कुब्जा

मथुरा की कुबड़ी दासी, जिसकी चंदन की एक भेंट पर भगवान ने उसकी देह सीधी कर दी

संक्षेप में

कुब्जा मथुरा में कंस की चंदन-लेप बनाने वाली दासी थी, जिसका नाम भागवत में त्रिवक्रा है, क्योंकि उसकी देह तीन जगह से टेढ़ी थी। कृष्ण के माँगने पर उसने कंस के लिए बना उत्तम चंदन कृष्ण और बलराम को लगा दिया, और कृष्ण ने उसके पैर दबाकर, ठोड़ी उठाकर उसकी देह क्षण में सीधी कर दी।

श्रीकृष्ण के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

कुब्जा — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.42.1–3; श्रीमद्भागवत (कृष्णाचार्य सं., भाग 2, 1916), स्कंध 10, पृ. 83 (scan leaf n180)
कथा किस ग्रंथ मेंश्रीमद्भागवतश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 10.42.1–14; 10.48.1–11

कथा किन ग्रंथों में है

श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कंध

कुब्जा के दो प्रसंग श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में हैं: अध्याय 42 में, जब कृष्ण पहली बार मथुरा आते हैं, और अध्याय 48 में, जब कंस-वध के बाद वे उद्धव के साथ उसके घर जाते हैं।

पृष्ठभूमि

कौन थी

कृष्ण के पूछने पर उसने ख़ुद बताया: हे सुंदर, मैं कंस की प्रिय दासी हूँ, नाम त्रिवक्रा है, और अंगराग (चंदन-लेप) बनाने का काम करती हूँ; मेरा बनाया लेप भोजराज कंस को बहुत प्रिय है। "कुब्जा" (कुबड़ी) उसकी देह का वर्णन है, और भागवत उसे "सैरन्ध्री" यानी दासी भी कहता है।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

कुब्जा का भाव शुरू से ही कृष्ण के रूप पर रीझने का था: कृष्ण के रूप, मधुरता, मुस्कान, बातों और चितवन से मुग्ध होकर उसने राजा के लिए बना गाढ़ा लेप दोनों भाइयों को लगा दिया। भागवत कहता है कि भगवान उसी छोटी-सी सेवा, अंगराग के अर्पण से प्रसन्न हुए।

प्रमुख कथाएँ

चंदन की भेंट

मूल ग्रंथ में

मथुरा के राजमार्ग पर चलते हुए कृष्ण ने चंदन का पात्र लिए जाती एक सुंदर मुख वाली कुबड़ी युवती को देखा, और हँसकर पूछा: तुम कौन हो, यह लेप किसके लिए है? हमें यह उत्तम लेप दो, तुम्हारा जल्दी ही कल्याण होगा। उसने कहा: आप दोनों के सिवा इसके योग्य और कौन है? और दोनों भाइयों को गाढ़ा लेप लगा दिया।

प्रसन्न भगवान ने यह दिखाने के लिए कि उनके दर्शन का फल क्या होता है, उसे सीधा करने का मन बनाया। उन्होंने उसके पंजों पर अपने पैर रखे, दो उँगलियाँ ऊपर उठाए हाथ से उसकी ठोड़ी पकड़ी, और उसकी देह ऊपर उठा दी। मुकुंद के स्पर्श से वह क्षण में सीधी, सुडौल और सुंदर स्त्री बन गई।

तब उसने कृष्ण का दुपट्टा पकड़कर कहा: वीर, मेरे घर चलो, मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकती। बलराम और ग्वालों के सामने कृष्ण हँसकर बोले: अपना काम पूरा करके मैं तुम्हारे घर आऊँगा; हम बेघर राहगीरों का तुम्हीं सहारा हो। और मधुर बातों से उसे विदा किया।

त्रिवक्रा का घर

मूल ग्रंथ में

कंस-वध के बाद अपने वचन के अनुसार कृष्ण उद्धव को साथ लेकर त्रिवक्रा के घर गए। उसने सखियों सहित उठकर आदर से उनका स्वागत किया, और भागवत कहता है कि अंगराग अर्पण करने के उस छोटे-से पुण्य के कारण भगवान ने उसे अपना संग दिया।

पर भागवत यहीं एक बात साफ़ कहता है: मोक्ष देने वाले, जिन्हें पाना कठिन है, उन भगवान को पाकर भी उस अभागी ने केवल यही माँगा कि प्रिय, कुछ दिन मेरे साथ रहो। भगवान ने उसकी इच्छा का वर देकर उसका मान रखा और लौट गए। और शुकदेव जोड़ते हैं कि जो कठिनाई से मिलने वाले भगवान को पाकर भी केवल इन्द्रियों का सुख माँगता है, उसकी बुद्धि छोटी है।

भक्ति और शरणागति की सीख

छोटी सेवा, बड़ी कृपा, और सही माँग

कुब्जा की कथा दो बातें एक साथ कहती है। पहली, भगवान छोटी-सी सेवा भी नहीं भूलते: एक दासी के चंदन-लेप के बदले उन्होंने उसकी जीवन भर की टेढ़ी देह सीधी कर दी। दूसरी, भगवान के सामने क्या माँगा जाए, यह भी मायने रखता है; भागवत ख़ुद कहता है कि उन्हें पाकर इन्द्रिय-सुख माँगना कम बुद्धि है।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

दर्शन का फल

प्रसन्नो भगवान्कुब्जां त्रिवक्रां रुचिराननाम्। ऋज्वीं कर्तुं मनश्चक्रे दर्शयन्दर्शने फलम्॥

प्रसन्न भगवान ने यह दिखाने के लिए कि उनके दर्शन का फल क्या होता है, सुंदर मुख वाली, तीन जगह से टेढ़ी उस कुब्जा को सीधा करने का मन बनाया।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 42, श्लोक 6

भगवान से क्या माँगें

दुराराध्यं समाराध्य विष्णुं सर्वेश्वरेश्वरम्। यो वृणीते मनोग्राह्यमसत्त्वात्कुमनीष्यसौ॥

जिनकी आराधना कठिन है, सब ईश्वरों के ईश्वर उन भगवान विष्णु को प्रसन्न करके भी जो केवल मन को भाने वाला इन्द्रिय-सुख माँगता है, वह ओछेपन के कारण कम बुद्धि वाला है।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 48, श्लोक 11

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देवता

स्रोत

कुब्जा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न