जड़ भरत
राजा से हिरण और हिरण से ब्राह्मण: तीन जन्मों में भगवान को न भूलने वाले भरत
संक्षेप में
जड़ भरत ऋषभदेव के पुत्र राजर्षि भरत थे, जिनके नाम से यह देश भारत कहलाया। सब छोड़कर वन में तप करते हुए वे एक अनाथ हिरण के बच्चे के मोह में पड़े, और अगला जन्म हिरण का मिला। तीसरे जन्म में ब्राह्मण होकर वे संसार से बचने के लिए जड़ जैसे रहे, पर भगवान को कभी नहीं भूले।
भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | पुराण-कथा के भक्त | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 5.7.1–3; 5.14.42 |
| कथा किस ग्रंथ में | श्रीमद्भागवत | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 5.7–5.14 |
कथा किन ग्रंथों में है
श्रीमद्भागवत, पाँचवाँ स्कंध
भरत की कथा श्रीमद्भागवत के पाँचवें स्कंध, अध्याय 7 से 14 में है: अध्याय 7–8 में राजा भरत और हिरण, अध्याय 9 में ब्राह्मण-जन्म, और अध्याय 10–13 में राजा रहूगण से संवाद। भागवत "जड़ भरत" को नाम की तरह नहीं लिखता; यह परंपरा का नाम है, क्योंकि उस जन्म में उन्होंने ख़ुद को जड़ जैसा दिखाया।
पृष्ठभूमि
राजा भरत
भरत भगवान ऋषभदेव के पुत्र, महान भक्त राजा थे। भागवत कहता है कि इस वर्ष (देश) का नाम पहले अजनाभ था, और उनके समय से इसे भारत कहा जाने लगा। उन्होंने प्रजा का पिता-पितामह की तरह पालन किया, श्रद्धा से यज्ञ किए, और हर यज्ञ का फल भगवान वासुदेव को अर्पित किया।
लंबे राज्य के बाद उन्होंने पैतृक संपत्ति पुत्रों में बाँट दी और सारा वैभव छोड़कर पुलह ऋषि के आश्रम चले गए, जहाँ चक्रनदी बहती है। वहाँ अकेले फूल, तुलसी, जल और कंद-मूल-फल से भगवान की आराधना करते हुए उनका हृदय प्रेम से ऐसा पिघलता कि रोम खड़े हो जाते और आँसू बहने लगते।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
भरत की भक्ति की ख़ास बात यह है कि वह जन्मों में भी नहीं छूटी। हिरण की देह में भी उन्हें याद रहा कि वे क्यों हिरण बने; और भागवत कहता है कि हिरण की देह छोड़ते समय भी उन्होंने "नारायणाय हरये नमः" कहकर भगवान को प्रणाम किया।
रहूगण से उन्होंने ख़ुद कहा: मैं पहले भरत नाम का राजा था; सब बंधन छोड़कर भगवान की आराधना करते हुए हिरण के संग से हिरण बना। पर कृष्ण-पूजा से मिली वह स्मृति हिरण की देह में भी मुझे नहीं छोड़ती; इसलिए अब मैं लोगों के संग से डरता हुआ, बिना किसी को अपना भेद बताए घूमता हूँ।
प्रमुख कथाएँ
हिरण का मोह
मूल ग्रंथ मेंएक दिन भरत नदी में स्नान और नित्य-कर्म करके किनारे जप कर रहे थे। एक प्यासी गर्भवती हिरणी पानी पीने आई, तभी पास ही सिंह गरजा। डर से वह ऊँची छलाँग लगा बैठी, उसका बच्चा गर्भ से निकलकर नदी की धारा में गिर पड़ा, और हिरणी एक गुफा में गिरकर मर गई।
धारा में बहते उस असहाय बच्चे को देखकर भरत करुणा से भर गए, और बिना माँ के उस बच्चे को आश्रम ले आए। यह सोचकर कि यह मेरी शरण आया है और साधु दीन की रक्षा के लिए अपने बड़े स्वार्थ भी छोड़ देते हैं, वे उसके पालन-पोषण, लाड़-प्यार और चिंता में ऐसे लगे कि उठना, बैठना, सोना, नहाना, खाना, सब उसके साथ होने लगा, और उनके नियम, यम और भगवान की पूजा एक-एक कर छूटते गए।
वह बच्चा कहीं चला जाता, तो भरत धन खोए आदमी की तरह व्याकुल होकर उसकी राह देखते। इसी मोह में मृत्यु आ गई, और उस समय भी उनकी आँखें पास बैठे उस हिरण पर थीं, जैसे पुत्र पर; इसलिए अगला जन्म हिरण का मिला। पर पूजा के प्रभाव से उन्हें पिछला जन्म याद रहा, और उन्होंने पछताकर कहा: हाय, मैं आत्मज्ञानियों के मार्ग से गिर गया!
हिरण की देह में भी वे संग से डरते रहे। अपनी हिरणी माँ को छोड़कर वे फिर शालग्राम क्षेत्र, पुलस्त्य-पुलह के आश्रम लौट आए, सूखे पत्ते और घास खाकर समय की राह देखते रहे, और तीर्थ के जल में वह देह छोड़ दी।
ब्राह्मण-जन्म और भद्रकाली
मूल ग्रंथ मेंअगला जन्म अंगिरा गोत्र के एक गुणी ब्राह्मण के घर हुआ। भगवान की कृपा से पिछले जन्म याद थे, इसलिए संग के बंधन से डरकर उन्होंने ख़ुद को लोगों के सामने पागल, जड़, अंधे और बहरे जैसा दिखाया। पिता ने स्नेह से वेद पढ़ाने की बहुत कोशिश की, पर उन्होंने कुछ सीखा हुआ नहीं दिखाया।
माता-पिता के जाने के बाद भाइयों ने उन्हें मूर्ख मानकर पढ़ाना छोड़ दिया। लोग उन्हें पागल, जड़, गूँगा कहते; वे जो जैसा कहता, वैसा कर देते, और जो मिलता, थोड़ा या बहुत, स्वादिष्ट या रूखा, खा लेते। सर्दी-गर्मी, हवा-बारिश में खुले बदन, धूल से ढके, जैसे राख में छिपा रत्न। भाइयों ने उन्हें खेत की रखवाली पर लगा दिया।
एक रात एक दुष्ट सरदार के लोग भद्रकाली की बलि के लिए मनुष्य ढूँढ़ रहे थे। उनका पकड़ा आदमी भाग गया था, और खेत की रखवाली करते भरत उन्हें मिल गए। वे उन्हें बाँधकर चंडिका के मंदिर ले गए, नहलाया, सजाया, और सरदार ने बलि के लिए तलवार उठा ली। उस निर्वैर, सबके हितैषी ब्रह्मज्ञानी पर यह अत्याचार देखकर देवी भद्रकाली ख़ुद मूर्ति से प्रकट हुईं और उसी तलवार से उन दुष्टों का अंत कर दिया।
शुकदेव कहते हैं कि इसमें कोई अचरज नहीं: जिन्होंने देह का अभिमान छोड़ दिया है, जो सबके मित्र और निर्वैर हैं, जो भगवान के चरणों की शरण में हैं, उनकी रक्षा भगवान का चक्र हर रूप में करता है; अपना सिर कटने की घड़ी में भी वे घबराते नहीं।
राजा रहूगण की पालकी
मूल ग्रंथ मेंसिंधु-सौवीर के राजा रहूगण इक्षुमती नदी के किनारे जा रहे थे, और पालकी उठाने वालों को एक और आदमी चाहिए था। हट्टे-कट्टे भरत को देखकर उन्हें बेगार में पकड़ लिया गया। भरत एक बाण-भर आगे ज़मीन देखते हुए चलते थे, इसलिए उनकी चाल बाकी कहारों से नहीं मिली और पालकी हिचकोले खाने लगी।
राजा ने पहले व्यंग्य किया: अरे भाई, तुम अकेले बहुत दूर से ढो रहे हो, थक गए होगे, न तुम मोटे हो, न बलवान! फिर पालकी फिर से डगमगाई, तो क्रोध में बोले: तू जीते-जी मरे जैसा है, मालिक का हुक्म नहीं मानता; मैं तेरा इलाज करता हूँ।
भरत मुस्कुराकर बोले: तुमने ठीक कहा, यदि बोझ मेरा होता और रास्ता मुझे तय करना होता। मोटा-पतला होना, रोग, भूख-प्यास, भय, क्रोध और मद देह के होते हैं, मेरे नहीं। मालिक-नौकर का संबंध भी कुछ समय का है। फिर भी कहो, तुम्हारा क्या करूँ? मुझ जड़ जैसे को सिखाना पिसे को पीसना है। और यह कहकर वे फिर पालकी उठाकर चल दिए।
यह सुनकर रहूगण का अभिमान टूटा। वे तुरंत पालकी से उतरे, भरत के चरणों में सिर रखकर क्षमा माँगी और बोले: आप कौन हैं, जो जनेऊ पहने छिपे घूमते हैं? मैं इन्द्र के वज्र, शिव के त्रिशूल और यम के दंड से नहीं डरता, पर ब्राह्मण के अपमान से बहुत डरता हूँ। मुझ पर मैत्री की दृष्टि कीजिए, ताकि संत के अपमान के पाप से तर जाऊँ।
भरत ने रहूगण को आत्मज्ञान का उपदेश दिया, और कहा कि यह परम सत्य न तप से मिलता है, न यज्ञ से, न घर छोड़ने से, न वेद-पाठ से; महात्माओं के चरणों की धूल में स्नान किए बिना नहीं मिलता। रहूगण ने प्रणाम किया और देह को ही "मैं" मानने का भ्रम छोड़ दिया; और भरत, भरे हुए समुद्र की तरह शांत, फिर पृथ्वी पर विचरने लगे।
भक्ति और शरणागति की सीख
भक्त का मोह भी सावधानी माँगता है
भरत ने राज्य, पत्नी और पुत्र, सब युवावस्था में ही छोड़ दिए थे, पर एक हिरण के बच्चे की ममता ने उनकी साधना रोक दी। कथा दिखाती है कि करुणा अच्छी है, पर मोह बनकर वह भगवान से मन हटा देती है; और यह भी कि सच्ची भक्ति की स्मृति जन्म बदलने पर भी नहीं मिटती।
भरत ख़ुद यही सार बताते हैं: संग छोड़कर और सत्संग से मिले ज्ञान की तलवार से मोह काटकर, भगवान की लीला सुनने और कहने से स्मृति पाकर, मनुष्य संसार के रास्ते के पार पहुँचता है।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
महात्माओं की चरण-धूल
रहूगणैतत्तपसा न याति
न चेज्यया निर्वपणाद्गृहाद्वा।
न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै-
र्विना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥हे रहूगण, यह परम सत्य न तप से मिलता है, न यज्ञ से, न दान से, न घर छोड़ने से, न वेद-पाठ से, न जल, अग्नि और सूर्य की उपासना से; महात्माओं के चरणों की धूल में स्नान किए बिना यह नहीं मिलता।
मैं पहले भरत नाम का राजा था
अहं पुरा भरतो नाम राजा
विमुक्तदृष्टश्रुतसङ्गबन्धः।
आराधनं भगवत ईहमानो
मृगोऽभवं मृगसङ्गाद्धतार्थः॥मैं पहले भरत नाम का राजा था; देखे और सुने, सब सुखों के बंधन छोड़कर भगवान की आराधना में लगा था, पर एक हिरण के संग से मेरा लक्ष्य छूट गया और मैं हिरण बना।
परंपरा में स्थान
भागवत में भरत की प्रशंसा का गीत है: जिन्होंने युवावस्था में ही पत्नी, पुत्र, मित्र और राज्य को मैल की तरह छोड़ दिया, उन राजर्षि भरत के मार्ग पर कोई राजा मन से भी नहीं चल सकता, जैसे मक्खी गरुड़ के पीछे नहीं उड़ सकती।
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देवता
- श्री विष्णु — भगवान विष्णु के पाठ और आरती
स्रोत
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 5.7–5.14
- श्रीमद्भागवतम्, श्रीधरी टीका सहित, भाग 1 (स्कंध 1–7) — टी. आर. कृष्णाचार्य (प्रकाशक), कुम्भकोणम् (1916) · स्कंध 5, पृ. 23 (scan leaf n256)
