नृसिंह अवतार: खंभे से प्रकट हुए भगवान

हिरण्यकशिपु का वरदान, खंभे की चुनौती और सभा के द्वार पर वध — श्रीमद्भागवत से, विष्णु पुराण के अंतर के साथ

संक्षेप में

नृसिंह अवतार की कथा श्रीमद्भागवत के सातवें स्कंध में है। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा से वर लिया था कि न मनुष्य उसे मार सके, न पशु; न दिन में, न रात में। जब उसने सभा के खंभे पर मुक्का मारकर प्रह्लाद को ललकारा, तो भगवान उसी खंभे से मनुष्य और सिंह के मिले हुए रूप में प्रकट हुए।

ब्रह्मा का वरदान

मूल ग्रंथ में

हिरण्यकशिपु अजर-अमर और अजेय बनना चाहता था। उसने मंदराचल की घाटी में ऐसा कठोर तप किया कि उसकी देह पर दीमक की बाँबी जम गई। ब्रह्मा प्रकट हुए, तो उसने वर माँगा कि ब्रह्मा के बनाए किसी प्राणी से उसकी मृत्यु न हो: न भीतर, न बाहर; न दिन में, न रात में; न किसी अस्त्र से; न धरती पर, न आकाश में; न मनुष्य से, न पशु से; न देवता, न असुर, न बड़े नाग से। ब्रह्मा ने वर दे दिए।

वर के बल पर उसने तीनों लोक जीत लिए, और डरे हुए देवता भगवान की शरण गए। एक निराकार, मेघ जैसी गंभीर वाणी ने उन्हें भरोसा दिया: जब यह अपने शांत, वैर-रहित पुत्र प्रह्लाद से द्रोह करेगा, तब वर के बावजूद मैं इसे मारूँगा।

ग्रंथों में अंतर

वरदान के शब्द हर पुराण में एक जैसे नहीं। Wilson अपने विष्णु पुराण अनुवाद की टिप्पणी में लिखते हैं कि वायु पुराण के अनुसार वर यह था कि किसी सृजित प्राणी से उसकी मृत्यु न हो, और कूर्म पुराण इसमें "विष्णु के सिवा" जोड़ता है।

"इस खंभे में क्यों नहीं दिखता?"

मूल ग्रंथ में

जब गुरु-पुत्र ने बताया कि सारे असुर बालक प्रह्लाद की बात मानने लगे हैं, तो हिरण्यकशिपु क्रोध से काँप उठा और बेटे को मारने का निश्चय किया। प्रह्लाद हाथ जोड़े, सिर झुकाए उसके सामने खड़े थे, और वह पैर से कुचले साँप की तरह फुफकारता हुआ बोला: जिसके क्रोध से तीनों लोक काँपते हैं, उसकी आज्ञा तूने किसके बल पर तोड़ी?

प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि भगवान केवल मेरा ही नहीं, आपका और सब बलवानों का बल हैं। आप यह असुर-भाव छोड़ दीजिए, मन को सम कर लीजिए; अपने वश में न आए, उलटी राह पर चलते मन के सिवा कोई शत्रु है ही नहीं।

हिरण्यकशिपु बोला: जिसे तू मेरे सिवा जगत का स्वामी कहता है, वह कहाँ है? अगर वह सब जगह है, तो इस खंभे में क्यों नहीं दिखता? मैं अभी तेरा सिर धड़ से अलग करता हूँ; देखूँ, तेरा हरि तुझे कैसे बचाता है। फिर वह तलवार लेकर सिंहासन से उछला, और खंभे पर ज़ोर से मुक्का मारा।

न मृग, न मनुष्य

मूल ग्रंथ में

उसी क्षण खंभे में ऐसी भयानक गर्जना हुई कि भागवत के शब्दों में ब्रह्माण्ड का खोल चटक गया, और ब्रह्मा जैसे देवताओं को लगा कि उनके लोकों का अंत आ गया। हिरण्यकशिपु ने सभा में चारों ओर देखा, पर आवाज़ का स्रोत न दिखा।

अपने सेवक की बात सच करने के लिए, और यह दिखाने के लिए कि वे सब प्राणियों में व्याप्त हैं, भगवान सभा के खंभे में एक अद्भुत रूप में प्रकट हुए, जो न पशु का था, न मनुष्य का। तपे सोने जैसी आँखें, लहराती अयाल, भयानक दाढ़ें, छुरे जैसी जीभ, आकाश छूती देह, और सैकड़ों भुजाएँ, जिनके नख ही अस्त्र थे।

हिरण्यकशिपु सोचता रहा: यह मृग भी नहीं, नर भी नहीं; यह नर और सिंह का कैसा विचित्र रूप है? लगता है, महामायावी हरि ने यही मेरी मृत्यु का उपाय सोचा है; पर इससे होगा क्या?

सभा के द्वार पर, जाँघों पर, नखों से

मूल ग्रंथ में

हिरण्यकशिपु गदा लेकर गरजता हुआ नृसिंह पर झपटा, और उनके तेज में ऐसे खो गया जैसे पतंगा आग में। नृसिंह ने उसे ऐसे पकड़ा जैसे गरुड़ बड़े साँप को, और फिर खेल-खेल में हाथ से निकल जाने दिया। वह तलवार और ढाल लेकर फिर लड़ने लगा।

तब भगवान ने ज़ोर का अट्टहास किया और उसे पकड़ लिया। जैसे साँप चूहे को पकड़ता है, वैसे वह छटपटाता रहा। नृसिंह ने उसे सभा के द्वार पर अपनी जाँघों पर रखा, और जैसे गरुड़ विषैले साँप को चीरता है, वैसे खेल-खेल में नखों से चीर डाला। फिर उसके हथियार उठाए हज़ारों अनुचरों को भी मार डाला।

भागवत यह नहीं कहता कि वध का हर ब्योरा वरदान की किसी शर्त से मेल खाता है। नीचे की तालिका में दोनों को बस साथ रखा गया है। Wilson बताते हैं कि भागवत के टीकाकार के अनुसार भगवान ने नृसिंह रूप इसलिए लिया कि वह न मनुष्य का है, न पशु का।

वरदान की शर्तें और वध का वर्णन — श्रीमद्भागवत में
वरदान में (7.3.36)वध के वर्णन में (7.8)स्रोत
न मनुष्य से, न पशु सेरूप "न मृग, न मानुष" (7.8.18); हिरण्यकशिपु इसे नर और सिंह का रूप कहता है (7.8.19)श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.3.36; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.8.18–19
न भीतर, न बाहरसभा के द्वार पर (7.8.29)श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.3.36; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.8.29
न धरती पर, न आकाश मेंअपनी जाँघों पर रखकर (7.8.29)श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.3.36; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.8.29
न किसी अस्त्र सेनखों से (7.8.29)श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.3.36; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.8.29
न दिन में, न रात मेंसमय का उल्लेख नहींश्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.3.36; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 7.8.24–31

कोई पास न जा सका

मूल ग्रंथ में

नृसिंह की अयाल से बादल बिखर गए, ग्रह फीके पड़ गए, समुद्र उफन उठे और दिशाओं के हाथी चिंघाड़ने लगे। भगवान सभा के राज-सिंहासन पर बैठ गए। देवताओं की स्त्रियों ने फूल बरसाए, पर उनके क्रोध के आगे कोई पास जाने का साहस न कर सका।

ब्रह्मा, रुद्र, ऋषि और देवता अलग-अलग खड़े होकर स्तुति करते रहे, पर उनके क्रोध के पास कोई न जा सका। स्वयं लक्ष्मी जी को भेजा गया, पर ऐसा रूप पहले कभी न देखा-सुना होने से वे भी पास न गईं। तब ब्रह्मा ने प्रह्लाद से कहा: बेटा, जाओ, अपने पिता पर क्रोधित प्रभु को शांत करो।

प्रह्लाद धीरे-धीरे पास गए और धरती पर लेटकर प्रणाम किया। अपने चरणों में पड़े बालक को देखकर भगवान का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने उसे उठाया और अपना कमल जैसा हाथ उसके सिर पर रख दिया। प्रह्लाद की आँखें भर आईं, और वे गद्गद वाणी से स्तुति करने लगे।

वर, पिता की मुक्ति और राज्य

मूल ग्रंथ में

स्तुति के बाद भगवान ने वर देना चाहा। प्रह्लाद ने अपने लिए कुछ न माँगा, केवल पिता की मुक्ति माँगी। भगवान ने कहा कि तुम्हारे कारण तुम्हारे पिता इक्कीस पीढ़ियों के साथ पवित्र हो गए, और उनका अंतिम संस्कार करने को कहा।

ब्रह्मा ने भी स्तुति की। भगवान ने ब्रह्मा से कहा कि ऐसे वर क्रूर स्वभाव वाले असुरों को फिर न देना; यह साँपों को अमृत पिलाने जैसा है। इतना कहकर भगवान अंतर्धान हो गए, और ब्रह्मा ने शुक्राचार्य और मुनियों के साथ मिलकर प्रह्लाद को दैत्यों और दानवों का राजा बनाया।

विष्णु पुराण में यह कथा

ग्रंथों में अंतर

विष्णु पुराण में खंभे से प्रकट होने का प्रसंग नहीं है। वहाँ समुद्र में चट्टानों के नीचे दबे प्रह्लाद ध्यान में भगवान से एक हो जाते हैं, उनके बंधन टूट जाते हैं, और वे चट्टानें हटाकर समुद्र से बाहर आते हैं। फिर उनकी स्तुति पर भगवान पीताम्बरधारी रूप में दर्शन देते हैं। प्रह्लाद हर जन्म में अटल भक्ति और पिता की क्षमा माँगते हैं, फिर लौटकर पिता के चरण छूते हैं। पिता उनका माथा सूँघकर, गले लगाकर रो पड़ता है: बेटा, तू जीवित है! और अपनी क्रूरता पर पछताता है।

नृसिंह का ज़िक्र वहाँ केवल एक पंक्ति में है: जब नृसिंह-रूपी विष्णु ने पिता का अंत किया, तब प्रह्लाद दैत्यों के राजा बने। Wilson अपनी टिप्पणी में लिखते हैं कि यह पुराण यहाँ पुरानी, प्रचलित कथा का बस छोटा-सा हवाला देता है; नृसिंह की विस्तृत कथा उन्हें केवल भागवत में मिली। वे यह भी जोड़ते हैं कि भागवत की कथा भी हर बात में आज के प्रचलित रूप जैसी नहीं।

मूल श्लोक और उनका अर्थ

हिरण्यकशिपु की चुनौती

यस्त्वया मन्दभाग्योक्तो मदन्यो जगदीश्वरः। क्वासौ यदि स सर्वत्र कस्मात्स्तम्भे न दृश्यते॥

अभागे, तू मेरे सिवा जिसे जगत का स्वामी कहता है, वह कहाँ है? अगर वह सब जगह है, तो इस खंभे में क्यों नहीं दिखता?

श्रीमद्भागवत, स्कंध 7, अध्याय 8, श्लोक 13

सेवक की बात सच करने

सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः। अदृश्यतात्यद्भुतरूपमुद्वहन् स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम्॥

अपने सेवक की कही बात सच करने के लिए, और यह दिखाने के लिए कि वे सब प्राणियों में व्याप्त हैं, भगवान सभा के खंभे में एक अत्यंत अद्भुत रूप धारण करके दिखाई दिए, जो न पशु का था, न मनुष्य का।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 7, अध्याय 8, श्लोक 18

द्वार पर

विष्वक् स्फुरन्तं ग्रहणातुरं हरि- र्व्यालो यथाऽऽखुं कुलिशाक्षतत्वचम्। द्वार्यूर आपात्य ददार लीलया नखैर्यथाऽहिं गरुडो महाविषम्॥

पकड़ में छटपटाते उस असुर को, जिसकी खाल वज्र से भी न कटती थी, हरि ने वैसे ही पकड़ा जैसे साँप चूहे को; और द्वार पर उसे अपनी जाँघों पर रखकर खेल-खेल में नखों से चीर दिया, जैसे गरुड़ महाविषैले साँप को।

श्रीमद्भागवत, स्कंध 7, अध्याय 8, श्लोक 29

इस कथा के भक्त

  • भक्त प्रह्लाद — पाँच बरस का वह बालक, जिसकी बात सच करने के लिए भगवान खंभे से प्रकट हुए

स्रोत

नृसिंह अवतार: खंभे से प्रकट हुए भगवान — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न