हनुमान जी

राम के दूत और सेवक, जिन्होंने माँगा कि जब तक धरती पर राम-कथा रहे, तब तक उनके प्राण रहें

संक्षेप में

हनुमान वायु के पुत्र और सुग्रीव के मंत्री थे, जो ऋष्यमूक पर्वत पर राम से पहली बार मिले और फिर जीवन भर उनके सेवक रहे। समुद्र लाँघकर सीता को खोजने वाले हनुमान को राम ने अपना सब कुछ मानकर गले लगाया; और अंत में हनुमान ने केवल यही माँगा कि जब तक धरती पर राम-कथा रहे, उनके प्राण बने रहें।

श्रीराम के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त

एक नज़र में

हनुमान जी — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीरामायण-महाभारत के भक्तवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 4.3.19–20; वाल्मीकि रामायण, दाक्षिणात्य पाठ, भाग 1 (कृष्णाचार्य सं.), किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 3, पृ. 328 (scan leaf n341)
कथा किस ग्रंथ मेंवाल्मीकि रामायण, रामचरितमानसवाल्मीकि रामायण (समीक्षित पाठ), 4.3–4.4; 5.34; 6.1; 6.116; 7.39; रामचरितमानस (बेलवेडियर, 1926), किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 1–3, पृ. 285 (scan leaf n297)

कथा किन ग्रंथों में है

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस

हनुमान वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड में पहली बार आते हैं, सुन्दरकाण्ड उन्हीं के समुद्र लाँघने और सीता की खोज की कथा है, युद्धकाण्ड में वे राम के सबसे बड़े सहायक हैं, और उत्तरकाण्ड में विदा के समय राम से वर पाते हैं। रामचरितमानस में भी यही क्रम है।

पृष्ठभूमि

कौन थे

राम से पहली भेंट में हनुमान ने ख़ुद अपना परिचय दिया: मैं वानरों के राजा सुग्रीव का भेजा हुआ हनुमान नाम का वानर हूँ, पवन का पुत्र और सुग्रीव का मंत्री। अपने भाई के सताए धर्मात्मा सुग्रीव आप दोनों से मित्रता चाहते हैं; उन्हीं का प्रिय करने मैं भिक्षु का रूप धरकर ऋष्यमूक से आया हूँ।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

हनुमान की भक्ति सेवक की है। सीता की खोज से लौटने पर राम ने कहा: हनुमान ने वह काम किया, जिसे कोई और मन से भी नहीं सोच सकता था; जो सेवक स्वामी का कठिन काम भी प्रेम से पूरा करे, वह उत्तम पुरुष है। इस प्रिय समाचार के बदले मैं इसका कोई उचित प्रिय नहीं कर पा रहा, यही मुझे खलता है; इसलिए यह आलिंगन ही, जो मेरा सर्वस्व है, मैं इस महात्मा को देता हूँ। और राम ने उन्हें गले लगा लिया।

उत्तरकाण्ड में विदा के समय हनुमान ने राम को प्रणाम करके कहा: राजन, आप में मेरा स्नेह सदा बना रहे, मेरी भक्ति अटल रहे, मेरा भाव कहीं और न जाए; और जब तक धरती पर राम-कथा सुनी जाती रहे, तब तक मेरे प्राण इस शरीर में रहें।

प्रमुख कथाएँ

राम से पहली भेंट

मूल ग्रंथ में

सुग्रीव के कहने पर हनुमान ऋष्यमूक से उतरकर, अपना रूप छोड़कर भिक्षु के रूप में राम और लक्ष्मण के पास गए, और मधुर वाणी में उनकी प्रशंसा करते हुए पूछा: देवताओं जैसे, वल्कल पहने, धनुष लिए आप दोनों कौन हैं, और इस वन में कैसे आए?

राम ने प्रसन्न होकर लक्ष्मण से कहा: यह सुग्रीव का मंत्री है, जिनसे मैं मिलना चाहता था, वही मेरे पास आया है; इससे मधुर वचनों में बात करो। लक्ष्मण ने राम की कथा कही, और हनुमान दोनों वीरों को सुग्रीव के पास ले गए।

ग्रंथों में अंतर

दक्षिण भारत की प्रतियों (कृष्णाचार्य संस्करण, 1905) में यहाँ दो बातें अधिक हैं, जो समीक्षित पाठ में नहीं: राम हनुमान की वाणी की बड़ी प्रशंसा करते हैं, कि जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद न सीखे हों, वह ऐसे नहीं बोल सकता, इसने निश्चय ही पूरा व्याकरण सुना है, इतना बोलकर भी एक शब्द ग़लत नहीं; और फिर हनुमान अपना वानर रूप धरकर दोनों भाइयों को पीठ पर बिठाकर ले जाते हैं।

मानस में पहली भेंट

बाद के ग्रंथ में

रामचरितमानस में ब्राह्मण के वेश में हनुमान राम से पूछते हैं: आप साँवले और गोरे शरीर वाले, क्षत्रिय रूप में वन में घूमने वाले कौन हैं? क्या आप तीनों देवों में से कोई हैं, या नर-नारायण? राम अपना परिचय देते हैं, और प्रभु को पहचानते ही हनुमान उनके चरण पकड़कर गिर पड़ते हैं; शिव कहते हैं कि उमा, उस सुख का वर्णन नहीं हो सकता।

हनुमान कहते हैं: मैंने पूछा तो ठीक, पर आप साधारण मनुष्य की तरह क्यों पूछ रहे हैं? आपकी माया से भटककर मैं प्रभु को पहचान न सका। सेवक तो स्वामी और माँ के भरोसे निश्चिंत रहता है, उसका पालन प्रभु ही करते हैं। तब राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगाया और आँसुओं से भिगोते हुए कहा: हे कपि, मन छोटा मत करो; तुम मुझे लक्ष्मण से भी दुगुने प्रिय हो।

सीता की खोज

मूल ग्रंथ में

समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे हनुमान ने अशोक-वाटिका में सीता को खोज निकाला, और उनका भरोसा पाने के लिए कहा: देवी, मैं बुद्धिमान राम का दूत, एक वानर हूँ; राम के नाम से अंकित यह अँगूठी देखिए। पति के हाथ का आभूषण पाकर सीता ऐसी प्रसन्न हुईं, मानो पति ही मिल गए हों, और बोलीं: वानरश्रेष्ठ, तुम वीर, समर्थ और बुद्धिमान हो, जो अकेले इस राक्षस-नगरी में आ पहुँचे।

लौटकर जब वानरों ने खुशी में सुग्रीव का मधुवन उजाड़ा, तो सुग्रीव ने उसी से जान लिया: सीता मिल गई हैं, वरना ये वन को छूने की हिम्मत न करते। और उन्होंने हनुमान आदि को तुरंत बुलवाया।

सीता का हार

मूल ग्रंथ में

राज्याभिषेक के बाद राम ने सबको भेंट दी, और सीता को एक अनुपम मोतियों का हार। सीता ने अपने गले से हार उतारा और कभी वानरों को, कभी पति को देखने लगीं। राम उनका मन समझ गए और बोले: हे सुभगे, जिसमें पौरुष, पराक्रम और बुद्धि सदा रहते हैं, और जिससे तुम प्रसन्न हो, उसे यह हार दे दो। सीता ने वह हार हनुमान को दिया, और हनुमान उससे ऐसे शोभित हुए, जैसे चाँदनी जैसे सफ़ेद बादल से पर्वत।

ग्रंथों में अंतर

सीना चीरकर हृदय में राम-सीता दिखाने की कथा लोक में बहुत प्रसिद्ध है, पर वाल्मीकि रामायण में नहीं है: वहाँ हार का प्रसंग हनुमान के हार पहनकर शोभित होने पर ही समाप्त हो जाता है। यह कथा बाद की लोक-परंपरा की है।

जब तक राम-कथा

मूल ग्रंथ में

विदा के समय हनुमान के यह माँगने पर कि जब तक धरती पर राम-कथा सुनी जाए, उनके प्राण रहें, राम आसन से उठे, उन्हें गले लगाया और कहा: कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा। जब तक लोक रहेंगे, मेरी कथा रहेगी, और तब तक तुम्हारे प्राण तुम्हारे शरीर में रहेंगे। फिर राम ने अपने गले से चंद्रमा जैसा हार उतारकर स्नेह से हनुमान के गले में बाँध दिया।

भक्ति और शरणागति की सीख

सेवक का धर्म

राम हनुमान को उत्तम सेवक का उदाहरण बताते हैं: जो स्वामी के सौंपे कठिन काम को प्रेम से पूरा करे, अपना मान भी न घटाए और स्वामी को भी प्रसन्न करे। हनुमान की भक्ति का फल भी यही था: उन्होंने मुक्ति नहीं माँगी, राम-कथा के साथ रहना माँगा।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

राम: यह आलिंगन मेरा सर्वस्व

एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥

इस घड़ी में मैं महात्मा हनुमान को यह आलिंगन देता हूँ, जो मेरा सर्वस्व है।

वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड, समीक्षित पाठ 6.1.12 (दाक्षिणात्य पाठ: सर्ग 1, श्लोक 13)

जब तक धरती पर राम-कथा

यावद्रामकथां वीर श्रोष्येऽहं पृथिवीतले। तावच्छरीरे वत्स्यन्तु मम प्राणा न संशयः॥

हे वीर, जब तक मैं इस धरती पर राम-कथा सुनता रहूँ, तब तक मेरे प्राण इस शरीर में रहें, इसमें संदेह न हो।

वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, समीक्षित पाठ 7.39.16

VedikMARG पर आगे पढ़ें

देवता

संत

स्रोत

हनुमान जी — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न