पाँच लक्षण क्या हैं?
विष्णु पुराण अठारह पुराणों की सूची देने के तुरंत बाद कहता है: "सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और जो वंशानुचरित है, ये सब (पुराणों) में कहे जाते हैं।" और पुराण के अंत में पराशर मैत्रेय से कहते हैं कि मैंने तुम्हें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित, सब सुना दिए। मत्स्य पुराण यही बात परिभाषा के रूप में कहता है: पुराण "पंच-लक्षण" है, यानी पाँच लक्षणों वाला।
Wilson के अनुसार संस्कृत के प्रसिद्ध कोश "अमरकोश" में "पञ्चलक्षण" शब्द पुराण के पर्याय के रूप में दिया गया है, और टीकाकारों में इसमें कोई मतभेद नहीं कि ये पाँच लक्षण कौन-से हैं। Colebrooke के अनुसार उन्होंने इन्हें इस तरह समझाया: पहला, मूल सृष्टि; दूसरा, लोकों का नाश और फिर से बनना, काल-गणना सहित; तीसरा, देवताओं और प्रजापतियों की वंशावली; चौथा, मनुओं के शासन-काल, यानी मन्वंतर; और पाँचवाँ, सूर्य और चंद्र वंश के राजाओं और उनके वंशजों का इतिहास।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंश्यानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित: (इन) पाँच लक्षणों वाला पुराण है।
| लक्षण | अर्थ | उदाहरण (विष्णु पुराण में) | स्रोत |
|---|---|---|---|
| सर्ग | मूल सृष्टि: प्रकृति से महत्, अहंकार और तत्त्वों का बनना | पहले अंश के आरंभिक अध्याय | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. vii; विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.2.1–60 |
| प्रतिसर्ग | प्रलय और फिर से सृष्टि; काल-गणना भी इसी में | छठे अंश में तीन प्रकार के प्रलय | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. vii; विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 6.3–6.7 |
| वंश | देवताओं, ऋषियों और प्रजापतियों की वंशावली | दक्ष का जन्म और उनकी कन्याओं से देवता, दैत्य और प्राणियों की संतान | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. vii; विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.15 |
| मन्वंतर | चौदह मनुओं के काल, उनके देवता, इंद्र और सप्तर्षि | तीसरे अंश के आरंभिक अध्याय | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. vii; विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.1–3.2 |
| वंशानुचरित | सूर्य और चंद्र वंश के राजाओं का चरित | चौथा अंश | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. vii; विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 4.1–4.20 |
मत्स्य पुराण: पाँच के अलावा और क्या
मत्स्य पुराण पंच-लक्षण की परिभाषा देकर वहीं नहीं रुकता। अगले श्लोक में वह कहता है कि पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्र का माहात्म्य, भुवन का वर्णन, और सृष्टि और संहार का वर्णन भी होता है; और उसके बाद कि सब पुराणों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, और उनके विरुद्ध आचरण के फल भी कहे जाते हैं। यानी स्वयं पुराण-परंपरा मानती थी कि पुराण केवल इतिहास और सृष्टि-विज्ञान के ग्रंथ नहीं, धर्म और भक्ति के ग्रंथ भी हैं।
मत्स्य पुराण इससे ठीक पहले यह भी कहता है कि इन अठारह के अलावा जो कोई पुराण अलग से बताया जाता है, उसे इन्हीं से निकला हुआ समझना चाहिए। इस बारे में उपपुराणों वाले लेख में विस्तार है।
भागवत के दस लक्षण
भागवत पुराण (12.7) पुराण के दस लक्षण गिनाता है: सर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, अंतर (मन्वंतर), वंश, वंशानुचरित, संस्था, हेतु और अपाश्रय; और साथ ही यह भी कहता है कि "कुछ लोग बड़े और छोटे के भेद से पाँच प्रकार का (पुराण) बताते हैं"। यानी भागवत के अनुसार पाँच लक्षण छोटे पुराण के और दस बड़े पुराण के हैं।
भागवत हर लक्षण का अर्थ भी समझाता है। सर्ग है प्रकृति के गुणों के क्षोभ से महत्, अहंकार, सूक्ष्म भूत और इंद्रियों का जन्म; विसर्ग है उनसे बीज से बीज की तरह चर-अचर जगत का बनना; वृत्ति है जीवों की जीविका; रक्षा है हर युग में भगवान के अवतारों की लीला; मन्वंतर के छह अंग हैं, मनु, देवता, मनु-पुत्र, इंद्र, ऋषि और भगवान के अंशावतार; संस्था चार प्रकार का प्रलय है, नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य और आत्यंतिक; हेतु जीव है, जो अविद्या और कर्म से सृष्टि का कारण बनता है; और अपाश्रय वह ब्रह्म है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में सबमें रहकर भी सबसे अलग है।
भागवत में दस लक्षणों की एक दूसरी सूची भी है, दूसरे स्कंध में: सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वंतर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय। वहाँ एक बहुत सुंदर बात कही गई है: पहले नौ लक्षणों का वर्णन दसवें, यानी "आश्रय" (परम ब्रह्म), की शुद्ध समझ के लिए किया जाता है। यानी भागवत की दृष्टि में सृष्टि, वंश और इतिहास, सब का अंतिम उद्देश्य उस आश्रय की ओर ले जाना है।
| पंच लक्षण (विष्णु, मत्स्य) | दस लक्षण (भागवत 12.7) | दस लक्षण (भागवत 2.10) | स्रोत |
|---|---|---|---|
| सर्ग | सर्ग, विसर्ग | सर्ग, विसर्ग | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.24; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.9, 2.10.1 |
| प्रतिसर्ग | संस्था (चार प्रलय) | निरोध | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.17, 2.10.6 |
| वंश | वंश | ईशानुकथा (अवतार और भक्तों की कथा) | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.16, 2.10.5 |
| मन्वंतर | अंतर (मन्वंतर) | मन्वंतर | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.15, 2.10.4 |
| वंशानुचरित | वंशानुचरित | स्थान, पोषण, ऊति | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.16, 2.10.4 |
| (नहीं) | वृत्ति, रक्षा, हेतु, अपाश्रय | मुक्ति, आश्रय | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.13–19, 2.10.6–7 |
प्रतिसर्ग का अर्थ: प्रलय तीन प्रकार का या चार
प्रतिसर्ग, यानी प्रलय, का वर्णन पुराणों में अलग-अलग गहराई से है। विष्णु पुराण कहता है कि सब प्राणियों का प्रतिसंचर (प्रलय) तीन प्रकार का है: नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यंतिक। नैमित्तिक प्रलय ब्रह्मा का है, जो हर कल्प के अंत में होता है; प्राकृतिक प्रलय दो परार्ध के अंत में होता है, जब पूरी सृष्टि प्रकृति में लीन हो जाती है; और आत्यंतिक प्रलय मोक्ष है, यानी जीव का सदा के लिए ब्रह्म में लीन होना। मैत्रेय तब पूछते हैं कि परार्ध की संख्या क्या है, और पराशर बताते हैं कि गिनती में हर स्थान पिछले से दस गुना होता है।
भागवत इसमें एक चौथा प्रकार जोड़ता है: "नित्य" प्रलय। भागवत के अनुसार सूक्ष्म-दर्शी कहते हैं कि ब्रह्मा से लेकर सब प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय निरंतर होते रहते हैं, क्योंकि काल की तेज़ धारा में बहती हर बदलने वाली वस्तु की अवस्थाएँ ही उसके जन्म और नाश का कारण हैं। इस तरह भागवत की "संस्था" नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य और आत्यंतिक, चार प्रकार की है। काल की ये बड़ी इकाइयाँ, कल्प, परार्ध और मन्वंतर, कैसे गिनी जाती हैं, यह कल्प-मन्वंतर-युग वाले लेख का विषय है।
ब्राह्मो नैमित्तिकस्तेषां कल्पान्ते प्रतिसंचरः । आत्यन्तिकश्च मोक्षाख्यः प्राकृतो द्विपरार्धिकः ॥उनमें नैमित्तिक प्रलय ब्रह्मा का है, जो कल्प के अंत में होता है; आत्यंतिक प्रलय मोक्ष कहलाता है; और प्राकृतिक प्रलय दो परार्ध के अंत में होता है।
क्या आज के पुराण इस परिभाषा पर खरे उतरते हैं?
Wilson ने 1840 में यह सवाल सीधे पूछा, और उनका उत्तर था: किसी एक में भी पूरी तरह नहीं। कुछ पुराणों पर यह परिभाषा बिल्कुल लागू नहीं होती, और दूसरों पर आंशिक रूप से। उनके अनुसार विष्णु पुराण इस पर सबसे अधिक खरा उतरता है, और यही बात उसे दूसरों से अधिक प्रामाणिक चरित्र देती है; पर उसमें भी मन्वंतरों और वंशावलियों के बीच समाज के नियमों और श्राद्ध पर एक पूरा भाग है, और वंशावलियों और प्रलय के बीच कृष्ण का जीवन।
दूसरी ओर, Wilson के अनुसार ब्रह्म पुराण में इस परिभाषा से मेल खाने वाली बहुत कम चीज़ है, और वामन पुराण में सृष्टि और मन्वंतरों के केवल प्रसंगवश उल्लेख हैं, जिससे पाँचों लक्षण कमज़ोर पड़ जाते हैं। Colonel Vans Kennedy का मत था कि पुराणों का उद्देश्य धार्मिक शिक्षा ही है, और पृथ्वी और ग्रहों का वर्णन और राजवंशों की सूचियाँ उनमें बाहरी और ग़ैर-ज़रूरी हैं। Wilson ने उत्तर दिया कि यह बात आज के पुराणों पर सही हो सकती है, पर पंच-लक्षण के समय के पुराणों पर नहीं, क्योंकि उन पाँच में से कोई भी "धार्मिक शिक्षा" नहीं है; इसलिए उनके अनुसार आज के पुराण अपने पुराने रूप से काफ़ी बदल चुके हैं।
यह असहमति एक तरह से वही बात है जो भागवत स्वयं कहता है: छोटे पुराण के पाँच लक्षण, बड़े के दस। आज जिन पुराणों को हम पढ़ते हैं, उनमें पाँच लक्षणों का ढाँचा प्रायः मिलता है, पर उसके ऊपर तीर्थ, व्रत, भक्ति और दर्शन की एक बड़ी परत चढ़ी हुई है। हर पुराण के पृष्ठ पर हमने बताया है कि उसमें कौन-सा लक्षण कहाँ और कितना है।
आगे पढ़ें
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
- मत्स्य पुराण — मत्स्य-रूप भगवान ने प्रलय के जल में नाव पर बैठे राजा मनु को सुनाया: सृष्टि, पितर, वंश, व्रत, तीर्थ, गोत्र, सावित्री, राजधर्म, मूर्ति-मंदिर और सोलह महादान
- वेदव्यास — पुराण-संहिता के संकलनकर्ता
स्रोत एवं संदर्भ
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.24, 6.8.2, 1.2.1–60, 6.3–6.7, 1.15, 3.1–3.2, 4.1–4.20, 3.6.24, 6.3.1–4, 6.3.2
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.65, 53.66–67, 53.64
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, pp. vii–viii, Preface, p. vii, Preface, pp. ix–x, xcii, Preface, pp. x–xi, xxix, lxxvi
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.7.9–10, 12.7.11–19, 2.10.1–7, 12.7.9, 2.10.1, 12.7.17, 2.10.6, 12.7.16, 2.10.5, 12.7.15, 2.10.4, 12.7.16, 2.10.4, 12.7.13–19, 2.10.6–7, 12.7.17, 12.4.35–36, 12.7.10
