गरुड़

विनता के पुत्र, जो माँ को दासता से छुड़ाने अमृत लाए, उसे पिया नहीं, और भगवान विष्णु के वाहन बने

संक्षेप में

गरुड़ विनता के पुत्र, पक्षियों के राजा हैं। अपनी माँ को उनकी बहन कद्रू की दासता से छुड़ाने के लिए वे देवताओं से अमृत छीन लाए, पर ख़ुद उसे पिया नहीं। उनके इसी निर्लोभ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वर दिया, और बदले में उन्हें अपना वाहन बनाया और अपने ध्वज पर स्थान दिया।

भगवान विष्णु के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

गरुड़ — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तमहाभारत (समीक्षित पाठ), 1.23.8–9; 1.29.12–16; महाभारत, दाक्षिणात्य पाठ, आदिपर्व (कृष्णाचार्य सं.), आदिपर्व (आस्तीकपर्व), अध्याय 33, पृ. 66 (scan leaf n74)
कथा किस ग्रंथ मेंमहाभारतमहाभारत (समीक्षित पाठ), 1.23; 1.29; 1.30

कथा किन ग्रंथों में है

महाभारत, आदिपर्व

गरुड़ की कथा महाभारत के आदिपर्व के आस्तीकपर्व नाम के भाग में है, जहाँ उनके अमृत लाने और भगवान विष्णु से मिलने की कथा है।

पृष्ठभूमि

माँ की दासता

नागों को ढोते हुए गरुड़ ने एक दिन माँ विनता से पूछा कि मुझे इन साँपों की बात क्यों माननी पड़ती है? विनता ने बताया: एक झूठी शर्त में सर्पों के छल से मैं अपनी नीच बहन (कद्रू) की दासी बन गई हूँ। गरुड़ ने दुखी होकर नागों से पूछा: क्या लाऊँ, क्या करूँ कि तुम्हारी दासता से छूटूँ? नागों ने कहा: अपने बल से अमृत ले आओ, तब छूटोगे।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

गरुड़ ने अमृत की रक्षा का यंत्र तोड़कर अमृत उठा लिया, पर ख़ुद उसे पिया नहीं। भगवान नारायण उनके इसी निर्लोभ कर्म से प्रसन्न हुए; दाक्षिणात्य पाठ के टीकाकार लिखते हैं: "अलौल्येन", यानी अमृत पीने के लोभ के बिना।

प्रमुख कथाएँ

विष्णु से भेंट

मूल ग्रंथ में

अमृत लेकर लौटते गरुड़ आकाश में भगवान विष्णु से मिले। प्रसन्न विष्णु ने कहा: मैं वर देता हूँ। गरुड़ ने माँगा: मैं आपसे ऊपर रहूँ, और अमृत पिए बिना भी अजर-अमर रहूँ।

दोनों वर पाकर गरुड़ बोले: अब मैं भी आपको वर देता हूँ, भगवान भी कुछ माँगें। भगवान ने महाबली गरुड़ को अपना वाहन माँग लिया, और उन्हें अपने ध्वज पर स्थान दिया, यह कहकर कि तुम मेरे ऊपर रहोगे। इस तरह गरुड़ का पहला वर भी पूरा हुआ और भगवान का वर भी।

माँ की मुक्ति

मूल ग्रंथ में

रास्ते में इन्द्र ने वज्र मारा, तो गरुड़ ने हँसकर कहा: जिस ऋषि की हड्डी से वज्र बना, उनके और वज्र के सम्मान में मैं अपना एक पंख गिरा देता हूँ; वैसे मुझे वज्र से पीड़ा नहीं होती। इन्द्र ने उनसे मित्रता की, और गरुड़ ने वचन दिया कि वे अमृत जहाँ रखेंगे, वहाँ से इन्द्र उसे वापस ले जा सकते हैं।

गरुड़ ने अमृत कुशा पर रखकर नागों से कहा: स्नान करके इसे पीओ; और आज से मेरी माँ दासी नहीं। नाग नहाने गए, तब तक इन्द्र अमृत ले गए। विनता दासता से छूटीं, और गरुड़ माँ के साथ वन में आनंद से रहे।

भक्ति और शरणागति की सीख

लोभ के बिना कर्म

गरुड़ अमृत अपने लिए नहीं, माँ के लिए लाए थे, और उसे पिया तक नहीं। भगवान उनके इसी निर्लोभ पर प्रसन्न हुए, और अमृत पिए बिना ही उन्हें अमरता दी। सेवा के फल की इच्छा छोड़ने वाले को भगवान ख़ुद अपना बना लेते हैं: गरुड़ भगवान के वाहन भी बने और ध्वज भी।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

भगवान ने गरुड़ को वाहन माँगा

तं वव्रे वाहनं विष्णुर्गरुत्मन्तं महाबलम्। ध्वजं च चक्रे भगवानुपरि स्थास्यसीति तम्॥

भगवान विष्णु ने महाबली गरुड़ को अपना वाहन माँगा, और यह कहकर उन्हें अपना ध्वज बनाया कि तुम मेरे ऊपर रहोगे।

महाभारत, आदिपर्व: दाक्षिणात्य पाठ, अध्याय 33, श्लोक 17 (समीक्षित पाठ 1.29.16 में "तं वव्रे वाहनं कृष्णः")

निर्लोभ से प्रसन्न नारायण

विष्णुना तु तदाकाशे वैनतेयः समेयिवान्। तस्य नारायणस्तुष्टस्तेनालौल्येन कर्मणा॥

तब आकाश में वैनतेय (गरुड़) भगवान विष्णु से मिले; और नारायण उनके उस निर्लोभ कर्म से प्रसन्न हुए।

महाभारत, आदिपर्व, समीक्षित पाठ 1.29.12 (दाक्षिणात्य पाठ: अध्याय 33, श्लोक 12–13)

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देवता

स्रोत

गरुड़ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न