भविष्य पुराण: सूर्य-उपासना, व्रत-त्योहार और "भविष्य" की कथाएँ

चार पर्वों में: ब्राह्म (तिथि-व्रत, सूर्य और साम्ब), मध्यम (कुएँ, बाग़, वास्तु, प्रतिष्ठा), प्रतिसर्ग (राजवंश, विक्रम-वेताल, सत्यनारायण, आल्हा-ऊदल, संत) और उत्तर (कृष्ण-युधिष्ठिर संवाद में व्रत, उत्सव और दान)

संक्षेप में

भविष्य पुराण अठारह महापुराणों में नौवाँ है। मत्स्य पुराण के अनुसार इसमें ब्रह्मा ने मनु को सूर्य की महिमा बताई, इसकी कथाएँ प्रायः भविष्य की हैं और इसमें 14,500 श्लोक हैं। आज के पाठ में चार पर्व हैं, जिनमें तिथि-व्रत, सूर्य-पूजा, सत्यनारायण कथा, रक्षाबंधन का मंत्र और प्रतिसर्ग पर्व की राजवंश-कथाएँ प्रसिद्ध हैं।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में नौवाँ (विष्णु पुराण 3.6.22; भविष्य 1.1.69: "पुराणं नवमं महत्")
श्लोक-संख्या
14,500 (मत्स्य 53.32; भागवत 12.13); स्वयं के अनुसार बढ़कर 50,000 (भविष्य 1.1.105)
वक्ता
व्यास के शिष्य सुमन्तु, जनमेजय के पुत्र राजा शतानीक को; उत्तर पर्व में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को
पर्व (विकिस्रोत पाठ)
ब्राह्म 216, मध्यम 62 (तीन भाग), प्रतिसर्ग 100 (चार खंड), उत्तर 208 अध्याय
मुख्य देवता
सूर्य (ब्राह्म पर्व का बड़ा भाग सौर-धर्म है)
प्रसिद्ध अंश
साम्ब-उपाख्यान, नाग-पंचमी, सत्यनारायण-व्रत कथा, रक्षाबंधन विधि, व्रतों और महादानों की विधियाँ

भविष्य पुराण क्या है?

भविष्य पुराण अठारह पुराणों की सूची में नौवें स्थान पर है, और इसका अपना पहला अध्याय भी इसे "नौवाँ महान पुराण" कहता है। मत्स्य पुराण इसकी परिभाषा देता है: जिसमें चतुर्मुख ब्रह्मा ने सूर्य की महिमा को केंद्र में रखकर, अघोर कल्प के वृत्तांत के प्रसंग से, मनु को जगत की स्थिति और प्राणियों के लक्षण बताए, और जिसकी कथाएँ प्रायः भविष्य की हैं, वह चौदह हज़ार पाँच सौ श्लोकों वाला "भविष्य" कहलाता है।

पहले अध्याय में ही इस पुराण के बढ़ने की बात भी कही गई है: मनीषियों ने सब पुराणों को मूल में बारह-बारह हज़ार श्लोकों का बताया, फिर वे अनेक आख्यानों से बढ़ते गए; जैसे स्कंद पुराण सौ हज़ार श्लोकों का हुआ, वैसे ही यह भविष्य पुराण ऋषि ने पचास हज़ार (लक्ष का आधा) श्लोकों का बनाया। इसीलिए इसकी पुष्पिकाएँ इसे "शतार्द्धसाहस्री संहिता" कहती हैं। यह एक दुर्लभ उदाहरण है जहाँ कोई पुराण स्वयं मानता है कि उसका आकार समय के साथ बढ़ा।

कथा का ढाँचा महाभारत से जुड़ा है। जनमेजय के पुत्र राजा शतानीक के पास भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, पराशर, व्यास, सुमन्तु, जैमिनि, याज्ञवल्क्य, नारद आदि ऋषि आते हैं। शतानीक कहते हैं कि उन्होंने महाभारत, रामायण और पुराण सुने, पर भविष्य पुराण नहीं सुना। व्यास कहते हैं कि जैसे वैशम्पायन ने तुम्हारे पिता को महाभारत सुनाया था, वैसे ही मेरा शिष्य सुमन्तु तुम्हें यह सुनाएगा।

चतुर्दश सहस्राणि तथा पञ्च शतानि च । भविष्यचरितप्रायं भविष्यं तदिहोच्यते ॥

चौदह हज़ार पाँच सौ श्लोकों वाला, जिसमें प्रायः भविष्य की कथाएँ हैं, वह यहाँ "भविष्य" कहलाता है।

— मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text, पृष्ठ 53.32

संरचना: चार पर्व और एक पुरानी उलझन

संस्कृत विकिस्रोत पर जो पाठ है, उसमें चार पर्व हैं: ब्राह्म पर्व (216 अध्याय), मध्यम पर्व (तीन भागों में 62 अध्याय), प्रतिसर्ग पर्व (चार खंडों में 100 अध्याय) और उत्तर पर्व (208 अध्याय)। विषय के हिसाब से ये चारों बहुत अलग हैं: पहला व्रत और सूर्य-उपासना का, दूसरा कर्मकांड और निर्माण का, तीसरा राजवंशों और कथाओं का, और चौथा व्रतों, उत्सवों और दानों का।

Wilson को 1840 में जो प्रतियाँ मिलीं, वे इससे बहुत अलग थीं। उनकी अपनी प्रति में केवल 126 छोटे अध्याय थे, जिसे सुमन्तु शतानीक को सुनाते हैं, और उसमें लगभग सात हज़ार श्लोक थे। उस प्रति में पुराण अपने पाँच भाग बताता है: ब्राह्म, वैष्णव, शैव, त्वाष्ट्र और प्रतिसर्ग, और Wilson ने अनुमान लगाया कि शायद उनके हाथ केवल पहला भाग आया है। उन्होंने "भविष्योत्तर" नाम का एक अलग ग्रंथ भी देखा, लगभग सात हज़ार श्लोकों का, जिसमें अधिकतर व्रत और दान थे। आज के उत्तर पर्व का विषय ठीक यही है।

भविष्य पुराण: पर्व और मुख्य विषय (विकिस्रोत पाठ की विषयानुक्रमणिका से)
पर्वमुख्य विषयस्रोत
ब्राह्म (1–216)पुराण-परंपरा; सृष्टि; संस्कार और उपनयन; स्त्रियों के लक्षण और गृह-धर्म; प्रतिपदा से सप्तमी तक तिथि-कल्प; च्यवन-सुकन्या; गणेश-चतुर्थी; नाग-पंचमी और साँपों का विवरण; स्कंद-षष्ठी; सप्तमी-कल्प में सूर्य की उपासना, रथयात्रा, साम्ब और मग ब्राह्मण; गरुड़-अरुण संवाद; श्राद्ध और प्रायश्चित्तभविष्य पुराण (मूल संस्कृत), ब्राह्म पर्व, विषयानुक्रमणिका
मध्यम (3 भाग, 62)धर्म का स्वरूप; ब्रह्मांड और ज्योतिश्चक्र; पुराण-इतिहास का माहात्म्य; पूर्त-कर्म: बाग़, पेड़, कुएँ, बावड़ी, तालाब; प्रतिमा-लक्षण; कुंड और मंडल; दक्षिणा; मास और तिथि का निर्णय; गोत्र-प्रवर; वास्तु-याग और गृह-प्रतिष्ठा; पीपल, बरगद, बेल, तुलसी की प्रतिष्ठा; अनिष्ट-शांतिभविष्य पुराण (मूल संस्कृत), मध्यम पर्व, भाग 1–3, विषयानुक्रमणिका
प्रतिसर्ग (4 खंड, 100)युगों के राजा; म्लेच्छ-वंश; अग्निवंशी क्षत्रिय; विक्रमादित्य और वेताल की कथाएँ; सत्यनारायण-व्रत कथा; पाणिनि, बोपदेव, पतंजलि; शालिवाहन, भोज, पृथ्वीराज, जयचंद; आल्हा-ऊदल; आचार्य और संत; मुग़ल, शिवाजी, अंग्रेज़; कल्किभविष्य पुराण (मूल संस्कृत), प्रतिसर्ग पर्व, खंड 1–4, विषयानुक्रमणिका
उत्तर (1–208)श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद: माया-दर्शन, संसार के दोष, यम-यातना; तिथि के क्रम से सौ से अधिक व्रत; माघ-स्नान; होली, रक्षाबंधन, महानवमी, दीपावली जैसे उत्सव; नवग्रह और कोटि-होम; धेनु-दान, पर्वत-दान, तुलापुरुष जैसे महादानभविष्य पुराण (मूल संस्कृत), उत्तर पर्व, विषयानुक्रमणिका

ब्राह्म पर्व: संस्कार, स्त्री-धर्म और तिथियों के व्रत

ब्राह्म पर्व की शुरुआत सृष्टि-वर्णन से होती है, जिसमें पुराणों की उत्पत्ति ब्रह्मा के पाँचवें मुख से बताई गई है। Wilson ने लिखा कि यह सृष्टि-वर्णन लगभग मनुस्मृति के पहले अध्याय के शब्दों की प्रतिलिपि है। फिर गर्भाधान से लेकर सब संस्कार, आचमन, प्रणव का अर्थ, सावित्री (गायत्री) का माहात्म्य और उपनयन की विधि आती है, और उसके बाद कई अध्याय विवाह-विधि, स्त्रियों के शुभ-अशुभ लक्षणों और गृहिणी के कर्तव्यों पर हैं: अनाज का संग्रह, सेवकों का पालन, पति से पहले जागना, रसोई का प्रबंध, और पति के परदेश जाने पर शृंगार छोड़ना।

इसके बाद पर्व तिथियों के क्रम से चलता है: प्रतिपदा-कल्प (जिसमें बलि-प्रतिपदा भी है), द्वितीया-कल्प, तृतीया-कल्प, चतुर्थी-कल्प, पंचमी-कल्प, षष्ठी-कल्प और सप्तमी-कल्प। हर तिथि के साथ उसका व्रत और उससे जुड़ी कथा। द्वितीया के प्रसंग में च्यवन और सुकन्या की लंबी कथा है: शर्याति ने अपनी बेटी सुकन्या च्यवन को दी, अश्विनीकुमारों ने च्यवन को जवानी दी, च्यवन ने यज्ञ में उन्हें भाग दिलाया, और क्रोध से वज्र उठाने वाले इंद्र की भुजा च्यवन ने स्तंभित कर दी। Wilson ने लिखा कि यह कथा मुख्यतः महाभारत से ली गई है।

चतुर्थी-कल्प गणेश का है: विनायक को विघ्नों का अधिकार, उनकी पूजा और आवरण-पूजा, और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी "शिवा", माघ शुक्ल चतुर्थी "शांता" और मंगलवार की शुक्ल चतुर्थी "सुखा" के व्रत। इसी कल्प में एक रोचक कथा है कि कार्तिकेय ने सामुद्रिक शास्त्र (शरीर के लक्षणों का शास्त्र) रचा, जिसे क्रोधित रुद्र ने समुद्र में फेंक दिया, और फिर पुरुषों, राजाओं और स्त्रियों के शरीर-लक्षणों का विस्तार से वर्णन है। षष्ठी-कल्प में कार्तिक षष्ठी को स्कंद की पूजा है, और उसी प्रसंग में "ब्राह्मण्य" क्या है, इस पर कई अध्यायों का विवेचन, और वर्ण-व्यवस्था की चर्चा।

नाग-पंचमी और साँपों का विज्ञान

पंचमी-कल्प में नाग-पंचमी व्रत की उत्पत्ति बताई गई है: नागों को उनकी माता ने शाप दिया था, और आस्तीक ने उस दुःख से उन्हें बचाया; जिस दिन आस्तीक का जन्म हुआ, वह पंचमी नागों को आनंद देने वाली हुई, इसलिए नाग-पंचमी का व्रत होता है। भाद्रपद की नाग-पंचमी और आश्विन पंचमी की नाग-पूजा की विधि भी यहीं है।

इसके बाद जो अध्याय आते हैं, वे पुराणों में असामान्य हैं: नागों की उत्पत्ति और उनके दाँतों का वर्णन, "काल" से डसे व्यक्ति के लक्षण, शरीर की अलग-अलग धातुओं में पहुँचे विष के लक्षण और हर अवस्था में दी जाने वाली औषधियाँ, और साँपों के रंग-रूप का वर्णन। Wilson ने भी लिखा कि नाग-पंचमी के बहाने यहाँ अलग-अलग प्रकार के साँपों का वर्णन है। यह भाग बताता है कि पुराण केवल कथा नहीं, अपने समय के व्यावहारिक ज्ञान को भी सँजोते थे।

सप्तमी-कल्प: सूर्य की उपासना का सबसे बड़ा पौराणिक ग्रंथ

ब्राह्म पर्व का सबसे बड़ा भाग, अध्याय 47 से लगभग अंत तक, सप्तमी-कल्प है, और यह पूरा सूर्य को समर्पित है। इसमें सूर्य की नित्य और नैमित्तिक पूजा, रथ-सप्तमी, माघ शुक्ल सप्तमी, सूर्य की रथयात्रा की पूरी विधि, सूर्य के सारथि और मंडल के देवता, सूर्य के नाम, सूर्य के प्रिय फूल, और जया, विजया, अपराजिता, महाजया, नंदा, भद्रा जैसी दर्जनों सप्तमियों के व्रत हैं। रविवार के बारह व्रत भी अलग-अलग नामों से हैं: नंदा, भद्रा, सौम्या, कामदा, पुत्रदा, जया, जयंता, विजया, आदित्याभिमुखा, हृदया, रोगहरा और महाश्वेता।

इस भाग में कई संवाद हैं: कृष्ण और साम्ब का, रुद्र और ब्रह्मा का, सूर्य और उनके गण दिंडी का (सूर्य दिंडी को ज्ञान देते हैं और ब्रह्मा उसे "आदित्य क्रिया-योग" समझाते हैं), और अंत में गरुड़ और अरुण का, जिसमें सौर-धर्म की महिमा और सब देवताओं में सूर्य की श्रेष्ठता बताई गई है। विश्वकर्मा द्वारा सूर्य के तेज को छाँटने की कथा, रेवंत की उत्पत्ति, ब्रह्मा, विष्णु और शिव द्वारा सूर्य की स्तुति, और सूर्य का उन्हें अपनी "तीन मूर्तियाँ" बताना भी यहीं है।

Wilson ने लिखा कि ब्राह्म पर्व के लगभग एक तिहाई अध्यायों के बाद बाक़ी सब उसी विषय पर हैं जिसका संकेत मत्स्य पुराण देता है, यानी सूर्य की शक्ति, महिमा और उनकी पूजा की विधि, और ये मुख्यतः कृष्ण, साम्ब, वसिष्ठ, नारद और व्यास के संवाद हैं। आज सूर्य-उपासना की परंपरा के लिए यह पर्व पुराण-साहित्य का सबसे विस्तृत स्रोत है।

सूर्य की श्रेष्ठता दिखाने के लिए यह पर्व कई प्रसिद्ध कथाओं को सूर्य से जोड़ता है। सत्राजित को अनंत ऐश्वर्य सूर्य की आराधना से मिला; श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र मिलने का वृत्तांत भी यहाँ सूर्य-प्रसंग में है; और कौशल्या गौतमी को सूर्य का माहात्म्य और पूजा-विधि बताती हैं। एक प्रसंग में स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिव सूर्य की स्तुति करते हैं, और सूर्य ब्रह्मा को वर देकर, गंधमादन पर शंकर को दर्शन देते हैं और शालग्राम क्षेत्र में तप करते विष्णु को वर देते हैं। मंदिर में दीपदान, प्रतिमा को स्नान कराना, मंदिर झाड़ना-बुहारना, और विष, उपद्रव और रोगों के नाश के लिए सूर्य-पूजा, इन सबका फल भी अलग-अलग अध्यायों में है।

साम्ब का कोढ़, चंद्रभागा का सूर्य मंदिर और मग ब्राह्मण

साम्ब श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र थे। पुराण के अनुसार उन्हें उनके पिता के शाप से कोढ़ हुआ, और इसके पीछे दुर्वासा का पुराना शाप था। कथा यह है कि नारद की युक्ति से कृष्ण की सोलह हज़ार स्त्रियाँ साम्ब के रूप पर मोहित हो गईं; तब कृष्ण ने उन स्त्रियों को शाप दिया कि वे लुटेरों के हाथ पड़ेंगी (केवल रुक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती अपने सत्त्व से बचीं), और साम्ब को कहा कि तुम्हारे इसी रूप से ये क्षुब्ध हुईं, इसलिए तुम्हें कोढ़ हो। साम्ब ने हँसकर कहा कि मैं निर्दोष हूँ, पर दुर्वासा का वचन झूठा नहीं हो सकता। Wilson ने सीधे लिखा कि साम्ब दुर्वासा के शाप से कोढ़ी हुए थे।

कृष्ण की आज्ञा से साम्ब ने सूर्य की उपासना की। बाद में वसिष्ठ ने जब उनसे पूछा कि जो शरीर घोर कोढ़ से सब ओर से फटा हुआ था, वह इतना सुंदर कैसे हो गया, तो साम्ब ने बताया कि उन्होंने लोकनाथ दिवाकर की सहस्रनाम से स्तुति की, और सूर्य ने साक्षात दर्शन देकर उन्हें वर दिए। फिर साम्ब को सूर्य की प्रतिमा मिली, जिसे उन्होंने चंद्रभागा (चिनाब) नदी के तट पर स्थापित किया, और वहाँ अपने नाम से "साम्बपुर" नगर बसाया।

सबसे रोचक प्रसंग इसके बाद है। मंदिर में सूर्य की सेवा कौन करे, यह पूछने पर पुरोहित गौरमुख ने साम्ब को "मग" नाम के ब्राह्मणों के बारे में बताया, जो शाकद्वीप में रहते थे और सूर्य की पूजा के योग्य थे। साम्ब उन्हें शाकद्वीप से मित्रवन लाए, उन्हें यादव कन्याएँ ब्याहीं, और वे "भोजक" कहलाए। आगे के अध्यायों में भोजकों की उत्पत्ति, उनकी पहचान, उनके आचार और "अव्यंग" की उत्पत्ति बताई गई है। Wilson ने लिखा कि ऐसा लगता है जैसे संकलनकर्ता ने फ़ारसी शब्द "मग" अपनाकर ईरान के अग्नि-पूजकों को भारत के सूर्य-पूजकों से जोड़ा हो, और यह विषय और जाँच माँगता है।

मध्यम पर्व: कुएँ, बाग़, घर और मंदिर बनाने का शास्त्र

मध्यम पर्व की शुरुआत धर्म के स्वरूप, ब्रह्मांड और ज्योतिश्चक्र के वर्णन, ब्राह्मण के लक्षण और गुरु के गुणों, और पुराण-इतिहास के भागों और उन्हें सुनने के माहात्म्य से होती है। पर उसके बाद यह पर्व लगभग पूरा "पूर्त-कर्म" का है, यानी वे काम जो समाज के लिए किए जाते हैं: बाग़ लगाना और पेड़ रोपने की विधि, कुएँ, बावड़ी और तालाब की प्रतिष्ठा, गायों के चरने के लिए भूमि छोड़ना, और पीपल, बरगद, बेल, तुलसी जैसे वृक्षों की प्रतिष्ठा की अलग-अलग विधियाँ। इसमें पत्थर, लकड़ी और घास के मंडपों की प्रतिष्ठा तक की विधि है।

इसके साथ कर्मकांड का पूरा तकनीकी पक्ष है: हर देवता की प्रतिमा के लक्षण, अलग-अलग कर्मों के लिए अलग आकार के हवन-कुंड, आहुतियों की संख्या, स्रुवा और दर्वी जैसे पात्रों का माप, पूर्णाहुति, मंडल बनाने की विधियाँ, किस कर्म में कितनी दक्षिणा, कलश की स्थापना, चार प्रकार के महीने और देव तथा पितृ कर्मों के लिए तिथि का निर्णय, गोत्र-प्रवर, वास्तु-याग, वास्तु के देवताओं के ध्यान-मंत्र, और गृह-प्रतिष्ठा की बड़ी और मध्यम विधि। अंत में अपशकुनों से होने वाले अनिष्ट की शांति है।

प्रतिसर्ग पर्व (1–2): म्लेच्छ-वंश, विक्रम-वेताल और सत्यनारायण

प्रतिसर्ग पर्व सूत के मुख से युगों के राजाओं से शुरू होता है: सत्ययुग में वैवस्वत मनु से, त्रेता में, और द्वापर में संवरण से लेकर प्रद्योत तक, जिसने "म्लेच्छ-यज्ञ" किया। फिर कलि विष्णु की स्तुति करता है, और विष्णु उसकी इच्छा पूरी करने का वर देते हैं। इसी प्रसंग में "आदम" नाम का पुरुष और उसकी पत्नी "हव्यवती" म्लेच्छ-वंश बढ़ाने वाले बताए गए हैं, और आगे "न्यूह" नाम का म्लेच्छ, जिसके समय में वर्षा के जल में भारतवर्ष डूबता है और वह मुनियों के साथ नाव पर चढ़ता है। फिर म्लेच्छ भाषाओं, उनके वंशों और संस्कृत से बिगड़ी भाषाओं का वर्णन है।

पहले खंड का अंत अग्निवंश से होता है: आबू पर्वत (अर्बुदाचल) पर एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण के ब्रह्म-होम से प्रमर, चपहानि, शुक्ल और परिहार नाम के चार क्षत्रिय उत्पन्न होते हैं, और प्रमर वंश में विक्रमादित्य का अवतार होता है। पाठ के अनुसार कलि के तीन हज़ार वर्ष पूरे होने पर शकों के नाश के लिए शिव की आज्ञा से विक्रमादित्य जन्मे। दूसरे खंड में विक्रमादित्य की सभा में ब्राह्मण के रूप में आया वेताल राजा को एक के बाद एक कथाएँ सुनाता है: पद्मावती, मधुमती, वीरवर, जीमूतवाहन और शंखचूड़ की कथा, और ऐसी बीस से अधिक कथाएँ।

इसी दूसरे खंड में (अध्याय 24 से 29) सत्यनारायण-व्रत की कथा है, जो आज भारत के घर-घर में पढ़ी जाती है: नारायण नारद को सत्यनारायण-व्रत की विधि बताते हैं; काशी के निर्धन ब्राह्मण शतानंद को स्वयं हरि बूढ़े ब्राह्मण के रूप में आकर इस व्रत का उपदेश देते हैं; फिर राजा चंद्रचूड़, एक भील, और साधु नाम के वणिक की कथाएँ, जिसमें व्रत भूलने से साधु और उसके दामाद को कारागार मिलता है, उसकी पत्नी के व्रत से वह छूटता है, और प्रसाद की उपेक्षा से दामाद की नाव डूबती है। इस खंड के अंत में पाणिनि, बोपदेव और पतंजलि की कथाओं के साथ दुर्गा-सप्तशती के तीनों चरित्रों का माहात्म्य भी है।

प्रतिसर्ग पर्व (3–4): पृथ्वीराज, आल्हा-ऊदल, संत और अंग्रेज़

तीसरा खंड विक्रम के बारह सौ वर्ष बाद की घटनाओं का है, और इसकी कल्पना यह है कि महाभारत के युद्ध में मरे कौरव, पांडव, यादव और श्रीकृष्ण के अंश फिर से जन्म लेते हैं। इसमें शालिवाहन द्वारा शकों की हार, भोजराज की दिग्विजय और कालिदास, जयचंद और पृथ्वीराज की उत्पत्ति और वैर, संयोगिता का स्वयंवर, और महावती नगरी के देशराज और वत्सराज के पुत्रों की लंबी युद्ध-कथाएँ हैं। पाठ में स्वयं हरि कहते हैं कि देशराज के पुत्र के रूप में मेरा अंश "उदयसिंह" जन्मेगा और "आह्लाद" मेरे धाम का अंश होगा, यानी लोक-काव्य के आल्हा और ऊदल। खंड का अंत सब राजाओं के अंतिम महायुद्ध, पृथ्वीराज की मृत्यु और दिल्ली में म्लेच्छ राज्य से होता है।

चौथे खंड में एक के बाद एक आचार्यों और संतों की उत्पत्ति-कथाएँ हैं, अधिकतर देवताओं के अंशावतार के रूप में: रामानंद, निम्बादित्य, मध्वाचार्य, श्रीधराचार्य, विष्णुस्वामी, भट्टोजि दीक्षित, वराहमिहिर, धन्वंतरि, सुश्रुत, जयदेव, कृष्ण चैतन्य, शंकराचार्य, गोरखनाथ, रामानुज, नामदेव, कबीर, पीपा, नानक, नित्यानंद और रैदास। साथ ही तैमूर, अकबर और औरंगज़ेब, दक्षिण में शिवाजी, नादिरशाह, और फिर "गुरुंड" लोगों का व्यापार के लिए भारत आना और कलकत्ता से राज करना। अंत में कलियुग के चौथे चरण और कल्कि अवतार की कथा है।

इसी खंड में कुछ जातियों और कुलनामों की उत्पत्ति भी बताई गई है। अध्याय 21 के अनुसार कण्व ब्राह्मण के दस पुत्र हुए, जिनके नाम उनके काम के अनुसार थे: उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्निहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पांडे और चतुर्वेदी, और उन्हीं से ये वंश चले। अध्याय 2 में अजमेर और तोमर वंश के वृत्तांत के साथ जाट और कुछ और समुदायों की उत्पत्ति की कथा है, और अध्याय 3 में शुक्ल नाम के अग्निवंशी राजा द्वारका में राज करते हैं। यह सामग्री उन समुदायों के इतिहास के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए उपयोगी है कि इस पर्व के रचनाकार अपने समय के समाज को पुराण की भाषा में कैसे दर्ज कर रहे थे।

अध्याय 22 का पाठ इस बारे में बहुत स्पष्ट है: "विकट" के वंश में उत्पन्न, वानर जैसे मुख वाले गुरुंड व्यापार के लिए यहाँ आए; उन्हें कलकत्ता नगरी में स्थापित किया गया; पश्चिम के विकट द्वीप में उनकी रानी "विकटावती" थी, जो "अष्ट-कौशल" (आठ परिषदों) के मार्ग से राज-मंत्रणा करती थी; और विक्रम संवत 1840 के आसपास उनका राजा हुआ। विषयानुक्रमणिका में संपादक ने "अष्टकौशल्य" के आगे कोष्ठक में "पार्लमेन्ट" लिखा है।

प्रतिसर्ग पर्व कब लिखा गया? विद्वानों का मत

भविष्य पुराण की सबसे बड़ी बहस प्रतिसर्ग पर्व पर है। कुछ लोग इसे सचमुच की भविष्यवाणी मानते हैं, क्योंकि इसमें आदम, नूह जैसा जल-प्रलय, विक्रमादित्य, पृथ्वीराज, अकबर, शिवाजी और अंग्रेज़ों तक का वर्णन है। पर पाठ के अपने शब्द इसकी तिथि के बारे में कुछ स्पष्ट बातें बताते हैं: इसमें कलकत्ता नगर, पश्चिमी द्वीप की रानी और आठ परिषदों के शासन का उल्लेख है, और विक्रम संवत 1840 (लगभग ईस्वी 1783) के बाद के गुरुंड राजाओं की गिनती है। इसलिए इस अंश का आज का रूप ईस्ट इंडिया कंपनी के बंगाल-शासन से पहले का नहीं हो सकता।

Wilson के अनुभव से भी यही संकेत मिलता है। 1840 में उन्होंने लिखा कि नाम के अनुसार यह पुराण "भविष्यवाणियों का ग्रंथ" होना चाहिए, जैसा मत्स्य पुराण संकेत करता है, पर ऐसा कोई ग्रंथ मौजूद भी है या नहीं, यह संदिग्ध है। उनकी और ईस्ट इंडिया कंपनी के पुस्तकालय की प्रतियों में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी, और "प्रतिसर्ग" उन्हें केवल एक भाग के नाम के रूप में मिला। उनका निष्कर्ष था कि उनके पास जो ग्रंथ है, वह वास्तव में पुराण न होकर धार्मिक कर्मकांड की एक पुस्तिका है।

इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा भविष्य पुराण नया है। मत्स्य पुराण की परिभाषा में सूर्य की महिमा इसका मुख्य विषय है, और ब्राह्म पर्व का सौर-धर्म और साम्ब-कथा ठीक यही है। इन तीनों बातों को साथ रखने पर यही चित्र बनता है कि भविष्य पुराण अलग-अलग समय की परतों से बना है: ब्राह्म पर्व का सूर्य-भाग उसका पुराना केंद्र है, उत्तर पर्व व्रतों और दानों का बाद का संग्रह है, और प्रतिसर्ग पर्व सबसे नई परत है।

उत्तर पर्व: श्रीकृष्ण के मुख से व्रत, त्योहार और महादान

उत्तर पर्व में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के बाद व्यास आदि ऋषि उनसे मिलने आते हैं, और युधिष्ठिर अपने बंधु-बांधवों के वध से लगे पाप से छूटने का उपाय पूछते हैं। फिर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को ब्रह्मांड की उत्पत्ति, भगवान की माया का दर्शन, जन्म और संसार के दोष, पाप के भेद और यम-यातनाएँ बताते हैं, और उसके बाद तिथियों के क्रम से व्रतों की लंबी सूची आती है। अंतिम अध्याय में कृष्ण-युधिष्ठिर संवाद पूरा होता है और कृष्ण द्वारका लौटते हैं।

आज के बहुत-से प्रचलित व्रतों की विधि और कथा यहाँ है: यम-द्वितीया, हरितालिका तृतीया (यहाँ "हरिताली"), अक्षय तृतीया, अंगारक चतुर्थी, नाग-पंचमी, जन्माष्टमी, गोवत्स द्वादशी, भीष्म-पंचक, अनंत चतुर्दशी, शिव चतुर्दशी, वट-सावित्री, संक्रांति का उद्यापन, शनैश्चर व्रत, अगस्त्य को अर्घ्य, और माघ-स्नान। उत्सवों में फाल्गुन पूर्णिमा का उत्सव (होली), श्रावण पूर्णिमा का रक्षाबंधन, महानवमी, इंद्रध्वज और दीपावली हैं। Wilson ने लिखा कि इनमें से कई उत्सव अब या तो नहीं होते या अलग ढंग से होते हैं, जैसे रथयात्रा और वसंत का मदनोत्सव।

पर्व का अंतिम भाग दानों का है: कई प्रकार के धेनु-दान (तिल, जल, घी, नमक, सोना, रत्न आदि की प्रतीक गाय), गोसहस्र-दान, भूमि-दान, घर, अन्न, विद्या और प्याऊ का दान, तुलापुरुष, हिरण्यगर्भ, ब्रह्मांड, कल्पवृक्ष, सप्तसागर जैसे महादान, और धान्य, नमक, गुड़, सोना, तिल, कपास, घी, रत्न, चाँदी और शक्कर के "पर्वत" का दान। राजाओं के लिए नवग्रह-यज्ञ, कोटि-होम और महाशांति की विधि भी है।

रक्षाबंधन का मूल मंत्र

रक्षाबंधन पर जो मंत्र आज भी पढ़ा जाता है, "येन बद्धो बली राजा", वह भविष्य पुराण के उत्तर पर्व के रक्षाबंधन-विधि वाले अध्याय में है। पर ध्यान देने की बात यह है कि वहाँ इसका रूप आज से अलग है: श्रावण पूर्णिमा को घर को गोबर से लीपकर, चौक पर आसन रखकर राजा अपने मंत्रियों, पुरोहित और मित्रों के साथ बैठता है, पहले देवताओं, ब्राह्मणों और सुहागिन स्त्रियों की पूजा होती है, और फिर पुरोहित इस मंत्र से राजा को रक्षा बाँधता है।

अगले श्लोक में कहा गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और सब मनुष्यों को ब्राह्मणों की पूजा करके रक्षा-बंधन करना चाहिए, और जो इस विधि से रक्षा बाँधता है, वह पूरे वर्ष दोषों से रहित और सुखी रहता है। यानी इस पुराण में रक्षाबंधन सबके लिए एक वार्षिक रक्षा-विधि है, जिसमें पुरोहित यजमान को रक्षा बाँधता है; आज का भाई-बहन वाला रूप इसका बाद का लोक-विकास है, जिसका उल्लेख यहाँ नहीं है।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः । तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

जिस (रक्षा) से महाबली दानवराज बलि बाँधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बाँधता हूँ; हे रक्षे, (अपने स्थान से) मत हिलना, मत हिलना।

— भविष्यपुराणम् (ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग, उत्तर पर्व) — संस्कृत विकिस्रोत, उत्तर पर्व 4.137.20

महत्व और आज के लिए अर्थ

भविष्य पुराण का असली महत्व उसके नाम वाली "भविष्यवाणियों" में नहीं, बल्कि हिंदू घरों के रोज़ के धार्मिक जीवन में है। सत्यनारायण की कथा, रक्षाबंधन का मंत्र, नाग-पंचमी, हरितालिका, वट-सावित्री और अनंत चतुर्दशी के व्रत, रविवार और सप्तमी के सूर्य-व्रत, और कुएँ, पेड़ और तालाब की प्रतिष्ठा, यह सब इसी पुराण की परंपरा में है। सूर्य-उपासना के इतिहास के लिए यह पुराण-साहित्य का सबसे बड़ा स्रोत है।

और इसका मध्यम पर्व एक ऐसी बात कहता है जो हर समय के लिए है: कुआँ खुदवाना, तालाब बनवाना, पेड़ लगाना और गायों के लिए चरागाह छोड़ना भी धर्म है, यज्ञ जितना ही। पुराण की दृष्टि में समाज के लिए किया गया काम पूजा का ही एक रूप है।

आगे पढ़ें

  • पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
  • मत्स्य पुराण — मत्स्य-रूप भगवान ने प्रलय के जल में नाव पर बैठे राजा मनु को सुनाया: सृष्टि, पितर, वंश, व्रत, तीर्थ, गोत्र, सावित्री, राजधर्म, मूर्ति-मंदिर और सोलह महादान
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  • श्रीकृष्ण — साम्ब के पिता; उत्तर पर्व के वक्ता
  • वेदव्यास — सुमन्तु के गुरु
  • गोत्र और प्रवर — मध्यम पर्व का गोत्र-प्रवर अध्याय

स्रोत एवं संदर्भ

  • विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.22
  • भविष्यपुराणम् (ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग, उत्तर पर्व) — संस्कृत विकिस्रोत — संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org) · ब्राह्म पर्व 1.1.68–69, ब्राह्म पर्व 1.1.103–106, ब्राह्म पर्व 1.1.2–1.1.38, 1.1.67–69, चारों पर्वों की विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व, विषयानुक्रमणिका, मध्यम पर्व, भाग 1–3, विषयानुक्रमणिका, प्रतिसर्ग पर्व, खंड 1–4, विषयानुक्रमणिका, उत्तर पर्व, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 2–15, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 16–21, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 22–46, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 32, 37–38, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 33–36, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 47–114, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 48, 62–63, 79, 121–123, 153–155, 173–180, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 113–120, 148, 153–156, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 1.72.10–13, 1.73.38–42, ब्राह्म पर्व 1.66.22–27, 1.72.12, ब्राह्म पर्व 127–140, विषयानुक्रमणिका, ब्राह्म पर्व 139–147, विषयानुक्रमणिका, मध्यम पर्व 1.1–1.11, 3.1–3.17, विषयानुक्रमणिका, प्रतिसर्ग पर्व 3.1.1–3.1.5, प्रतिसर्ग पर्व 3.1.4.17–19, 3.1.5.2–3, प्रतिसर्ग पर्व 3.1.6–7, प्रतिसर्ग पर्व 3.1.7.14–16, प्रतिसर्ग पर्व 3.2.1–22, विषयानुक्रमणिका, प्रतिसर्ग पर्व 3.2.24–3.2.25, प्रतिसर्ग पर्व 3.2.26–35, विषयानुक्रमणिका, प्रतिसर्ग पर्व 3.3.1.31–33, प्रतिसर्ग पर्व 3.3, विषयानुक्रमणिका, प्रतिसर्ग पर्व 3.4.7–3.4.26, विषयानुक्रमणिका, प्रतिसर्ग पर्व 3.4.2–3, 3.4.21, विषयानुक्रमणिका, प्रतिसर्ग पर्व 3.4.22.71–77, प्रतिसर्ग पर्व, खंड 4 विषयानुक्रमणिका, उत्तर पर्व 1–6, 207–208, विषयानुक्रमणिका, उत्तर पर्व 14–140, विषयानुक्रमणिका, उत्तर पर्व 141–204, विषयानुक्रमणिका, उत्तर पर्व 4.137.16–20, उत्तर पर्व 4.137.21–22, ब्राह्म, मध्यम, उत्तर पर्व; प्रतिसर्ग 3.2.24–29, मध्यम पर्व 1.9–1.11, 3.1–3.17, विषयानुक्रमणिका, उत्तर पर्व 4.137.20
  • मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.31–32, 53.31, 53.32
  • The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, pp. lxii–lxiv, Preface, p. lxiii, Preface, p. lxiv, Preface, pp. lxii–lxiii, Preface, pp. lxiii–lxiv, Preface, pp. lxiv–lxv

भविष्य पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न