह अविरल, विशुद्ध भक्ति, जिसे वेद और पुराण गाते हैं, जिसे योगी और मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई-कोई ही पाता है; हे भक्तों के कल्पवृक्ष, कृपा करके वही अपनी भक्ति मुझे दीजिए।
राम ने "एवमस्तु" कहकर कहा: हे वायस, तुम स्वभाव से ही समझदार हो, ऐसा वर क्यों न माँगते? तुमने सब सुखों की खान भक्ति माँगी; संसार में तुम्हारे समान बड़भागी कोई नहीं। जो मुनि करोड़ों जतन से भी इसे नहीं पाते, वह तुमने माँगी; तुम्हारी चतुराई पर मैं रीझ गया। अब माया से उपजे भ्रम तुम्हें नहीं व्यापेंगे; मुझे भक्त सदा प्रिय हैं, इसलिए मन, वचन और कर्म से मेरे चरणों में अचल प्रेम रखो।
भक्ति और शरणागति की सीख
भक्ति ही सबसे बड़ा वर
बाद के ग्रंथ मेंभुशुण्डि की कथा में तुलसीदास बताते हैं कि मोक्ष, सिद्धि और ज्ञान से भी ऊपर भगवान की अविरल भक्ति है; और राम ख़ुद उसे माँगने वाले को सबसे बड़भागी कहते हैं।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
अविरल भक्ति की माँग
अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥आपकी वह अविरल और विशुद्ध भक्ति, जिसे वेद और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर और मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई-कोई ही पाता है; हे भक्तों के कल्पवृक्ष, शरणागत के हितैषी, कृपा के सागर, सुख के धाम राम, दया करके वही अपनी भक्ति मुझे दीजिए।
भक्ति बिना सब फीका
भगति हीन गुन सब सुख कैसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥भक्ति के बिना सारे गुण और सुख वैसे ही हैं, जैसे बिना नमक के तरह-तरह के व्यंजन।
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देवता
- श्री राम — भगवान राम के पाठ और आरती
संत
- गोस्वामी तुलसीदास — जिनके रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में भुशुण्डि की कथा है
स्रोत
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · उत्तरकाण्ड, दोहा 56–58, पृ. 406 (scan leaf n416)
- रामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास) — महावीरप्रसाद मालवीय (सं.), बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग (1926) · उत्तरकाण्ड, दोहा 83–85, पृ. 417 (scan leaf n429)
- वाल्मीकि रामायण — समीक्षित पाठ (Critical Edition, Oriental Institute, Baroda, 1960–75), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), John Smith (सं.) (2020) · पूरा पाठ (नाम की खोज: कोई प्रयोग नहीं)
