स्कंद पुराण क्या है?
स्कंद पुराण अठारह पुराणों की सूची में तेरहवें स्थान पर है, वराह के बाद और वामन से पहले। मत्स्य पुराण इसकी परिभाषा देता है: जिसमें षण्मुख (छह मुख वाले स्कंद) ने तत्पुरुष कल्प के वृत्तांत को अनेक चरित्रों से बढ़ाकर माहेश्वर धर्मों का वर्णन किया, वह "स्कांद" पुराण है, और मनुष्यों में इसके इक्यासी हज़ार एक सौ श्लोक कहे जाते हैं। भागवत भी यही संख्या देता है। इस तरह यह सब पुराणों में सबसे बड़ा है, पद्म (55,000) से भी बहुत बड़ा।
संख्या के बारे में दूसरे ग्रंथ अलग बात कहते हैं, और यह स्वयं बताता है कि यह पुराण बढ़ता रहा। भविष्य पुराण के पहले अध्याय में कहा गया है कि सब पुराण मूल में बारह-बारह हज़ार के थे और आख्यानों से बढ़े, "जैसे स्कंद पुराण सौ हज़ार का हुआ, यह लोग जानते हैं"। Wilson ने लिखा कि देवी-भागवत इसे 81,000 और रेवा-माहात्म्य 84,000 श्लोकों का बताता है।
स्कंद पुराण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह असल में भारत के तीर्थों का एक विशाल कोश है। उत्तर में केदार और बदरी से लेकर दक्षिण में अरुणाचल, वेंकटाचल और सेतु तक, पूर्व में पुरी से पश्चिम में प्रभास, अर्बुद (आबू) और द्वारका तक, और बीच में अयोध्या, काशी, उज्जैन और नर्मदा तक, लगभग हर बड़े तीर्थ का एक अलग खंड या माहात्म्य इसमें मिलता है।
स्कान्दं नाम पुराणं च ह्येकाशीतिर्निगद्यते । सहस्राणि शतं चैकमिति मर्त्येषु गद्यते ॥स्कांद नाम का पुराण इक्यासी हज़ार एक सौ (श्लोकों का) कहा जाता है; मनुष्यों में यही (संख्या) कही जाती है।
संरचना: सात खंड, और एक पुरानी बहस
आज जो छपा पाठ प्रचलित है और जो संस्कृत विकिस्रोत पर है, उसमें सात खंड हैं, और हर खंड के भीतर कई उप-खंड या माहात्म्य हैं: माहेश्वर खंड (केदार, कौमारिका, अरुणाचल), वैष्णव खंड (वेंकटाचल, पुरुषोत्तम, बदरिकाश्रम, कार्तिक, मार्गशीर्ष, भागवत, वैशाख, अयोध्या), ब्रह्म खंड (सेतु, धर्मारण्य, ब्रह्मोत्तर), काशी खंड, अवंती खंड (अवंतीक्षेत्र, चौरासी लिंग, रेवा), नागर खंड, और प्रभास खंड (प्रभासक्षेत्र, वस्त्रापथ, अर्बुद, द्वारका)। विकिस्रोत पर एक आठवाँ "अम्बिका खंड" भी है, जो प्रयाग में सूत और ऋषियों के मिलन और व्यास-सनत्कुमार संवाद में स्कंद की उत्पत्ति की कथा से शुरू होता है।
पर 1840 में Wilson ने लिखा कि "यह सर्वमान्य है कि स्कंद पुराण एक संग्रहित रूप में कहीं मौजूद नहीं है"; भारत के अलग-अलग भागों में संहिताओं, खंडों और माहात्म्यों के रूप में जो टुकड़े इसके बताए जाते हैं, उनका कुल आकार उसकी कही संख्या से भी बहुत बड़ा है। उनके समय में सूत, सनत्कुमार, सौर और कापिल संहिताएँ, और ब्रह्मोत्तर, रेवा, शिवरहस्य, हिमवत जैसे खंड प्रचलित थे, और एक सूची में सात संहिताएँ और बारह खंड गिने गए थे। यानी स्कंद पुराण को "संहिताओं" में भी बाँटा जाता रहा है और "खंडों" में भी।
| खंड | उप-भाग और मुख्य विषय | स्रोत |
|---|---|---|
| 1. माहेश्वर | केदार खंड (दक्ष-यज्ञ, समुद्र-मंथन, शिव-पार्वती विवाह, तारक-वध, शिवरात्रि); कौमारिका खंड (महीसागर-संगम, स्तंभतीर्थ, सोमनाथ, बर्बरीक); अरुणाचल माहात्म्य (अग्नि-स्तंभ और अरुणाचल पर्वत) | स्कंद पुराण (मूल संस्कृत), खंड 1, विषयानुक्रमणिका |
| 2. वैष्णव | वेंकटाचल (श्रीनिवास और पद्मावती); पुरुषोत्तम (जगन्नाथ, इंद्रद्युम्न); बदरिकाश्रम; कार्तिक, मार्गशीर्ष और वैशाख मास के माहात्म्य; भागवत-माहात्म्य; अयोध्या-माहात्म्य | स्कंद पुराण (मूल संस्कृत), खंड 2, विषयानुक्रमणिका |
| 3. ब्रह्म | सेतु खंड; धर्मारण्य खंड (मोहेरक पुर और मोढ ब्राह्मण); ब्रह्मोत्तर खंड (पंचाक्षर मंत्र, शिवरात्रि) | स्कंद पुराण (मूल संस्कृत), खंड 3, विषयानुक्रमणिका |
| 4. काशी | अगस्त्य और विंध्य, लोपामुद्रा, मणिकर्णिका, गंगा-सहस्रनाम, राजा दिवोदास, चौंसठ योगिनियाँ, काशी के लिंग और तीर्थ | स्कंद पुराण (मूल संस्कृत), खंड 4, विषयानुक्रमणिका |
| 5. अवंती | अवंतीक्षेत्र (महाकाल-वन); अवंती के चौरासी लिंग; रेवा खंड (नर्मदा, मार्कण्डेय, सत्यनारायण कथा) | स्कंद पुराण (मूल संस्कृत), खंड 5, विषयानुक्रमणिका |
| 6. नागर | हाटकेश्वर क्षेत्र, त्रिशंकु, राजा चमत्कार, शंख-लिखित, अनेक तीर्थ | स्कंद पुराण (मूल संस्कृत), खंड 6, विषयानुक्रमणिका |
| 7. प्रभास | प्रभासक्षेत्र (सोमेश्वर), वस्त्रापथ क्षेत्र, अर्बुद खंड (अर्बुदाचल), द्वारका-माहात्म्य | स्कंद पुराण (मूल संस्कृत), खंड 7, विषयानुक्रमणिका |
केदार खंड: दक्ष-यज्ञ से कुमार के जन्म तक
पूरा पुराण केदार खंड से शुरू होता है: व्यास के शिष्य लोमश सूत नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों के पास आते हैं, और ऋषि शिव की महिमा पूछते हैं। पहली कथा दक्ष-यज्ञ की है: दक्ष ने शिव की निंदा करके शिव और उनके गणों को शाप दिया, नंदी ने बदले में शाप दिया; कनखल में यज्ञ हुआ, दधीचि ने शिव को न बुलाने का विरोध किया और यज्ञ के नाश की बात कहकर चले गए; सती शिव के मना करने पर भी पिता के घर गईं, और फिर यज्ञ का विध्वंस और बकरे का सिर जोड़कर दक्ष को जीवित करना।
केदार खंड में शिव-भक्ति की कुछ बहुत लोकप्रिय कथाएँ हैं। महापापी इंद्रसेन को यमदूत ले गए, पर "आहर, प्रहर" जैसे शब्दों में अनजाने ही "हर" नाम बोलने के कारण यम ने उसका सत्कार किया और वह शिव का गण बना। नंदी नाम के वैश्य रत्नों से शिव की पूजा करते थे, और एक किरात (शिकारी) मुँह में भरे जल से शिव को स्नान कराता था; शिव ने किरात की भक्ति को बड़ा माना। फिर दारुवन की कथा से लिंग-पूजा की शुरुआत, और शिवरात्रि की कथा: एक किरात ने अनजाने में रात भर जागकर शिवरात्रि का व्रत कर लिया और शिव-लोक गया।
आगे बलि की शरण में गए इंद्र और फिर देव-दानवों द्वारा मंदराचल और वासुकि से समुद्र-मंथन, तारकासुर से देवताओं की हार, आकाशवाणी कि तारक को केवल शिव का पुत्र मार सकता है, हिमालय से कन्या के लिए प्रार्थना, पार्वती का तप, सप्तर्षियों द्वारा विवाह की बात पक्की करना, बड़ी धूमधाम से विवाह, और कुमार के जन्म से तारक के वध तक की कथा है।
केदार खंड में कुछ प्रसिद्ध कथाओं के अपने अलग रूप भी हैं। एक कथा के अनुसार रावण के शाप से नंदी का मुख वानर जैसा हुआ, और नंदी ने बदले में शाप दिया कि वानरों के साथ आए किसी के हाथ से रावण की मृत्यु होगी; फिर देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु ने राम-अवतार लिया, देवता वानरों के रूप में अंशावतार बने, और राम के हाथ मरकर रावण को शिव-सायुज्य मिला। वामन-बलि की कथा में शुक्र दान रोकते हैं और बलि को शाप देते हैं; दो पगों में ब्रह्मांड नापने के बाद तीसरे पग के लिए बलि की पत्नी विंध्यावली प्रह्लाद के साथ आकर प्रार्थना करती हैं कि तीसरा पग मेरे, मेरे पुत्र के और मेरे पति के, तीनों के सिर पर रखिए; प्रसन्न भगवान बलि को सुतल भेजते हैं और स्वयं पाताल में बलि के पास रहते हैं। एक और कथा में पार्वती जुए में शिव का सब कुछ जीत लेती हैं, शिव कैलास छोड़कर तपोवन चले जाते हैं, और विरह में पार्वती शबरी का रूप धरकर उनके पास जाती हैं।
कौमारिका और अरुणाचल: स्तंभतीर्थ, बर्बरीक और अग्नि-स्तंभ
कौमारिका खंड अर्जुन की तीर्थयात्रा से शुरू होता है: दक्षिण समुद्र के पाँच तीर्थों में ग्राह (मगर) रहते थे, जिनके डर से तपस्वी वहाँ नहाते नहीं थे। अर्जुन ने उनमें उतरकर ग्राहों को पकड़ा, तो वे शापित अप्सराएँ निकलीं, जो एक ब्राह्मण के शाप से ग्राह बनी थीं। फिर नारद भृगु से महीसागर-संगम (माही नदी और समुद्र का संगम) पर स्थित "स्तंभतीर्थ" की महिमा सुनते हैं, जो इस खंड का केंद्र है। इसी खंड में नारद द्वारा तीर्थ की रक्षा के लिए सिद्धांबिका आदि चौदह महाशक्तियों की स्थापना, और सोमनाथ का माहात्म्य भी है।
कौमारिका खंड में बर्बरीक की वह कथा है जो आज बहुत प्रसिद्ध है। भीम के पुत्र घटोत्कच ने श्रीकृष्ण के कहने पर प्राग्ज्योतिषपुर की कामकटंकटा को प्रश्नों और युद्ध में जीतकर विवाह किया, और उनका पुत्र बर्बरीक हुआ। कृष्ण ने उसे क्षत्रिय-धर्म बताकर देवी की आराधना का उपदेश दिया और उसका नाम "सुहृदय" रखा। आगे की कथा में उसका सिर कटता है, देवी अमृत से उस सिर को अमर करती हैं, कृष्ण उसे वर देते हैं, और वह सिर पहाड़ की चोटी से पूरा महाभारत युद्ध देखता है। युद्ध के बाद जब भीम को गर्व हुआ, तो बर्बरीक के सिर ने बताया कि सारी सेना को तो हरि-हर के एक ही रूप वाले परम पुरुष ने मारा था।
अरुणाचल माहात्म्य, जो दक्षिण के द्रविड़ देश के अरुणाचलेश्वर का है, ब्रह्मा और सनक के संवाद में है। ब्रह्मा और विष्णु अपनी-अपनी श्रेष्ठता पर लड़ रहे थे कि उनके बीच एक अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ; विष्णु वराह बनकर उसका नीचे का छोर ढूँढने गए और ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर का, पर दोनों में से कोई अंत नहीं पा सका। दोनों की प्रार्थना पर शिव ने उस तेज को समेटकर "अरुणाचल" पर्वत के रूप में स्थावर लिंग का रूप लिया। इसी माहात्म्य में यह कथा भी है कि पार्वती ने खेल में शिव की तीनों आँखें (सूर्य, चंद्र और अग्नि) ढक दीं, जिससे जगत में अंधकार छा गया।
ब्रह्म खंड: सेतु, धर्मारण्य और ब्रह्मोत्तर
ब्रह्म खंड के तीन भाग हैं। पहला सेतु खंड है (इसका विवरण नीचे अलग से)। दूसरा धर्मारण्य खंड है, जिसे व्यास युधिष्ठिर को सुनाते हैं और जिसका मुख्य स्थान "मोहेरक" पुर बताया गया है। इसमें कथा है कि राम ने धर्मारण्य के तीर्थों का जीर्णोद्धार किया और अठारह हज़ार ब्राह्मणों को पचपन गाँव दिए। बाद के कलियुग में कान्यकुब्ज के राजा आम की बेटी रत्नगंगा का विवाह कुंभीपाल (जिसे पाठ "कुमारपाल" भी कहता है) से हुआ, जिसने मोहेरक को राजधानी बनाकर जैन धर्म फैलाया; तब राम के दिए शासन-पत्र वाले मोढ ब्राह्मण अपनी वृत्ति बचाने राजा आम के पास गए।
सेतु खंड (52 अध्याय) रामेश्वरम क्षेत्र का माहात्म्य है, और विकिस्रोत पर इसकी अलग विषय-सूची न होने पर भी हर अध्याय की पुष्पिका उसका विषय बता देती है। पहले अध्याय में सेतु जाने का फल है, दूसरे में सेतु का निर्माण, और फिर गंधमादन पर्वत के एक-एक तीर्थ की कथा: चक्रतीर्थ, वेतालवरद, पापविनाशन, सीता-सरोवर (जहाँ इंद्र ब्रह्महत्या से छूटे), मंगल-तीर्थ, अमृतवापी, ब्रह्मकुंड, हनुमत्कुंड, अगस्त्य-तीर्थ, राम-तीर्थ (जहाँ युधिष्ठिर के असत्य-कथन का दोष शांत हुआ), लक्ष्मण-तीर्थ (जहाँ बलराम की ब्रह्महत्या छूटी), जटा-तीर्थ, लक्ष्मी, अग्नि, शिव, शंख, कोटि-तीर्थ, धनुष्कोटि, क्षीरकुंड, कपि-तीर्थ, और गायत्री-सरस्वती तीर्थ।
इन तीर्थों की कथाओं का एक साझा सूत्र है: बड़े-बड़े पात्रों के बड़े दोष यहाँ के स्नान से शांत होते हैं। कोटि-तीर्थ में कृष्ण अपने मामा कंस के वध के दोष से मुक्त हुए, और धनुष्कोटि में अश्वत्थामा सोते हुए लोगों को मारने के महापाप से। और अध्याय 43 से 49 रामनाथ के हैं: रावण ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य का पोता और विश्रवा मुनि का पुत्र था, इसलिए उसके वध से राम को ब्रह्महत्या लगी; उसकी शांति के लिए राम ने गंधमादन पर रामनाथ लिंग की प्रतिष्ठा की। एक प्रसंग में हनुमान ने अनजाने में राम के स्थापित उस लिंग को उखाड़ने का साहस किया और मूर्छित होकर गिर पड़े; होश आने पर उन्होंने सीता और राम की स्तुति की। राम ने कहा, "मेरे स्थापित इस लिंग को ब्रह्मा, विष्णु या इंद्र भी नहीं उखाड़ सकते; आगे से शिव का द्रोह न करना," और वर दिया कि जहाँ तुम गिरे, वह कुंड तीनों लोकों में तुम्हारे नाम से प्रसिद्ध होगा, और उसमें स्नान से महापातक नष्ट होंगे। अध्याय 49 में राम आदि द्वारा रामनाथ की स्तुति है, और अंतिम अध्यायों में सेतुमाधव की महिमा और सेतु-यात्रा का पूरा क्रम।
तीसरा, ब्रह्मोत्तर खंड, शिव-भक्ति का एक लोकप्रिय ग्रंथ है। यह "नमः शिवाय" पंचाक्षर मंत्र की महिमा से शुरू होता है: मथुरा के राजा दाशार्ह ने काशी की राजकुमारी से विवाह किया, पर जब उसने व्रत में लगी रानी को बलपूर्वक छुआ तो उसका शरीर तपे लोहे जैसा गर्म लगा; रानी ने बताया कि यह पंचाक्षर मंत्र का प्रभाव है। राजा ने गर्ग से मंत्र लिया, तो उसके शरीर से करोड़ों पाप कौओं के रूप में निकलकर भस्म हो गए। इसके बाद माघ कृष्ण चतुर्दशी की महाशिवरात्रि, उपवास, लिंग-पूजा और बिल्वपत्र की महिमा है, इक्ष्वाकु-वंशी राजा मित्रसह की कथा के साथ।
काशी खंड: अगस्त्य, विंध्य और राजा दिवोदास
काशी खंड स्कंद पुराण का सबसे प्रसिद्ध भाग है, और Wilson के अनुसार अकेले इसमें पंद्रह हज़ार श्लोक हैं। इसकी शुरुआत एक सुंदर कथा से होती है: नारद ने विंध्य पर्वत से कहा कि मेरु तुम्हें तुच्छ समझता है, तो विंध्य इतना ऊँचा बढ़ा कि सूर्य का मार्ग रुक गया और त्रिलोक में एक ओर रात और दूसरी ओर तपती धूप रह गई। देवता काशी में रहने वाले अगस्त्य के पास गए। अगस्त्य को काशी छोड़नी पड़ी, जिसका उन्हें बहुत दुःख हुआ; वे लोपामुद्रा के साथ दक्षिण की ओर चले, और उन्हें आते देख विंध्य झुक गया।
इस खंड में लोपामुद्रा के प्रसंग से पतिव्रता के आचार, मणिकर्णिका और विश्वेश्वर की यात्रा, गंगा-माहात्म्य और "गंगा-सहस्रनाम" स्तोत्र (उनके लिए जो गंगा-स्नान नहीं कर सकते), गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के धर्म, और मृत्यु के निकट होने के चिह्न भी हैं। फिर राजा दिवोदास की कथा: जब दिवोदास काशी में रहकर पृथ्वी पर राज करने लगे, तो विश्वेश्वर आदि सब देवता पृथ्वी छोड़कर मंदराचल चले गए। काशी के वियोग में दुःखी शिव ने दिवोदास को काशी से निकालने के लिए पहले चौंसठ योगिनियाँ भेजीं, और फिर एक के बाद एक उपाय किए।
Wilson ने काशी खंड के बारे में लिखा कि इसकी कई कथाएँ बचकानी हैं, पर कुछ ऊँचे दर्जे की भी हैं। उनके अनुसार अगस्त्य की कथा शायद कथा-शैली में दक्षिण भारत में हिंदू धर्म के फैलने की स्मृति है, और दिवोदास की कथा में काशी में भी शिव-पूजा के कुछ समय दबने की परंपरा झलकती है, बौद्धों के प्रभाव के बढ़ने से पहले। उनका मत था कि काशी खंड का अधिकांश भाग महमूद ग़ज़नवी के बनारस पर पहले हमले से पहले का है।
अवंती खंड: महाकाल, चौरासी लिंग और नर्मदा
अवंती खंड उज्जैन का है। अवंतीक्षेत्र माहात्म्य महाकाल की स्तुति और महाकाल-वन की प्रशंसा से शुरू होता है, सनत्कुमार और व्यास के संवाद में। इसके बाद "अवंती के चौरासी लिंग" वाला भाग उमा-महेश्वर संवाद में हर लिंग की अलग कथा देता है: अगस्त्येश्वर (दैत्यों को मारकर पछताए अगस्त्य ने यह लिंग स्थापित किया), गुहेश्वर (मंकणक ऋषि के हाथ से शाक-रस निकला तो वे आनंद में नाचने लगे और सारा चराचर उनके साथ नाचने लगा), ढुंढेश्वर, डमरुकेश्वर आदि।
अवंती खंड का तीसरा भाग "रेवा खंड" नर्मदा का है। इसके पहले अध्याय में अठारह महापुराणों और उपपुराणों के नाम और संख्याएँ हैं। फिर वनवास में विंध्य पहुँचे पांडवों को मार्कण्डेय तीर्थों की महिमा सुनाते हैं और कहते हैं कि नर्मदा का माहात्म्य इन सबसे बढ़कर है। वे अपना अनुभव बताते हैं: प्रलय के जल में भटकते हुए एक स्त्री नाव लेकर आई, और वे मनु के साथ उस नाव पर चढ़े; वह स्त्री नर्मदा थी, जो शिव की कृपा से अक्षय है और सात कल्पों तक बहती है। इसी में नर्मदा के पंद्रह नाम और नर्मदा के तट के सैकड़ों तीर्थ हैं।
छपे पाठ में रेवा खंड के बिल्कुल अंत में, तीर्थों की गिनती और "रेवा खंड की पुस्तक के दान" के फल के बाद, सत्यनारायण-व्रत की कथा के अध्याय आते हैं, और हर अध्याय की पुष्पिका कहती है: "श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायणव्रतकथायां"। घर-घर में पढ़ी जाने वाली कथा की पुस्तकें इसी पुष्पिका से अपना स्रोत बताती हैं। ध्यान देने की बात है कि GRETIL पर उपलब्ध रेवा खंड का दूसरा संस्करण 116 अध्यायों का है, और सत्यनारायण की एक अलग, विस्तृत कथा भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व में भी है।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः । स्तुवन्ति परया भक्त्या नर्मदां सप्तकल्पगाम् ॥आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव और मरुद्गण, सब सात कल्पों तक बहने वाली नर्मदा की परम भक्ति से स्तुति करते हैं।
नागर और प्रभास खंड: हाटकेश्वर, सोमनाथ, आबू और द्वारका
नागर खंड हाटकेश्वर क्षेत्र का है। इसकी पहली कथा लिंग-पूजा की उत्पत्ति की है: पत्नी के वियोग में दिगंबर घूमते शिव को ऋषियों ने शाप दिया, उनका लिंग वहीं गिरा, और देवताओं ने उसे हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थापित किया; लिंग के उखड़ने से पाताल से गंगा निकली। फिर त्रिशंकु की कथा है, जो सशरीर स्वर्ग जाना चाहता था, वसिष्ठ के पुत्रों के शाप से चांडाल बना और विश्वामित्र के साथ हाटकेश्वर आया। राजा चमत्कार की कथा भी यहीं है, जिसने बच्चे को दूध पिलाती हिरनी को मारा, उसके शाप से कोढ़ी हुआ, और हाटकेश्वर क्षेत्र के शंख-तीर्थ में नहाकर ठीक हुआ।
प्रभास खंड का पहला और सबसे बड़ा भाग प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य है, शिव-पार्वती संवाद में, जिसके केंद्र में सोमेश्वर (सोमनाथ) हैं: उनके पाँच मुखों वाले स्वरूप का वर्णन, उनकी स्तुति, और दिन के आठ कालों में उनके अलग-अलग रूप। इसके दूसरे अध्याय में कथा के लक्षण, अठारह महापुराणों और उपपुराणों के नाम, हर महापुराण की श्लोक-संख्या, और पुराणों की पुस्तक दान करने की विधि है।
अर्बुद खंड (आबू पर्वत) की कथा यह है कि वसिष्ठ की गाय एक गहरे गड्ढे में गिर गई, सरस्वती ने उसे जल से भरकर गाय को बाहर निकाला, और वसिष्ठ ने हिमालय से उस गड्ढे को भरने की प्रार्थना की, जिसके बाद नंदिवर्धन पर्वत वहाँ आया; इसी में गौतम के शिष्य उत्तंक की कुंडल वाली कथा भी है। द्वारका-माहात्म्य में ऋषि पूछते हैं कि कलियुग में विष्णु कहाँ रहते हैं; ब्रह्मा भी नहीं बता पाते, तो सब प्रह्लाद के पास जाते हैं, और प्रह्लाद द्वारका की कथा सुनाते हैं, जिसमें दुर्वासा के द्वारका आने का प्रसंग है।
कौन-सा भाग मूल है? विद्वानों के मत
स्कंद पुराण के बारे में विद्वानों में जितना मतभेद है, उतना शायद किसी और पुराण के बारे में नहीं। Wilson ने Colonel Vans Kennedy का मत दिया, जिन्होंने सूत संहिता के आधार पर लिखा था कि स्कंद पुराण में छह संहिताएँ, पाँच सौ खंड और पाँच लाख श्लोक हैं, जो सब पुराणों को मिलाकर कही गई संख्या से भी अधिक है, और Kennedy के अनुसार सब संहिताएँ और खंड प्रामाणिक माने जा सकते हैं, केवल माहात्म्य संदिग्ध हैं।
Wilson ने इसका उलटा तर्क दिया: इसके लिए कभी 81,100 से अधिक श्लोकों का दावा नहीं किया गया, इसलिए उससे ऊपर की हर चीज़ संदिग्ध है; और काशी खंड जैसे कई खंड भी माहात्म्यों जितने ही स्थानीय हैं, किसी मंदिर या लिंग की पवित्रता बताने वाले। उन्होंने यहाँ तक लिखा कि उन्हें संदेह है कि इनमें से कोई भी कभी स्कंद पुराण का हिस्सा था। उत्कल खंड (पुरी) के बारे में भी उन्होंने लिखा कि एक शैव पुराण में वैष्णव तीर्थ का वर्णन जोड़ने का बहाना शायद वहीं के भुवनेश्वर के शिव-मंदिरों से मिला।
आज के पाठक के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि "स्कंद पुराण में लिखा है" कहने पर यह पूछना चाहिए कि किस खंड या माहात्म्य में, क्योंकि अलग-अलग खंड अलग-अलग क्षेत्रों और समयों में बने और जुड़े। धर्मारण्य खंड की कथा में ही राम के समय से लेकर एक जैन-समर्थक राजा तक की परतें दिखती हैं, और भविष्य पुराण स्वयं स्कंद को "बढ़कर सौ हज़ार का हुआ" बताता है।
महत्व और आज के लिए अर्थ
आज भारत में शायद ही कोई बड़ा तीर्थ हो जिसकी स्थानीय परंपरा अपनी महिमा के लिए स्कंद पुराण का नाम न लेती हो। केदार, बदरी, तिरुमला, पुरी, अयोध्या, काशी, उज्जैन, नर्मदा-तट, सोमनाथ, आबू और द्वारका, सबके माहात्म्य इसमें हैं। सत्यनारायण की कथा, शिवरात्रि का व्रत, कार्तिक, मार्गशीर्ष और वैशाख के नियम, और पंचाक्षर मंत्र की महिमा भी इसी के अलग-अलग खंडों से आती है।
और इसकी कथाएँ एक ही बात बार-बार कहती हैं: भगवान भाव देखते हैं, साधन नहीं। रत्नों से पूजा करने वाले वैश्य से बढ़कर मुँह के पानी से स्नान कराने वाला किरात, अनजाने में "हर" बोलने वाला पापी इंद्रसेन, और अनजाने में रात भर जागने वाला शिकारी, ये सब यही सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति किसी भी रूप में पहुँच जाती है।
आगे पढ़ें
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- मत्स्य पुराण — मत्स्य-रूप भगवान ने प्रलय के जल में नाव पर बैठे राजा मनु को सुनाया: सृष्टि, पितर, वंश, व्रत, तीर्थ, गोत्र, सावित्री, राजधर्म, मूर्ति-मंदिर और सोलह महादान
- भविष्य पुराण — चार पर्वों में: ब्राह्म (तिथि-व्रत, सूर्य और साम्ब), मध्यम (कुएँ, बाग़, वास्तु, प्रतिष्ठा), प्रतिसर्ग (राजवंश, विक्रम-वेताल, सत्यनारायण, आल्हा-ऊदल, संत) और उत्तर (कृष्ण-युधिष्ठिर संवाद में व्रत, उत्सव और दान)
- पद्म पुराण — सात खंडों में: सृष्टि (पुष्कर और ब्रह्मा का यज्ञ), भूमि (सुकला, माता-पिता और गुरु-तीर्थ), स्वर्ग, ब्रह्म, पाताल (राम का अश्वमेध), उत्तर (कार्तिक, एकादशी, गीता और भागवत माहात्म्य) और क्रियायोगसार
- महर्षि अगस्त्य — काशी खंड की विंध्य-कथा
- महर्षि मार्कण्डेय — रेवा खंड के वक्ता
- श्रीकृष्ण — बर्बरीक, द्वारका और भागवत-माहात्म्य
स्रोत एवं संदर्भ
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.23
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.42–43, 53.43
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.13.7
- भविष्यपुराणम् (ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग, उत्तर पर्व) — संस्कृत विकिस्रोत — संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org) · ब्राह्म पर्व 1.1.103–105, प्रतिसर्ग पर्व 3.2.24–29, ब्राह्म पर्व 1.1.104–105
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, p. xxiv, Preface, pp. lxxii–lxxiii, Preface, p. lxxiii, Preface, pp. lxxiii–lxxiv
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- स्कन्द पुराण, रेवाखण्ड (अध्याय 1–116) — GRETIL e-text — GRETIL e-text (2020) · 4.39–56, अध्याय-सूची, 4.56
