अर्जुन
कृष्ण के सखा, जिन्होंने सेना के बदले निःशस्त्र कृष्ण को चुना, और विश्वरूप देखकर सखा-भाव के लिए क्षमा माँगी
संक्षेप में
अर्जुन कुंती के पुत्र, पांडव और श्रीकृष्ण के प्रिय सखा थे। युद्ध से पहले उन्होंने कृष्ण की लाखों योद्धाओं वाली सेना के बदले न लड़ने वाले अकेले कृष्ण को चुना। गीता में विश्वरूप देखकर उन्होंने उनसे क्षमा माँगी कि अनजाने में "हे कृष्ण, हे सखा" कहकर बराबरी का बर्ताव किया।
श्रीकृष्ण के भक्तरामायण-महाभारत के भक्त
एक नज़र में
| बात | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| श्रेणी | रामायण-महाभारत के भक्त | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.7.4, 19; महाभारत, दाक्षिणात्य पाठ, उद्योगपर्व (कृष्णाचार्य सं.), उद्योगपर्व, अध्याय 7, पृ. 8 (scan leaf n16) |
| कथा किस ग्रंथ में | महाभारत | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.7; 6.33; 6.40; 6.55 |
| माता | कुंती | महाभारत (समीक्षित पाठ), 5.7.19 |
| पौत्र | राजा परीक्षित | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 9.22.32–33 |
कथा किन ग्रंथों में है
महाभारत और भगवद्गीता
अर्जुन महाभारत के मुख्य नायकों में हैं। कृष्ण को अपनी ओर चुनने की कथा उद्योगपर्व में है, और भगवद्गीता, जो भीष्मपर्व का ही हिस्सा है, कृष्ण और अर्जुन का संवाद है।
पृष्ठभूमि
कृष्ण को चुनना
युद्ध से पहले सहायता माँगने दुर्योधन और अर्जुन एक ही दिन द्वारका पहुँचे। कृष्ण सो रहे थे; दुर्योधन उनके सिरहाने ऊँचे आसन पर बैठा, और अर्जुन हाथ जोड़कर, झुककर उनके पैरों की ओर खड़े रहे। जागकर कृष्ण ने पहले अर्जुन को देखा।
कृष्ण ने कहा: दुर्योधन पहले आया, पर मैंने अर्जुन को पहले देखा; इसलिए दोनों की सहायता करूँगा, और छोटे को पहले चुनने का अधिकार है। एक ओर मेरी नारायणी सेना के एक अर्बुद योद्धा होंगे, और दूसरी ओर मैं अकेला, जो युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊँगा। अर्जुन ने न लड़ने वाले केशव को चुना, और दुर्योधन सारी सेना पाकर बहुत प्रसन्न हुआ।
भगवान से संबंध और भक्ति-भाव
अर्जुन की भक्ति सखा की है, और वह खुलकर दिखती है: कृष्ण ने पूछा कि तुमने न लड़ने वाले मुझे क्यों चुना, तो अर्जुन बोले: आप अकेले सबको मार सकते हैं, मैं भी अकेले मार सकता हूँ; पर आप लोक में कीर्तिमान हैं, और मैं भी यश चाहता हूँ। और बहुत समय से मेरे मन में इच्छा है कि आप मेरे सारथी बनें। कृष्ण ने कहा: तुम्हारी इच्छा पूरी हो, मैं तुम्हारा सारथी बनूँगा।
गीता के अंत में कृष्ण ने कहा: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे प्रणाम करो; मैं सच कहता हूँ, तुम मुझे प्रिय हो। सब धर्म छोड़कर मेरी शरण आओ, मैं तुम्हें सब पापों से छुड़ा दूँगा। और अर्जुन ने उत्तर दिया: अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ, स्मृति लौट आई; मैं संदेह-रहित होकर आपकी बात मानूँगा।
प्रमुख कथाएँ
विश्वरूप और क्षमा
मूल ग्रंथ मेंगीता के ग्यारहवें अध्याय में कृष्ण का विश्वरूप देखकर अर्जुन काँपते हुए, गद्गद स्वर में प्रणाम करके बोले: आपको सब ओर से नमस्कार; आप अनंत बल और अपार पराक्रम वाले हैं, सबमें व्याप्त हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।
फिर उन्होंने क्षमा माँगी: आपकी महिमा न जानकर, आपको सखा मानकर, लापरवाही या प्रेम में मैंने "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा" कहा; हँसी-मज़ाक में, घूमते, सोते, बैठते, खाते, अकेले या दूसरों के सामने आपका जो अनादर हुआ, उसके लिए मुझे क्षमा कीजिए। जैसे पिता पुत्र को, सखा सखा को और प्रिय प्रिया को सह लेता है, वैसे ही आप मुझे सहिए।
और अंत में उन्होंने विनती की: पहले कभी न देखा यह रूप देखकर मैं प्रसन्न भी हूँ और डर से मन व्याकुल भी; हे देवेश, वही अपना रूप दिखाइए; मुकुट, गदा और चक्र वाला, चतुर्भुज। कृष्ण ने फिर अपना सौम्य रूप धारण करके उन्हें ढाढ़स दिया।
चक्रधारी कृष्ण को रोकना
मूल ग्रंथ मेंभीष्म के बाणों के आगे अर्जुन को भीष्म के प्रति आदर में नरमी से लड़ते देख कृष्ण ख़ुद चक्र लेकर भीष्म पर दौड़े। अर्जुन रथ से कूदकर उनके पीछे भागे, उनकी भुजाएँ पकड़ीं, और दसवें कदम पर किसी तरह उन्हें रोक पाए। प्रणाम करके बोले: केशव, क्रोध शांत कीजिए, आप ही पांडवों की गति हैं; मैं पुत्रों और भाइयों की शपथ लेकर कहता हूँ, अपनी प्रतिज्ञा से नहीं हटूँगा।
भक्ति और शरणागति की सीख
सखा से शरणागत तक
अर्जुन की कथा भक्ति का एक क्रम दिखाती है: पहले वे कृष्ण को सखा और सारथी के रूप में चुनते हैं, फिर विश्वरूप देखकर उनकी महिमा जानते हैं, और अंत में गीता के उपदेश के बाद कहते हैं कि अब संदेह नहीं, आपकी बात मानूँगा।
मूल श्लोक और उनका अर्थ
सखा मानकर कहा, उसकी क्षमा
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥आपकी इस महिमा को न जानते हुए, आपको सखा मानकर, लापरवाही से या प्रेम में मैंने हठपूर्वक जो "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा" कहा, (उसके लिए क्षमा करें)।
जैसे पिता पुत्र को
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥इसलिए शरीर से झुककर प्रणाम करके मैं आप पूज्य ईश्वर को प्रसन्न करना चाहता हूँ। हे देव, जैसे पिता पुत्र के, सखा सखा के और प्रिय प्रिया के अपराध सह लेता है, वैसे ही आप मेरे सहिए।
संबंधित भक्त
- कुंती — माता
- राजा परीक्षित — पौत्र
VedikMARG पर आगे पढ़ें
देवता
- श्री कृष्ण — श्रीकृष्ण के पाठ और तीर्थ
स्रोत
- महाभारत — समीक्षित पाठ (Critical Edition, BORI, Poona, 1933–66), GRETIL e-text — Muneo Tokunaga (data entry), BORI (सं.) (1999) · 5.7; 6.33; 6.40; 6.55
- Sriman Mahabharatam, mainly based on the South Indian texts — Udyogaparva (5) — T. R. Krishnacharya, T. R. Vyasacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1907) · उद्योगपर्व, अध्याय 7, पृ. 8 (scan leaf n16)
- Sriman Mahabharatam, mainly based on the South Indian texts — Bhishmaparva (6) — T. R. Krishnacharya, T. R. Vyasacharya (सं.), Nirnaya-Sagar Press, Bombay (1908) · भीष्मपर्व (भगवद्गीता अ. 11), पृ. 52 (scan leaf n60)
