राजा सुरथ और समाधि वैश्य

राज्य खोया राजा और घर से निकाला गया वैश्य, जिन्हें मेधा ऋषि ने देवी-माहात्म्य सुनाया

संक्षेप में

राजा सुरथ और समाधि वैश्य वे दो दुखी लोग हैं जिन्हें मेधा ऋषि ने दुर्गा सप्तशती की कथा सुनाई। एक का राज्य छिना था, दूसरे को अपने ही बेटों और पत्नी ने घर से निकाला था, फिर भी मन उन्हीं में अटका था। तीन वर्ष के तप पर देवी ने राजा को राज्य दिया, वैश्य को ज्ञान।

देवी के भक्तपुराण-कथा के भक्त

एक नज़र में

राजा सुरथ और समाधि वैश्य — एक नज़र में
बातविवरणस्रोत
श्रेणीपुराण-कथा के भक्तमार्कण्डेय महापुराण (वेंकटेश्वर प्रेस, बंबई), अध्याय 78, folio 80 (scan leaf n169), श्लोक 3–4; मार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Canto LXXXI, पृ. 466, श्लोक 3–4
कथा किस ग्रंथ मेंमार्कण्डेय पुराणमार्कण्डेय महापुराण (वेंकटेश्वर प्रेस, बंबई), अध्याय 90, folio 151 (scan leaf n311), श्लोक 17 और कोलोफ़ॉन; मार्कण्डेय पुराण (Pargiter अनु.), Canto XCIII, पृ. 522, श्लोक 1–6

कथा किन ग्रंथों में है

मार्कण्डेय पुराण, देवी-माहात्म्य

यह कथा मार्कण्डेय पुराण के उस भाग में है जिसे देवी-माहात्म्य, या दुर्गा सप्तशती, कहते हैं। सप्तशती का पहला अध्याय सुरथ और समाधि के मिलने और उनके प्रश्न से शुरू होता है, और तेरहवाँ अध्याय उनके तप और वरदान पर पूरा होता है। बीच के अध्याय वही कथा हैं जो मेधा ऋषि ने उन्हें सुनाई।

कथा मार्कण्डेय मुनि सुनाते हैं, यह बताने के लिए कि आठवें मनु सावर्णि का जन्म कैसे हुआ: महामाया की कृपा से ही वे मन्वन्तर के स्वामी बने।

पृष्ठभूमि

राजा सुरथ

स्वारोचिष मन्वन्तर में चैत्र वंश के राजा सुरथ सारी पृथ्वी पर राज करते थे, और प्रजा को अपनी संतान की तरह पालते थे। शत्रु राजाओं से युद्ध में वे हार गए और अपने नगर लौट आए; वहाँ उनके ही बलवान और दुष्ट मंत्रियों ने उनका ख़ज़ाना और सेना छीन ली।

सब छिन जाने पर राजा शिकार के बहाने अकेले घोड़े पर घने वन में चले गए। वहाँ उन्होंने मेधा ऋषि का आश्रम देखा, जहाँ हिंसक पशु भी शांत रहते थे, और मुनि के सत्कार से कुछ समय वहीं रहे। पर मन चैन से न था: मेरा नगर धर्म से चल रहा है या नहीं, मेरा हाथी शत्रु के पास कैसा होगा, मेरे सेवक अब किसकी सेवा करते होंगे, बड़े कष्ट से जोड़ा ख़ज़ाना ख़र्च हो जाएगा।

समाधि वैश्य

आश्रम के पास राजा को एक उदास वैश्य मिला। पूछने पर उसने बताया: मेरा नाम समाधि है, धनी कुल में जन्मा हूँ; धन के लोभ में मेरे दुष्ट बेटों और पत्नी ने मुझे निकाल दिया और मेरा धन ले लिया। फिर भी वह यही पूछता रहा कि घर में सब कुशल हैं या नहीं, मेरे बेटे अच्छे रास्ते पर हैं या बुरे।

राजा ने पूछा: जिन्होंने तुम्हें निकाला, उन्हीं से इतना मोह क्यों? समाधि बोला: यही तो मैं भी सोचता हूँ। जानता हूँ, फिर भी मन उनके प्रति कठोर नहीं होता; गुणहीन बंधुओं की ओर भी झुक जाता है, और उनके लिए आहें निकलती हैं।

भगवान से संबंध और भक्ति-भाव

दोनों का दुख एक था: जानते हुए भी मोह। मेधा ऋषि ने इसे महामाया का प्रभाव बताया, और यह भी कि वही देवी प्रसन्न होकर मुक्ति का वर देती हैं। इसलिए ऋषि का अंतिम उपदेश था: उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ। दोनों ने यही किया, और उनकी भक्ति का रूप तप और पूजा बना।

प्रमुख कथाएँ

मेधा ऋषि का उत्तर

मूल ग्रंथ में

दोनों मुनि के पास गए। राजा ने पूछा: मेरा राज्य गया, फिर भी उसकी ममता मुझे दुख देती है; इस वैश्य को घरवालों ने त्याग दिया, फिर भी यह उन्हीं के स्नेह में है। हम दोनों दोष देखते हैं, जानते हैं, फिर भी यह मोह क्यों?

ऋषि ने कहा: विषयों का ज्ञान तो हर प्राणी को है। इन पक्षियों को देखो, ख़ुद भूखे हैं, फिर भी मोह के कारण बच्चों की चोंच में दाना डालते हैं। संसार को टिकाए रखने वाली महामाया ज्ञानियों का मन भी बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है। वही प्रसन्न होने पर मुक्ति का वर देती हैं; वही संसार के बंधन का कारण हैं और वही मुक्ति का भी।

राजा ने पूछा: वह देवी कौन हैं, कैसे प्रकट हुईं? तब ऋषि ने उन्हें देवी की तीनों कथाएँ सुनाईं: मधु-कैटभ, महिषासुर और शुंभ-निशुंभ। सप्तशती के बाकी अध्याय यही कथा हैं।

ग्रंथों में अंतर

मुनि का नाम: साइट के सप्तशती पाठ और Pargiter के अनुवाद में "मेधस्" ("द्विजवर्यस्य मेधसः"), जबकि वेंकटेश्वर प्रेस की प्रति "द्विजवर्यः सुमेधसः" पढ़ती है, और उसकी टीका भी "सुमेधस् नाम के मुनि" कहती है। लोक में वे "मेधा ऋषि" कहलाते हैं।

नदी-तट पर तप और वरदान

मूल ग्रंथ में

कथा पूरी करके ऋषि बोले: इसी देवी से तुम, यह वैश्य और दूसरे विवेकी भी मोहित होते हैं; महाराज, उन्हीं परमेश्वरी की शरण जाओ। राजा ने ऋषि को प्रणाम किया, और ममता और राज्य छिनने से विरक्त होकर तुरंत तप करने चल दिए; देवी के दर्शन के लिए वैश्य भी साथ गया।

नदी के रेतीले तट पर दोनों ने देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाई, और फूल, धूप, हवन और जल से उनकी पूजा की; वैश्य देवी-सूक्त जपता रहा। आहार त्यागकर, मन देवी में लगाकर उन्होंने अपने शरीर के रक्त से सींची बलि तक दी। तीन वर्ष ऐसे बीते, तब जगत को धारण करने वाली चण्डिका प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष हुईं और बोलीं: जो माँगना है माँगो।

राजा ने अगले जन्म में कभी न छिनने वाला राज्य माँगा, और इसी जन्म में शत्रुओं को हराकर अपना राज्य। वैश्य का मन तो संसार से उठ चुका था; उसने "मेरा" और "मैं" के बंधन को काटने वाला ज्ञान माँगा।

देवी ने कहा: राजन, थोड़े ही दिनों में शत्रुओं को मारकर तुम अपना राज्य पाओगे और वह अटल रहेगा; देह छूटने पर सूर्य देव से जन्म लेकर तुम सावर्णि नाम के मनु बनोगे। और हे वैश्यश्रेष्ठ, तुम्हें वह ज्ञान मिलेगा जो पूर्ण सिद्धि तक ले जाता है। यह वर देकर देवी अंतर्धान हो गईं।

ग्रंथों में अंतर

तप में आहार: वेंकटेश्वर प्रति में "निराहारौ" (बिना आहार के), गीता प्रेस के पाठ में "यताहारौ" (संयमित आहार)। Pargiter दोनों अर्थ एक साथ देते हैं।

भक्ति और शरणागति की सीख

एक ही देवी, दो अलग वर

दोनों ने एक साथ, एक ही तट पर, एक ही देवी की पूजा की, पर माँगा अलग-अलग। राजा ने राज्य माँगा, वैश्य ने ममता से छूटने का ज्ञान, और देवी ने दोनों को वही दिया जो उन्होंने माँगा। ऋषि पहले ही कह चुके थे कि आराधना करने पर यही देवी भोग, स्वर्ग और मोक्ष तीनों देती हैं।

मोह अज्ञान से ही नहीं आता: सुरथ और समाधि दोनों जानते थे कि जिनके लिए वे दुखी हैं, वे उनके नहीं रहे, फिर भी मन नहीं माना। ऋषि का उत्तर यह नहीं था कि और सोचो, बल्कि यह कि जिस शक्ति का यह मोह है, उसी की शरण लो।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

ज्ञानियों का मन भी

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥

वे भगवती महामाया ज्ञानियों के मन को भी बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं।

दुर्गा सप्तशती 1.55–56, मेधा ऋषि का उत्तर (मार्कण्डेय पुराण, बंबई सं. अध्याय 78, श्लोक 42)

शरण का उपदेश

तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम्। आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा॥

महाराज, उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ। आराधना करने पर वही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष देती हैं।

दुर्गा सप्तशती 13.4–5 (मार्कण्डेय पुराण, बंबई सं. अध्याय 90, श्लोक 3)

वैश्य का वर

सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः। ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम्॥

तब संसार से विरक्त मन वाले उस बुद्धिमान वैश्य ने वह ज्ञान माँगा जो "मेरा" और "मैं" की आसक्ति को काट देता है।

दुर्गा सप्तशती 13.18 (मार्कण्डेय पुराण, बंबई सं. अध्याय 90, श्लोक 12)

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स्रोत

राजा सुरथ और समाधि वैश्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न