शिव पुराण: सात संहिताओं में शिव-महिमा

सातों संहिताओं में: शिवरात्रि और ज्योति-स्तंभ, सती और दक्ष-यज्ञ, पार्वती का तप और शिव-विवाह, कार्तिकेय और गणेश, त्रिपुर और जलंधर, शिव के अवतार, बारह ज्योतिर्लिंग, रुद्राक्ष और पंचाक्षर

संक्षेप में

जिस ग्रंथ से शिवरात्रि का व्रत और बारह ज्योतिर्लिंगों की श्रद्धा जुड़ी है, वह शिव पुराण अठारह महापुराणों में चौथा है: चौबीस हज़ार श्लोक, सात संहिताएँ। इसमें ज्योति-स्तंभ, सती और पार्वती का चरित, शिव-पार्वती विवाह, कार्तिकेय और गणेश का जन्म, त्रिपुर और जलंधर का वध, शिव के अवतार और पंचाक्षर मंत्र की महिमा है।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में चौथा (विष्णु पुराण 3.6.21; शिव पुराण 1.2.56)
श्लोक-संख्या
24,000 (शिव पुराण 1.2.56; भागवत 12.13)
सात संहिताएँ
विद्येश्वर, रुद्र, शतरुद्र, कोटिरुद्र, उमा, कैलास, वायवीय (1.2.60–61)
मूल रूप
बारह संहिताएँ, एक लाख श्लोक; व्यास ने संक्षिप्त किया (1.2.50–56)
वक्ता
प्रयाग के महासत्र में व्यास-शिष्य सूत; कथाओं के भीतर नंदिकेश्वर और वायु
प्रसिद्ध अंश
शिवरात्रि और केतकी (विद्येश्वर), सती, पार्वती-विवाह, गणेश-जन्म, त्रिपुर-दाह (रुद्र), हनुमान और किरात (शतरुद्र), बारह ज्योतिर्लिंग और व्याध की शिवरात्रि (कोटिरुद्र), दुर्गा नाम (उमा), ओंकार (कैलास), पंचाक्षर (वायवीय)
अध्याय (विकिस्रोत पाठ)
विद्येश्वर 25; रुद्र 197 (सृष्टि 20, सती 43, पार्वती 55, कुमार 20, युद्ध 59); शतरुद्र 42; कोटिरुद्र 43; उमा 51; कैलास 23; वायवीय 76 (पूर्व 35, उत्तर 41)
इस पृष्ठ का आधार
विद्येश्वर और वायवीय पूर्व: GRETIL; बाकी सब: संस्कृत विकिस्रोत का पाठ और हर खंड की विषयानुक्रमणिका

शिव पुराण क्या है?

शिव पुराण की कथा प्रयाग में शुरू होती है। गंगा और यमुना के संगम पर, जिसे पाठ "धर्मक्षेत्र, महाक्षेत्र और ब्रह्मलोक का मार्ग" कहता है, सत्यव्रती ऋषि एक महासत्र कर रहे थे। सत्र की बात सुनकर व्यास के शिष्य, पुराणों के श्रेष्ठ वक्ता सूत वहाँ आए। ऋषियों ने उनकी पूजा की और कहा, "आपने व्यास से सारी पुराण-विद्या पाई है, आपसे कुछ छिपा नहीं; अब हमें एक ही बात सुननी है।"

वह बात कलियुग की चिंता थी। ऋषि लंबी सूची देते हैं: कलियुग में मनुष्य पुण्यहीन, दुराचारी, सत्य से विमुख, दूसरों की निंदा और दूसरों के धन में लगे होंगे; ब्राह्मण लोभ में वेद बेचकर जीएँगे, क्षत्रिय अपना धर्म छोड़कर युद्ध से भागेंगे, वैश्य तौल में बेईमानी करेंगे, और सब वर्ण अपने धर्म को छोड़ देंगे। ऐसे समय में इन जीवों का उद्धार कैसे होगा? शिव पुराण इसी प्रश्न का उत्तर है, और उसका उत्तर सरल है: शिव की भक्ति, उनकी कथा का श्रवण, कीर्तन और मनन।

विष्णु पुराण की अठारह पुराणों वाली सूची में चौथा नाम "शैव" है, और शिव पुराण स्वयं भी कहता है कि सात संहिताओं वाला यह शैव पुराण चौथा है। Wilson ने 1840 में ध्यान दिलाया था कि कुछ सूचियों में शैव की जगह वायु पुराण गिना जाता है, और यह प्रश्न आज भी विद्वानों में चर्चित है। उस पर इस पृष्ठ के अंत में विस्तार से बात है।

बारह से सात: संहिताओं की कथा

शिव पुराण अपनी रचना की कथा स्वयं बताता है, और यह आँकड़ों से भरी है। पहले शिव ने स्वयं जो पुराण रचा, उसकी बारह संहिताएँ थीं: विद्येश, रौद्र, वैनायक, औम, मातृ, रुद्रैकादशक, कैलास, शतरुद्र, कोटिरुद्र, सहस्रकोटिरुद्र, वायवीय और धर्म। इनके श्लोक भी गिनाए गए हैं: विद्येश के दस हज़ार; रौद्र, वैनायक, औम और मातृ के आठ-आठ हज़ार; रुद्रैकादशक के तेरह हज़ार; कैलास के छह हज़ार; शतरुद्र के उससे आधे यानी तीन हज़ार; कोटिरुद्र के उसके तिगुने यानी नौ हज़ार; सहस्रकोटिरुद्र के ग्यारह हज़ार; वायवीय के चार हज़ार और धर्म के बारह हज़ार।

इन सबका जोड़ एक लाख है, और पुराण स्वयं कहता है: "इस प्रकार शैव संख्या के भेद से यह एक लाख का है।" फिर व्यास ने इसे संक्षिप्त करके चौबीस हज़ार श्लोकों का बनाया, और यह शैव पुराण चौथा है, सात संहिताओं वाला। आगे यह भी कहा गया है कि सृष्टि के आरंभ में पुराण सौ करोड़ श्लोकों का था, द्वापर में अठारह भागों में बाँटकर चार लाख में संक्षिप्त किया गया, और उसमें शिव पुराण चौबीस हज़ार श्लोकों का है।

आज की सात संहिताएँ हैं: पहली विद्येश्वर, दूसरी रौद्री (रुद्र संहिता), तीसरी शतरुद्र, चौथी कोटिरुद्र, पाँचवीं उमा, छठी कैलास और सातवीं वायवीय। पुराण इन सात संहिताओं वाले दिव्य शिव पुराण को "ब्रह्म के तुल्य, सबसे ऊपर गति देने वाला" कहता है। ध्यान दें कि मूल बारह में से कुछ नाम (वैनायक, मातृ, धर्म) आज की सात में नहीं हैं।

छपे हुए पाठ में ये सात संहिताएँ आकार में बहुत अलग हैं। संस्कृत विकिस्रोत के पाठ में विद्येश्वर के 25 अध्याय हैं; रुद्र संहिता सबसे बड़ी है, पाँच खंडों में (सृष्टि 20, सती 43, पार्वती 55, कुमार 20 और युद्ध 59 अध्याय); शतरुद्र के 42, कोटिरुद्र के 43, उमा के 51 और कैलास के 23 अध्याय हैं; और वायवीय दो भागों में है, पूर्व के 35 और उत्तर के 41। हर संहिता और खंड के साथ उसकी अपनी विषयानुक्रमणिका भी है, जो हर अध्याय का विषय एक वाक्य में बताती है। इस पृष्ठ की सब कथाएँ इन्हीं मूल अध्यायों और अनुक्रमणिकाओं से ली गई हैं।

शिव पुराण: मूल बारह संहिताएँ और उनके श्लोक (विद्येश्वर संहिता 2.50–55 के अनुसार)
संहिताश्लोकस्रोत
विद्येश10,000शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.52
रौद्र, वैनायक, औम, मातृ8,000 प्रत्येकशिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.52–1.2.53
रुद्रैकादशक13,000शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.53
कैलास6,000शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.54
शतरुद्र3,000 (कैलास का आधा)शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.54
कोटिरुद्र9,000 (शतरुद्र का तिगुना)शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.54
सहस्रकोटिरुद्र11,000शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.54–1.2.55
वायवीय4,000शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.55
धर्म12,000शिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.55
कुल (मूल रूप)1,00,000; व्यास द्वारा संक्षिप्त: 24,000, सात संहिताओं मेंशिव पुराण (मूल संस्कृत, संहिता 1 और 7), 1.2.55–1.2.56

साध्य और साधन: श्रवण, कीर्तन, मनन

विद्येश्वर संहिता के तीसरे अध्याय में एक पुरानी कथा है। एक कल्प में छह कुलों के मुनियों में यह बड़ा विवाद हुआ कि "यह परम है, वह नहीं", और वे ब्रह्मा से पूछने गए: सब तत्त्वों से परे वह पुराण पुरुष कौन है? ब्रह्मा ने उत्तर दिया: "जहाँ से मन सहित वाणी लौट आती है, जिससे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इंद्र सहित सब कुछ पहले उत्पन्न होता है, वे सर्वज्ञ जगदीश्वर महादेव हैं; वे परम भक्ति से ही दिखते हैं, और किसी तरह नहीं।"

ब्रह्मा ने एक सुंदर बात भी कही: कृपा से भक्ति होती है और भक्ति से कृपा, जैसे अंकुर से बीज और बीज से अंकुर। फिर मुनियों ने पूछा कि साध्य क्या है, साधन क्या है और साधक कैसा हो। ब्रह्मा बोले: "साध्य है शिव-पद की प्राप्ति, साधन है उनकी सेवा, और साधक वह है जो उनकी कृपा से अनित्य फलों की इच्छा छोड़ दे।" वेद में कहे कर्म करके उनका फल शिव को अर्पित करना चाहिए।

और सब साधनों का सार ब्रह्मा ने तीन शब्दों में दिया: कानों से उनका श्रवण, वाणी से कीर्तन, और मन से मनन। यह क्रम भी समझाया: लोग आँख से देखी चीज़ों में लगते हैं, पर जो दिखता नहीं उसे कानों से सुनकर जानते हैं; इसलिए पहले गुरु के मुख से श्रवण, फिर कीर्तन, फिर मनन। मनन तक यह साधना पूरी होने पर धीरे-धीरे शिव-योग होता है। और जो इन तीनों में असमर्थ हो, वह लिंग और मूर्ति की पूजा करे: मंडप, गोपुर, वस्त्र, गंध, धूप, दीप, नैवेद्य, परिक्रमा और जप से; पुराण कहता है कि केवल लिंग-मूर्ति की पूजा से भी पहले के महापुरुष मुक्त हुए।

मनसा मननं तस्य महासाधनमुच्यते । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च मन्तव्यश्च महेश्वरः ॥

(श्रवण और कीर्तन के साथ) मन से उनका मनन, यह महासाधन कहा जाता है। महेश्वर सुनने योग्य, कीर्तन करने योग्य और मनन करने योग्य हैं।

— शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता और वायवीय संहिता — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.3.22

लिंग और मूर्ति: शिव ही दोनों रूपों में क्यों पूजे जाते हैं

मुनियों का एक प्रश्न बहुत सीधा है: "दूसरे सब देवता केवल मूर्ति (बेर) में पूजे जाते हैं, पर शिव लिंग और मूर्ति दोनों में क्यों?" सूत उत्तर देते हैं कि इसका उत्तर देने वाले केवल महादेव हैं, और वे वही कहते हैं जो गुरु से सुना: शिव ब्रह्म-रूप होने से निष्कल (निराकार) हैं, और रूप वाले होने से सकल (साकार) भी। निष्कल होने से उनका निराकार लिंग है, और सकल होने से साकार मूर्ति। सकल और निष्कल, दोनों रूप होने से ही वे "ब्रह्म" शब्द से कहे जाते हैं।

इस भेद का मूल एक घटना में बताया गया है। बहुत पहले एक कल्प में ब्रह्मा और विष्णु आपस में युद्ध कर रहे थे, और उनके अभिमान को दूर करने के लिए परमेश्वर ने उनके बीच निष्कल स्तंभ के रूप में अपना स्वरूप दिखाया। "तभी से लोकों में ईश्वर का निष्कल लिंग, और उसी तरह शिव की ही सकल मूर्ति कल्पित हुई।" यानी लिंग शिव के निराकार रूप का, और मूर्ति उनके साकार रूप का प्रतीक है।

ज्योति-स्तंभ, केतकी का झूठ और भैरव

यह कथा नंदिकेश्वर ब्रह्मा के एक पुत्र को सुनाते हैं। विष्णु शेष-शय्या पर सो रहे थे; ब्रह्मा वहाँ आए और बोले, "उठो वत्स, अपने स्वामी को देखो।" विष्णु ने भीतर क्रोध छिपाकर कहा, "स्वागत है वत्स, आसन पर बैठो।" दोनों में "कौन बड़ा" पर विवाद हुआ, और वह युद्ध बन गया। दोनों ने एक-दूसरे पर माहेश्वर और पाशुपत अस्त्र चलाए, जिनकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर शिव पार्वती और गणों सहित आए और बादलों में छिपकर युद्ध देखने लगे।

असमय प्रलय देखकर शिव दोनों के बीच एक भयंकर अग्नि-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए, और दोनों के अस्त्र उसमें गिरकर शांत हो गए। दोनों ने तय किया कि इसका ऊपरी और निचला छोर खोजें। विष्णु वराह बनकर पाताल को भेदते हुए बहुत दूर गए, पर स्तंभ का मूल न पाकर थककर युद्धभूमि लौट आए। ब्रह्मा हंस बनकर आकाश में ऊपर गए, और रास्ते में उन्होंने एक केतकी का फूल नीचे गिरते देखा, जो बहुत वर्षों से गिर रहा था पर फिर भी सुगंधित और ताज़ा था।

फूल ने बताया कि वह इस अनादि स्तंभ के बीच से बहुत समय से गिर रहा है, और उसे भी इसका अंत नहीं दिखा। ब्रह्मा ने कहा, "मित्र, अब तुम्हें मेरा एक काम करना है: विष्णु के सामने कहना कि ब्रह्मा ने स्तंभ का अंत देख लिया है, और मैं इसका साक्षी हूँ।" पाठ में ब्रह्मा यह तर्क भी देते हैं कि "आपत्ति में असत्य भी उचित है"। लौटकर ब्रह्मा ने थके हुए विष्णु से कहा, "मैंने स्तंभ का शिखर देखा, यह केतकी साक्षी है," और केतकी ने झूठी गवाही दी। विष्णु ने इसे सच मानकर ब्रह्मा को प्रणाम किया और उनकी पूजा की।

तभी उस झूठे ब्रह्मा को दंड देने के लिए अग्नि-लिंग से शिव साकार रूप में प्रकट हुए, और विष्णु ने काँपते हाथों से उनके चरण पकड़ लिए। शिव ने भैरव नाम के एक पुरुष को रचा, जिसने ब्रह्मा के केश पकड़कर उनका वह पाँचवाँ सिर काट दिया जिसने झूठ बोला था, और बाकी सिर काटने को उद्यत हुआ। ब्रह्मा भैरव के चरणों में गिर पड़े, और विष्णु ने आँसुओं से शिव के चरण धोकर ब्रह्मा के लिए क्षमा माँगी। तब शिव ने भैरव को रोक दिया।

फिर शिव ने ब्रह्मा से कहा कि तुमने सम्मान पाने के लिए छल से ईश्वर-पद लिया, इसलिए लोक में तुम्हारा सत्कार, मंदिर और उत्सव नहीं होंगे; पर यह वर दिया कि श्रौत और गृह्य यज्ञों में तुम गुरु रहोगे, और तुम्हारे बिना यज्ञ निष्फल होगा। झूठे साक्षी केतकी से कहा, "दुष्ट, दूर हो; अब से तुम्हारा फूल मेरी पूजा में न हो।" केतकी के क्षमा माँगने पर शिव ने कहा, "मैं सत्यवादी ईश्वर हूँ, मेरा तुम्हें धारण करना उचित नहीं; पर मेरे भक्त तुम्हें धारण करेंगे, और तुम वितान (छत्र) के बहाने मेरे ऊपर रहोगे।"

यह ध्यान देने की बात है कि लिंग पुराण में यही ज्योति-स्तंभ की कथा है, पर वहाँ ब्रह्मा स्वयं मानते हैं कि वे अंत देखे बिना लौट आए, और केतकी का कोई प्रसंग नहीं है। केतकी और भैरव वाला रूप शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता का है।

शिवरात्रि, आर्द्रा नक्षत्र और अरुणाचल

उसी प्रसंग में शिवरात्रि की उत्पत्ति है। ब्रह्मा और विष्णु ने शिव को पार्वती और परिवार सहित श्रेष्ठ आसन पर बैठाकर हार, नूपुर, मुकुट, कुंडल, यज्ञोपवीत, फूल, तांबूल, कपूर, चंदन, धूप, दीप, छत्र और चँवर से पूजा की। शिव ने उन वस्तुओं को अपनी सभा के लोगों में बाँट दिया और प्रसन्न होकर कहा, "आज के इस महान दिन की पूजा से मैं तुम दोनों से संतुष्ट हूँ। यह दिन बहुत पुण्य वाला होगा, और यह तिथि शिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी, जो मुझे प्रिय है।"

शिव ने इस दिन का विधान भी बताया: शिवरात्रि पर दिन-रात निराहार और जितेंद्रिय रहकर, अपनी सामर्थ्य के अनुसार, छल के बिना, लिंग या मूर्ति की पूजा करे। "पूरे एक वर्ष निरंतर मेरी पूजा का जो फल है, वह शिवरात्रि पर मेरी पूजा से तुरंत मिलता है।" यह दिन धर्म की वृद्धि का वैसा ही समय है जैसे चंद्रोदय समुद्र के ज्वार का। आगे विद्येश्वर संहिता यह भी कहती है कि सब व्रतों में शिवरात्रि व्रत श्रेष्ठ है।

और जिस समय शिव पहले स्तंभ रूप में प्रकट हुए, वह मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र का समय था। "जो मार्गशीर्ष में आर्द्रा नक्षत्र पर उमा सहित मुझे, या मेरी मूर्ति या लिंग को देखता है, वह मुझे कार्तिकेय से भी प्रिय है।" उस दिन केवल दर्शन का फल है, और पूजा का फल वाणी से परे।

शिव ने यह भी कहा कि जहाँ मैं लिंग के आकार में बढ़ा, वह "लिंग-स्थान" होगा; यह अनादि-अनंत स्तंभ जगत के दर्शन और पूजन के लिए छोटा हो जाएगा। "अग्नि के पर्वत जैसा जो यह लिंग उठा है, वह अरुणाचल नाम से प्रसिद्ध होगा।" वहाँ अनेक तीर्थ होंगे, वहाँ रहने और मरने से मुक्ति होगी, वहाँ दिया गया दान, होम और जप करोड़ गुना होगा, और यह क्षेत्र मेरे सब क्षेत्रों से बड़ा होगा।

दिनमेतत्ततः पुण्यं भविष्यति महत्तरम् । शिवरात्रिरिति ख्याता तिथिरेषा मम प्रिया ॥

(शिव ने कहा:) इसलिए यह दिन बहुत पुण्यवान होगा। यह तिथि शिवरात्रि नाम से प्रसिद्ध होगी, और यह मुझे प्रिय है।

— शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता और वायवीय संहिता — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.9.10

पार्थिव लिंग, नाम, भस्म और रुद्राक्ष

विद्येश्वर संहिता का बाकी भाग "साध्य-साधन खंड" है, यानी शिव-उपासना की व्यावहारिक विधियाँ। अध्याय 16 से 21 में मिट्टी की प्रतिमा और पार्थिव शिवलिंग की पूजा का विधान और माहात्म्य है; अध्याय 18 में शिवलिंग की महिमा, और 22 में शिव को नैवेद्य। पुराण कहता है कि आर्द्रा, महार्द्रा और ज्येष्ठ मास की चतुर्दशी पर शिव-पूजा विशेष फल देती है, और मार्गशीर्ष में अन्नदान करने वाले को वेदांत-ज्ञान की सिद्धि मिलती है।

अध्याय 23 शिव के नाम का माहात्म्य है: वे धन्य और कृतार्थ हैं जिनके कुल-देवता शिव हैं; "जिसके मुख में सदा शिव, शिव का नाम है, उसे पाप वैसे ही नहीं छूते जैसे खैर के जलते अंगारे को (कोई नहीं छूता)।" अध्याय 24 भस्म का है: भस्म दो प्रकार का है, महाभस्म और स्वल्प; महाभस्म के तीन प्रकार हैं, श्रौत, स्मार्त और लौकिक। श्रौत और स्मार्त भस्म द्विजों के लिए मंत्र सहित, और लौकिक भस्म बाकी सबके लिए बिना मंत्र के धारण करने योग्य बताया गया है।

अध्याय 25 में रुद्राक्ष की उत्पत्ति स्वयं शिव पार्वती को बताते हैं: "हज़ार दिव्य वर्ष तप करते हुए, लोक-कल्याण के लिए मैंने लीला से आँखें खोलीं, तो मेरी सुंदर आँखों से जल की बूँदें गिरीं। उन्हीं आँसुओं से रुद्राक्ष नाम के वृक्ष उत्पन्न हुए।" भक्तों पर कृपा के लिए वे वृक्ष बने, और गौड़ देश, मथुरा, अयोध्या, लंका, मलय, सह्याद्रि और काशी जैसे स्थानों में उगे। रुद्राक्ष के दर्शन, स्पर्श और जप से पाप नष्ट होने की बात कही गई है, और श्वेत, लाल, पीले और काले रंग के रुद्राक्ष बताए गए हैं।

रुद्र संहिता: नारद का अभिमान, कुबेर, और सती की कथा

दूसरी, रुद्र संहिता इस पुराण का सबसे बड़ा और सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला भाग है, पाँच खंडों में। इसकी पूरी कथा ब्रह्मा अपने पुत्र नारद को सुनाते हैं। और शुरुआत स्वयं नारद की एक भूल से होती है। हिमालय में तप करते नारद का तप तोड़ने के लिए इंद्र ने कामदेव को भेजा, पर शिव के प्रभाव से काम वहाँ हार गया। नारद को लगा कि उन्होंने स्वयं काम को जीत लिया है। शिव ने उन्हें समझाया कि यह बात किसी से न कहें, पर नारद ने यह गर्व ब्रह्मा और फिर विष्णु के सामने भी दोहराया।

तब विष्णु ने नारद के मार्ग में माया का एक नगर रचा, जहाँ राजकुमारी श्रीमती का स्वयंवर था। उस पर मोहित नारद ने विष्णु से उनका "हरि" रूप माँगा, और विष्णु ने उन्हें वानर का मुख दे दिया। स्वयंवर में नारद की हँसी हुई और श्रीमती ने विष्णु को चुना। क्रोधित नारद ने विष्णु को शाप दिया: "तुम मनुष्य बनकर पत्नी के वियोग का दुःख वानरों के साथ भोगोगे।" विष्णु ने शाप स्वीकार किया और नारद का मोह दूर करते हुए बताया कि यह सब शिव की लीला थी। पछताते नारद काशी गए और विश्वेश्वर को प्रणाम किया।

सृष्टि खंड में एक और प्रसिद्ध कथा कुबेर की है। गुणनिधि नाम का एक दुराचारी युवक मरा, तो यमदूत उसे लेने आए, पर शिवगणों ने उनसे विवाद करके उसे छुड़ाया और कैलास ले गए; यह खंड इसे इस बात का उदाहरण बताता है कि शिव थोड़े से भी प्रसन्न हो जाते हैं। अगले जन्मों में उसकी शिव-भक्ति बढ़ती गई, पार्वती के वचन से उसकी एक आँख भी गई, और अंत में वह यक्षों का स्वामी, अलकापुरी का अधिपति कुबेर और शिव का मित्र बना। इसी खंड में ज्योति-लिंग से ॐकार का नाद और पंचमुख शिव का प्रकट होना भी है।

दूसरा, सती खंड, शिव की पहली पत्नी सती का पूरा चरित है। ब्रह्मा की इच्छा से शिव-शक्ति दक्ष की कन्या बनकर जन्म लेती हैं; सती बारह महीने का शिव-व्रत करती हैं, और ब्रह्मा और विष्णु के आग्रह पर विरक्त शिव विवाह स्वीकार करते हैं। एक रोचक प्रसंग यह है कि वन में शिव को विरह में भटकते राम को प्रणाम करते देख सती को संदेह हुआ, और उन्होंने सीता का रूप लेकर राम की परीक्षा ली; राम उन्हें पहचान गए, और सती को पछतावा हुआ। यही प्रसंग शिव-सती के वियोग का कारण बताया गया है।

फिर दक्ष ने शिव का भाग रखे बिना यज्ञ किया। ऋषि दधीचि शिव को वहाँ न देखकर यज्ञ छोड़कर चले गए। सती पिता के यज्ञ में गईं, वहाँ उनका और शिव का अपमान हुआ, और उन्होंने आँखें मूँदकर, पति का स्मरण करते हुए, योग-मार्ग से स्वयं देह त्याग दी। यह सुनकर शिव ने क्रोध में अपनी एक जटा उखाड़ी, और उसके दो भागों से महाबली वीरभद्र और महाकाली उत्पन्न हुए। वीरभद्र ने यज्ञ का विध्वंस किया और दक्ष का सिर काटा। अंत में देवताओं की स्तुति से प्रसन्न शिव ने दक्ष को बकरे का सिर लगवाकर जीवित कराया और यज्ञ पूरा होने दिया।

एक तुलना ध्यान देने योग्य है। वायवीय संहिता में भी दक्ष-यज्ञ की कथा है, पर वहाँ भद्रकाली देवी के क्रोध से उत्पन्न होती हैं; रुद्र संहिता में वीरभद्र और महाकाली दोनों शिव की जटा से। एक ही पुराण के दो भागों में एक कथा के दो रूप हैं, और यहाँ दोनों ज्यों के त्यों दिए गए हैं। सती खंड में दधीचि और राजा क्षुव के विवाद की कथा भी है, जिसमें दधीचि मृत्युंजय के प्रभाव से अमर होते हैं।

पार्वती खंड: तप, कामदहन और शिव-पार्वती विवाह

तीसरा, पार्वती खंड, इस पुराण का सबसे लंबा खंड है, और भारतीय परंपरा में शिव-पार्वती विवाह की कथा का मुख्य स्रोत। सती हिमालय और मेना की पुत्री बनकर फिर जन्म लेती हैं। नारद हिमालय को बताते हैं कि इस कन्या का पति दिगंबर और विरक्त होगा, और पिता चिंता में पड़ जाते हैं। पार्वती पिता के साथ हिमालय पर तप करते शिव की सेवा में लगती हैं।

उधर वज्रांग के पुत्र तारकासुर ने तप से ब्रह्मा से वर पाया, और देवताओं से उनका सब ऐश्वर्य छीन लिया। ब्रह्मा ने देवताओं को बताया कि उसका वध शिव के पुत्र के बिना संभव नहीं। इसलिए इंद्र ने कामदेव को शिव का ध्यान तोड़ने भेजा। काम ने शिव के मन में पार्वती के प्रति भाव जगाया, पर क्रुद्ध शिव के तीसरे नेत्र से निकली अग्नि ने उसे भस्म कर दिया। रति विलाप करती रही, और देवताओं ने उसे भरोसा दिया। शिव के नेत्र की वह ज्वाला ब्रह्मा की आज्ञा से वाडवाग्नि बनकर समुद्र में रखी गई।

शिव के अंतर्धान होने पर पार्वती ने नारद से पंचाक्षर मंत्र पाया और ऐसा कठोर तप किया जो मुनियों के लिए भी कठिन था; पुराण कहता है कि उस तप की अग्नि से तीनों लोक तपने लगे। शिव ने पहले सप्तर्षियों को उनकी परीक्षा के लिए भेजा, फिर स्वयं जटाधारी ब्रह्मचारी बनकर आए और शिव की निंदा करके उन्हें डिगाना चाहा। पार्वती अडिग रहीं, तब शिव ने अपना रूप दिखाया और कहा, "मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा।" पार्वती ने एक सुंदर शर्त रखी: पिछली बार दक्ष के कन्यादान के समय ग्रहों की पूजा ठीक से नहीं हुई थी, इसलिए वियोग हुआ; इस बार विधि से हिमालय से माँगकर विवाह करें।

विवाह की तैयारी पूरे विस्तार से है: हिमालय की लग्न-पत्रिका, सब पर्वतों का आना, विश्वकर्मा का बनाया अद्भुत मंडप, और ब्रह्मा-विष्णु सहित शिव की बारात। मेना जब वर को देखने आईं, तो शिव ने ऐसी लीला की कि मेना मोह में पड़कर व्याकुल हो गईं; उनका मोह दूर हुआ, और फिर शिव दिव्य रूप में प्रकट हुए। कन्यादान, होम और सब संस्कारों के साथ विवाह हुआ, स्त्रियों के लोक-गीत और हँसी-मज़ाक भी। विवाह के बाद रति की प्रार्थना पर शिव ने कामदेव को फिर जीवित किया, और विदा के समय मेना ने पार्वती को पतिव्रता-धर्म की सीख दी।

कुमार खंड: कार्तिकेय, तारक-वध और गणेश का जन्म

चौथा, कुमार खंड, शिव के दोनों पुत्रों की कथा है। तारक से पीड़ित देवता शिव के पास गए। शिव का तेज अग्नि, सप्तर्षियों की पत्नियों और गंगा से होता हुआ सरकंडों के वन (शरवण) में पहुँचा, और वहाँ कार्तिकेय का जन्म हुआ। छह कृत्तिकाओं ने उन्हें दूध पिलाया, नंदी उन्हें शिव के पास लाए, और सब देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र देकर उनका अभिषेक किया। कार्तिकेय ने युद्ध में तारकासुर का वध किया, और बाण और प्रलंब को भी मारा।

गणेश की कथा अध्याय 13 से है, और ब्रह्मा उसकी शुरुआत एक ज़रूरी बात से करते हैं: कल्प-भेद से गणेश के जन्म की कथा अलग-अलग कही गई है; एक कल्प में उनका सिर शनि की दृष्टि से कटा था, और यहाँ श्वेत कल्प की कथा है, जिसमें सिर शिव ने काटा। पार्वती की सखियाँ जया और विजया कहती हैं कि नंदी, भृंगी जैसे सब गण शिव की आज्ञा मानते हैं, "हमारा अपना कोई नहीं।" एक दिन स्नान के समय शिव अचानक भीतर आ गए, और पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक सुंदर, बलवान पुत्र रचा, उसे वस्त्र, आभूषण और एक मज़बूत छड़ी दी, और कहा: "तुम मेरे पुत्र हो; मेरी आज्ञा के बिना कोई भीतर न आए।"

शिव आए, तो बालक ने उन्हें न पहचानकर रोका और छड़ी से मारा। शिव के गणों से उसका युद्ध हुआ, विष्णु सहित देवता भी उसे जीत न सके, और अंत में शिव ने त्रिशूल से उसका सिर काट दिया। तब क्रोधित मातृगणों ने युद्ध करके विष्णु और इंद्र सहित देवताओं को हरा दिया। देवताओं ने पार्वती की स्तुति की, और उन्होंने कहा कि मेरा पुत्र जीवित हो, तभी युद्ध रुकेगा। तब बालक के धड़ पर हाथी का मुख जोड़कर उसे जीवित किया गया, और देवताओं ने गजानन का अभिषेक किया।

फिर गणेश को वह स्थान मिला जो आज हर पूजा में दिखता है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने एक साथ कहा कि जैसे हम तीनों पूज्य हैं, वैसे ही गणनाथ सबके पूज्य हों; लोग पहले इनकी पूजा करें, फिर हमारी, और इन्हें छोड़कर की गई पूजा निष्फल होगी। पार्वती ने वर दिया कि उनके मुख पर सिंदूर दिखता है, इसलिए लोग सिंदूर से उनकी पूजा करें। शिव ने उन्हें सब गणों का अध्यक्ष बनाया और कहा कि विघ्न हरने में तुम्हारा नाम सबसे श्रेष्ठ होगा। कुमार खंड का अंत गणेश के विवाह और कार्तिकेय के क्रौंच पर्वत चले जाने से होता है।

शिव ने गणेश के जन्म की तिथि भी बताई: भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, चंद्रोदय के समय, रात के पहले प्रहर में। उसी तिथि से व्रत शुरू करके साल भर, अगली चतुर्थी तक, व्रत करने का विधान है; पूजा में दूर्वा की 21 या 101 डंठलें, धातु, मूंगे, सफ़ेद आक या मिट्टी की प्रतिमा। ध्यान रहे, पाठ यहाँ "असित" (कृष्ण) पक्ष कहता है, जबकि आज गणेश चतुर्थी का बड़ा उत्सव भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को होता है; हम पाठ के शब्द ही दे रहे हैं।

एतत्पूजां पुरा कृत्वा पश्चात्पूज्या वयं नरैः । वयं च पूजितास्सर्वे नायं चापूजितो यदा ॥

(ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने कहा:) मनुष्य पहले इनकी (गणेश की) पूजा करें, फिर हमारी। यदि हम सब पूजे गए पर ये नहीं पूजे गए, (तो उस पूजा का फल नहीं मिलता)।

— शिवपुराणम् (सातों संहिताएँ, हर संहिता/खंड की विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत, पृष्ठ 2.4.18.23

युद्ध खंड: त्रिपुर, जलंधर, शंखचूड़ और अंधक

पाँचवाँ, युद्ध खंड, उन असुरों की कथाएँ हैं जिन्हें शिव ने जीता। पहली त्रिपुर की है। स्कंद के हाथों तारकासुर के मारे जाने के बाद उसके तीन पुत्रों, बड़े तारक, मँझले विद्युन्माली और छोटे कमलाक्ष, ने मेरु की गुफा में हज़ारों वर्ष कठोर तप किया और ब्रह्मा से तीन पुर (नगर) माँगे, जिन्हें विश्वकर्मा ने बनाया। वे शिव के भक्त थे, इसलिए उनका नाश संभव न था; पाठ के अनुसार विष्णु ने एक "जिन" उपदेशक रचा, जिसकी दीक्षा से त्रिपुरवासी शिव-धर्म से हट गए। तब विश्वकर्मा ने सब देवताओं से बना एक रथ बनाया, और शिव ने एक ही बाण से तीनों पुर एक साथ जला दिए। बचे हुए मय दानव ने शिव की शरण ली और उसे वितल लोक मिला।

जलंधर की कथा तुलसी से जुड़ी है। शिव के नेत्र की अग्नि समुद्र में गिरी, उससे जलंधर उत्पन्न हुआ, और उसने कालनेमि की पुत्री वृंदा से विवाह किया। उसने देवताओं को हराया, और विष्णु उसके पराक्रम से प्रसन्न होकर लक्ष्मी सहित उसके नगर में रहने लगे। नारद से पार्वती के रूप की प्रशंसा सुनकर जलंधर ने शिव से पार्वती माँगीं, और युद्ध में शिव का रूप लेकर पार्वती के पास गया। पार्वती ने विष्णु से कहा कि वे वृंदा का सतीत्व भंग करें। विष्णु ने जलंधर का रूप लेकर वृंदा को छला; वृंदा ने उन्हें शाप दिया कि अगले जन्म में तुम्हारी पत्नी का भी हरण होगा, और चिता में प्रवेश किया। तब शिव ने जलंधर का वध किया।

वृंदा की चिता के पास विष्णु शोक में बैठे रहे। देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने बीज दिए, जिन्हें वहाँ बोने से आँवला (धात्री), मालती और तुलसी उत्पन्न हुईं, और उन्हें पाकर विष्णु का मोह दूर हुआ। आगे दंभ के पुत्र शंखचूड़ का विवाह तुलसी से होता है। शंखचूड़ नारायण-कवच पहनता था; विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण बनकर उससे कवच माँग लिया, और तब शिव ने उसका वध किया। तुलसी ने विष्णु को "पत्थर हो जाओ" का शाप दिया, और स्वयं गंडकी नदी बनीं।

अंधक पार्वती के पसीने से जन्मा था, और शिव ने उसे पुत्र चाहने वाले हिरण्याक्ष को दे दिया। बड़ा होकर वह भी पार्वती पर मोहित हुआ और युद्ध छेड़ा। उसके मरे वीरों को शुक्राचार्य संजीवनी से जिलाते रहे, तो नंदी शुक्र को पकड़ लाए और शिव ने उन्हें निगल लिया। शिव के त्रिशूल पर टँगा अंधक तीन हज़ार वर्ष तप करता रहा, और अंत में शिव ने उसे गणपति (गणों का स्वामी) बना दिया। शुक्र को भी शिव से ही संजीवनी विद्या मिली थी। इसी खंड में बाणासुर, ऊषा और अनिरुद्ध की कथा है, जिसमें कृष्ण से युद्ध के बाद बाण शिव के आगे नृत्य करके गणपति पद पाता है, और गजासुर के वध से शिव का "कृत्तिवासेश्वर" नाम।

युद्ध खंड: शिव द्वारा जीते गए असुर (विषयानुक्रमणिका के अनुसार)
असुरमुख्य बातअंतस्रोत
त्रिपुर (तारकासुर के तीन पुत्र)ब्रह्मा के वर से तीन पुरसर्वदेवमय रथ, एक बाण से तीनों पुर भस्म; मय को वितलशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 2.5.1–2.5.12
जलंधरशिव-नेत्र की अग्नि से जन्म; पत्नी वृंदाशिव द्वारा वध; वृंदा की चिता से तुलसी, आँवला, मालतीशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 2.5.14–2.5.26
शंखचूड़दंभ का पुत्र; पत्नी तुलसी; नारायण-कवचशिव द्वारा वध; तुलसी गंडकी नदी बनींशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 2.5.27–2.5.41
अंधकपार्वती के पसीने से जन्म; हिरण्याक्ष का पुत्र बनात्रिशूल पर तप; गणपति पदशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 2.5.42–2.5.49
बाणासुरऊषा-अनिरुद्ध प्रसंग; कृष्ण से युद्धशिव के आगे नृत्य; गणपति पदशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 2.5.51–2.5.56
गजासुरमहिषासुर का पुत्रवध; कृत्तिवासेश्वर लिंगशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 2.5.57

शतरुद्र संहिता: शिव के अवतार, हनुमान से किरात तक

तीसरी, शतरुद्र संहिता, शिव के "सौ" अवतारों की संहिता है, जिसे नंदीश्वर सनत्कुमार को सुनाते हैं। आरंभ में शिव के पाँच रूप हैं, सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान, फिर शर्व, भव, रुद्र आदि आठ मूर्तियाँ, और फिर अर्धनारीश्वर, जिनसे ब्रह्मा को स्त्री-सृष्टि की शक्ति मिली। फिर हर द्वापर में योगाचार्य के रूप में शिव के अट्ठाईस अवतार और उनके शिष्य गिनाए गए हैं, जिनमें पहला श्वेत मुनि है।

आगे के अवतार बहुत प्रसिद्ध हैं। शिलाद मुनि के तप से अयोनिज पुत्र नंदीश्वर हुए, जो गणों के अधिपति बने। ब्रह्मा के "मैं ही सबसे बड़ा" वाले अभिमान को तोड़ने के लिए कालभैरव हुए, जिन्होंने ब्रह्मा का सिर काटा; उस ब्रह्महत्या से वे तीनों लोकों के तीर्थों में घूमकर भी मुक्त न हुए, और काशी के कपालमोचन तीर्थ में तुरंत मुक्त हुए। शरभ अवतार ने नृसिंह के उग्र तेज को शांत किया, और पाठ के अनुसार उनकी खाल धारण करने से शिव "कृत्तिवासा" कहलाए। अत्रि के तप से ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अंश से चंद्र, दत्तात्रेय और दुर्वासा हुए, और दुर्वासा शिव के अवतार हैं।

बीसवाँ अध्याय हनुमान का है। पुराण कहता है कि हनुमान शिव के अंश से, गौतम की पुत्री अंजनी के गर्भ से, राम के कार्य के लिए जन्मे। बचपन में उन्होंने सूर्य को फल समझकर निगल लिया, सूर्य से सब विद्याएँ पढ़ीं, सुग्रीव के मंत्री बने, राम-सुग्रीव की मित्रता कराई, लंका जलाई, सेतु बँधवाया, संजीवनी से लक्ष्मण को जिलाया, और महिरावण को मारकर राम-लक्ष्मण को वापस लाए। इसी अध्याय में यह भी है कि समुद्र पार करने से पहले राम ने विजय की कामना से शिवलिंग की स्थापना करके पूजा की।

संहिता के बाकी अवतारों में दधीचि के पुत्र पिप्पलाद हैं, जिनके स्मरण से शनि की पीड़ा दूर होने की बात कही गई है; वैश्यनाथ, जो वेश्या महानंदा की भक्ति से प्रकट हुए; आहुक और आहुका नाम के भील दंपती, जिन्हें शिव ने वर दिया कि अगले जन्म में वे नल और दमयंती होंगे और शिव हंस बनकर उनका मिलन कराएँगे; उपमन्यु की परीक्षा; पार्वती की परीक्षा लेने वाला ब्रह्मचारी; और द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा, जिन्हें भी शिव का अवतार कहा गया है।

अंत में महाभारत का किरात प्रसंग है। व्यास के कहने पर अर्जुन इंद्रकील पर्वत पर तप करने गए। दुर्योधन ने उन्हें मारने के लिए मूक नाम का दैत्य सूअर के रूप में भेजा। शिव भीलराज (किरात) के वेश में आए, और अर्जुन और किरात के बाण एक साथ सूअर को लगे। "किसने मारा" पर विवाद हुआ, फिर युद्ध, और अंत में शिव ने प्रसन्न होकर अर्जुन को वर दिया। संहिता का अंतिम, बयालीसवाँ अध्याय बारह ज्योतिर्लिंगों को भी शिव के बारह अवतार कहता है।

लक्ष्मणप्राणदाता च सर्वदेवमदापहः । रुद्रावतारो भगवान्भक्तोद्धारकरस्स वै ॥

(हनुमान) लक्ष्मण को प्राण देने वाले, सब देवताओं का मद हरने वाले, भक्तों का उद्धार करने वाले भगवान रुद्र के अवतार हैं।

— शिवपुराणम् (सातों संहिताएँ, हर संहिता/खंड की विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत, पृष्ठ 3.20.37

कोटिरुद्र संहिता: बारह ज्योतिर्लिंग और व्याध की शिवरात्रि

चौथी, कोटिरुद्र संहिता, शिवलिंगों की संहिता है। सूत कहते हैं कि शिवलिंगों की कोई गिनती नहीं: "सारी भूमि लिंगमय है, सारा जगत लिंगमय है।" फिर भी वे मुख्य लिंग बताते हैं, और सबसे पहले बारह ज्योतिर्लिंग। जो बारह नामों वाला श्लोक आज बहुत-से घरों में सुबह पढ़ा जाता है, वह इसी संहिता के पहले अध्याय में है, और उसके बाद का फल भी: जो सुबह उठकर ये बारह नाम पढ़े, वह सब पापों से मुक्त होता है; और इनमें से एक की भी छह महीने निरंतर पूजा करने वाले को फिर गर्भ का दुःख नहीं होता।

इसी अध्याय में हर ज्योतिर्लिंग का एक "उपलिंग" भी बताया गया है, जैसे सोमनाथ का अंतकेश, मल्लिकार्जुन का भृगुकच्छ में रुद्रेश्वर, महाकाल का नर्मदा पर दुग्धेश, और भीमशंकर का सह्याद्रि पर भीमेश्वर। और आगे के अध्यायों में हर ज्योतिर्लिंग की कथा: चंद्रमा का प्रभास में तप (सोमनाथ), दूषण असुर का वध और राजा चंद्रसेन और ग्वाले के बालक श्रीकर की भक्ति (महाकाल), विंध्य का तप (ओंकारेश्वर), कुंभकर्ण के पुत्र भीम का वध (भीमशंकर), गौतम ऋषि और गंगा का गौतमी बनना (त्र्यंबकेश्वर), दारुक राक्षस और भक्त वैश्य सुप्रिय (नागेश्वर), और घुश्मा का जीवित हुआ पुत्र (घुश्मेश्वर)।

एक बात ध्यान देने की है: बारह नामों वाले श्लोक में ओंकार पर "परमेश्वर" नाम है, और शतरुद्र संहिता की सूची में "अमरेश्वर"; और शतरुद्र बताती है कि ओंकार में शिव दो रूपों में रहे, ओंकार और परमेश्वर (पार्थिव लिंग से प्रकट)। इसी तरह सोमनाथ, मल्लिकार्जुन और महाकाल जैसे नामों के साथ स्थान भी श्लोक में ही हैं: सौराष्ट्र, श्रीशैल, उज्जयिनी, हिमालय पर केदार, डाकिनी में भीमशंकर, वाराणसी, गौतमी के तट पर त्र्यंबक, चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुकावन में नागेश, सेतुबंध पर रामेश्वर और शिवालय में घुश्मेश।

कोटिरुद्र संहिता में शिवरात्रि की एक और प्रसिद्ध कथा है, एक शिकारी की। गुरुद्रुह नाम का भील शिकार की खोज में एक जलाशय के पास बेल के पेड़ पर पानी लेकर बैठ गया। रात के हर प्रहर में एक हिरणी या हिरण आता; वह बाण चढ़ाता, और उसी हलचल में पानी और बेलपत्र नीचे के शिवलिंग पर गिरते जाते। अनजाने में रात भर शिव की पूजा हो गई। हिरणों ने सत्य की शपथ लेकर लौटने का वचन दिया और लौटे भी; यह देखकर शिकारी का मन बदल गया और उसने उन्हें छोड़ दिया। शिव प्रकट हुए, उसे "गुह" नाम दिया, शृंगवेरपुर का राज्य, और वर दिया कि राम तुम्हारे घर आएँगे और तुमसे मित्रता करेंगे। शिव वहाँ अर्बुदाचल पर "व्याधेश्वर" के रूप में रहे।

संहिता के बाकी विषय भी कम रोचक नहीं: अत्रि और अनसूया के तप से गंगा का उनके आश्रम में रुकना, गोकर्ण के महाबल लिंग की कथाएँ, शिव की आराधना से विष्णु को सुदर्शन चक्र मिलना, शिव सहस्रनाम और उसका फल, शिवरात्रि व्रत की विधि और उद्यापन, और अंत में मुक्ति, शिव के सगुण-निर्गुण भेद और ज्ञान का निरूपण।

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम् ॥ केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम् । वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ॥ वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने । सेतुबंधे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये ॥

सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकाल, ओंकार में परमेश्वर; हिमालय पर केदार, डाकिनी में भीमशंकर, वाराणसी में विश्वेश, गौतमी के तट पर त्र्यंबक; चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुकावन में नागेश, सेतुबंध पर रामेश्वर और शिवालय में घुश्मेश।

— शिवपुराणम् (सातों संहिताएँ, हर संहिता/खंड की विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत, पृष्ठ 4.1.21–4.1.23
बारह ज्योतिर्लिंग: शिव पुराण में स्थान और कथा
क्रमज्योतिर्लिंगश्लोक में स्थानकथा का मुख्य बिंदुस्रोत
1सोमनाथसौराष्ट्रदक्ष के शाप से क्षयी चंद्रमा ने प्रभास में छह महीने शिव-पूजा कीशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.14; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.6–3.42.9
2मल्लिकार्जुनश्रीशैलपुत्र से मिलने के लिए शिव वहाँ गएशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.15; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.10–3.42.12
3महाकालउज्जयिनीदूषण असुर का हुंकार से वध; राजा चंद्रसेन, बालक श्रीकरशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.16–4.17; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.13–3.42.17
4ओंकारेश्वरओंकारविंध्य का तप; ओंकार और परमेश्वर, दो रूपशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.18; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.18–3.42.21
5केदारेश्वरहिमालयनर-नारायण की प्रार्थना परशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.19; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.23–3.42.25
6भीमशंकरडाकिनीकुंभकर्ण के पुत्र भीम का वध; भक्त राजा सुदक्षिणशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.20–4.21; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.27–3.42.29
7विश्वेश्वरवाराणसीकाशी की महिमाशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.22–4.23; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.30–3.42.33
8त्र्यंबकेश्वरगौतमी का तटगौतम ऋषि का तप; गंगा गौतमी बनींशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.24–4.27; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.34–3.42.37
9वैद्यनाथचिताभूमिरावण के प्रसंग से प्रकटशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.28; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.38–3.42.40
10नागेश्वरदारुकावनदारुक राक्षस का वध; भक्त वैश्य सुप्रियशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.29–4.30; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.42–3.42.45
11रामेश्वरसेतुबंधराम द्वारा स्थापित; राम को विजय का वरशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.31; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.46–3.42.48
12घुश्मेश्वरशिवालय (दक्षिण में देवशैल के पास सरोवर)सुदेहा द्वारा मारा गया घुश्मा का पुत्र जीवित हुआशिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 4.32–4.33; शिव पुराण (मूल संस्कृत, सातों संहिताएँ), 3.42.52–3.42.55

उमा और कैलास संहिता: नरक और दान, दुर्गा नाम, और ओंकार

पाँचवीं, उमा संहिता, कृष्ण से शुरू होती है: पुत्र की कामना से कृष्ण कैलास जाते हैं, उपमन्यु ऋषि से शिव-भक्ति का उपदेश सुनते हैं, और शिव-पार्वती से वर पाते हैं; यहीं यह भी कहा गया है कि राम ने शिव के वर से रावण को जीता। फिर सनत्कुमार व्यास को पापों के भेद, यमलोक का मार्ग, नरकों के प्रकार और उनकी यातनाएँ, दान की महिमा (विशेषकर अन्नदान), पाताल, जंबूद्वीप और भारतवर्ष, ग्रहों की स्थिति, शरीर की उत्पत्ति, मृत्यु के लक्षण और "छाया पुरुष" के दर्शन की बातें बताते हैं।

उमा संहिता में सृष्टि, चौदह मन्वंतर, सूर्य की पत्नी संज्ञा और छाया की कथा (जिससे अश्विनीकुमार जन्मे), मनु के वंश, सगर, श्राद्ध की महिमा, और व्यास के जन्म की कथा भी है: सत्यवती और पराशर से जन्मे व्यास ने काशी में व्यासेश्वर लिंग स्थापित किया, और शिव की कृपा से शक्ति पाकर पुराणों की रचना की। इसके बाद देवी-चरित है, जो मार्कण्डेय पुराण के देवी-माहात्म्य जैसा ही है: राजा सुरथ और समाधि वैश्य को मेधा ऋषि मधु-कैटभ, महिषासुर और शुंभ-निशुंभ के वध की कथा सुनाते हैं।

पचासवें अध्याय में देवी के "दुर्गा" नाम का कारण है। रुरु के पुत्र दुर्गम नाम के दैत्य ने ब्रह्मा के वर से चारों वेद ले लिए; यज्ञ, दान और तप बंद हो गए, और पृथ्वी पर सौ वर्ष का सूखा पड़ा। देवी ने अनंत आँखों वाला रूप लिया, उनकी आँखों से जल की हज़ारों धाराएँ बहीं, और अपने शरीर से उगे शाक से लोगों का पोषण किया। युद्ध में उनके शरीर से दस महाविद्याएँ निकलीं: काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूम्रा, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी। देवी ने दुर्गम को मारकर वेद लौटाए, और देवताओं ने कहा कि आप शताक्षी और शाकंभरी कहलाएँगी, और दुर्गम को मारने से "दुर्गा"। संहिता का अंत नवरात्र व्रत की प्रशंसा से होता है।

छठी, कैलास संहिता, ओंकार (प्रणव) की संहिता है। काशी में मुनि व्यास से प्रणव का अर्थ पूछते हैं, और कथा कैलास पर जाती है, जहाँ पार्वती शिव से मंत्र-दीक्षा लेकर ओंकार के बारे में अनेक प्रश्न करती हैं। उत्तर में ओंकार का स्वरूप, दीक्षा, दैनिक आचार, पूजा का मंडल, आसन और प्राणायाम, शिव की पंचावरण पूजा, और वामदेव ऋषि को स्कंद से प्रणव का अर्थ मिलने की कथा आती है। संहिता का दूसरा भाग संन्यास का है: महावाक्य, योगपट्ट, संन्यासी का आचार, और यह विधान कि संन्यासी का दाह नहीं, भूमि में समाधि होती है, और फिर दसवें से तेरहवें दिन के कर्म।

दुर्गमाख्यो महादैत्यो हतो यस्मात्ततः शिवे । दुर्गां भगवतीं भद्रां व्याहरिष्यंति मानवाः ॥

(देवताओं ने कहा:) हे शिवे, क्योंकि आपने दुर्गम नाम के महादैत्य को मारा, इसलिए मनुष्य आपको भगवती, भद्रा "दुर्गा" कहेंगे।

— शिवपुराणम् (सातों संहिताएँ, हर संहिता/खंड की विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत, पृष्ठ 5.50.36

वायवीय संहिता: नैमिषारण्य और वायु का आगमन

सातवीं, वायवीय संहिता फिर प्रयाग के महासत्र और सूत से शुरू होती है, पर उसके भीतर एक और पुरानी कथा है। ऋषि ब्रह्मा से पूछते हैं कि तप कहाँ करें। ब्रह्मा उन्हें परमेश्वर का उपदेश देते हैं ("जहाँ से मन सहित वाणी लौट आती है"), और फिर कहते हैं: "मैंने यह मनोमय चक्र बनाया है, इसे छोड़ता हूँ; जहाँ इसकी नेमि (परिधि) टूटकर गिरे, वह देश तप के लिए शुभ है।" सूर्य जैसा चमकता चक्र चला, ऋषि उसके पीछे चले, और जहाँ उसकी नेमि गिरी, वही नैमिष कहलाया।

नैमिषारण्य में ऋषियों ने लंबा सत्र किया, और उसके अंत में स्वयं वायु देवता वहाँ आए और ऋषियों से उनका कुशल पूछा। यही कारण है कि इस संहिता का नाम "वायवीय" है: इसका अधिकांश उपदेश वायु देते हैं। वायु बताते हैं कि यह उन्नीसवाँ कल्प "श्वेतलोहित" है, और फिर शिव-तत्त्व का गहरा दर्शन शुरू होता है: प्रकृति क्षर है, पुरुष अक्षर; माया महेश्वर की शक्ति है, और चैतन्य उससे ढका है; कला, विद्या, राग, काल और नियति, ये पाँच आवरण हैं।

आगे के अध्यायों में काल की महिमा और तीनों देवताओं की आयु, सृष्टि, पालन और प्रलय के कर्ता, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा और विष्णु की सृष्टि, रुद्र का प्रकट होना, शिव और शिवा की स्तुति, और देवी-शक्ति की उत्पत्ति आती है। एक अध्याय में देवी के गौरी और गंगा को जन्म देने का भी उल्लेख है।

दक्ष-यज्ञ, वीरभद्र, और काली से गौरी

वायवीय संहिता में दक्ष-यज्ञ की कथा पाँच अध्यायों में है: सती का देह-त्याग, वीरभद्र की उत्पत्ति, यज्ञ-विध्वंस, देवताओं का दंड, और अंत में शिव का प्रसन्न होना। देवी के तपोबल और शिव के क्रोध से गणेश्वर वीरभद्र उत्पन्न हुए, और देवी ने अपने क्रोध से भद्रकाली को रचा। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ में पहुँचकर कहा, "हम सब अमित तेज वाले शर्व (शिव) के अनुचर हैं।" भद्रकाली क्रोध में युद्ध करने लगीं और देवता भाग खड़े हुए। अंत में ब्रह्मा आदि देवताओं की स्तुति से महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने बंदी देवताओं को छोड़ दिया।

फिर एक बहुत मधुर कथा है। मंदराचल पर रहते हुए शिव ने हँसी में पार्वती को उनके साँवले रंग के कारण "काली" कहा। पार्वती को यह बात चुभ गई: "हँसी में भी काली क्यों कहा?" उन्होंने तय किया कि ब्रह्मा की आराधना करके गौरी बनेंगी। तप करते समय एक बड़ा बाघ दुष्ट भाव से उन पर झपटने आया, पर देवी के पास पहुँचते ही उसका भाव बदल गया और वह उनका भक्त बन गया।

ब्रह्मा प्रकट हुए और देवी ने अपनी त्वचा का कोश त्याग दिया; वे गौरी बन गईं, और उस कोश से काले बादल जैसी एक कन्या (काली) उत्पन्न हुई, जिसने माता गौरी और ब्रह्मा को प्रणाम किया। ब्रह्मा ने बताया कि वह बाघ असल में एक दुष्ट निशाचर था, पर देवी की कृपा से उसका कल्याण हुआ। गौरी उस बाघ को अपने पुत्र की तरह आगे करके मंदर पर शिव के पास लौटीं। शिव ने कहा कि मैंने तुम्हें कभी अपनी इच्छा से काली नहीं कहा, और यह जगत मेरे लिए शब्द और अर्थ की तरह (तुमसे अभिन्न) है। देवी ने उस बाघ को अपने पास रखने की प्रार्थना की: "इस बाघ जैसा मेरा उपासक कोई नहीं।"

अस्ति हेत्वन्तरं चात्र शास्त्रयुक्तिविनिश्चितम् । वागर्थमिव मे वैतज्जगत्स्थावरजंगमम् ॥

(शिव पार्वती से:) इसमें एक और कारण भी है, जो शास्त्र और युक्ति से निश्चित है: यह चर-अचर जगत मेरे लिए वाणी और अर्थ की तरह (शिव और शक्ति का अभिन्न रूप) है।

— शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता और वायवीय संहिता — GRETIL e-text, पृष्ठ 7.1.27.15

शब्द और अर्थ: शिव-शक्ति का दर्शन

वायवीय संहिता के उनतीसवें अध्याय का नाम ही "वागर्थक-तत्त्व" है, और यह भारतीय दर्शन का एक सुंदर विचार रखता है: "कोई अर्थ ऐसा नहीं जो शब्द के बिना हो, और कोई शब्द ऐसा नहीं जो अर्थ के बिना हो।" शब्द और अर्थ की यह भावना प्रकृति का ही दो रूपों में परिणाम है, और यह शब्द-अर्थमय छह प्रकार का "अध्व" (मार्ग) ही सारा जगत है। शिव और शक्ति का संबंध भी ऐसा ही है।

शिव पुराण में यही बात शिव स्वयं पार्वती से कहते हैं, जब वे "काली" कहे जाने पर रूठी थीं: जगत उनके लिए वाणी और अर्थ की तरह है, यानी शिव और शक्ति उतने ही अभिन्न हैं जितने शब्द और उसका अर्थ। इसके पहले के अध्याय में भस्म का तत्त्व है: अग्नि शिव का रौद्र, तेजस्वी शरीर है, और भस्म उसी का शेष।

इसके बाद के अध्यायों में शिव-तत्त्व पर प्रश्न, ज्ञानोपदेश, परोक्ष और अपरोक्ष ज्ञान का भेद, "शैव धर्म ही परम धर्म और श्रेष्ठ अनुष्ठान है", और फिर पशुपति व्रत की विधि आती है, जिसे वायु "सब पापों को काटने वाला रहस्य" कहते हैं।

नास्ति कश्चिदशब्दार्थो नापि शब्दो निरर्थकः । ततो हि समये शब्दस्सर्वस्सर्वार्थबोधकः ॥

कोई अर्थ ऐसा नहीं जो शब्द से रहित हो, और कोई शब्द अर्थ से रहित नहीं; इसलिए (उचित) संकेत से हर शब्द हर अर्थ का बोध करा सकता है।

— शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता और वायवीय संहिता — GRETIL e-text, पृष्ठ 7.1.29.2

उपमन्यु: इंद्र के रूप में आए शिव की परीक्षा

वायवीय संहिता के पूर्व खंड का अंत उपमन्यु की कथा से होता है। ऋषि पूछते हैं कि शिव ने एक बालक को क्षीर-सागर कैसे दे दिया। वायु बताते हैं कि यह कोई साधारण बालक नहीं था, मुनिवर व्याघ्रपाद का पुत्र था। एक बार उसने मामा के आश्रम में थोड़ा-सा दूध पिया और मामा के बेटे को भरपेट पीते देखा, और घर आकर माँ से गाय का मीठा दूध माँगा। व्याघ्रपाद की पत्नी ने दुखी होकर अनाज पीसकर पानी में घोला और "नकली दूध" दिया, जिसे बालक ने पहचान लिया। माँ ने कहा, "राज्य, स्वर्ग, मोक्ष और दूध का भोजन, ये शिव की कृपा से मिलते हैं; हम वन में रहते हैं, दूध कहाँ से हो?"

उपमन्यु ने कहा, "देर-सबेर मैं क्षीर-सागर पा लूँगा," और तप करने चला गया। उसके तप से सारा जगत जलने लगा, तो विष्णु ने शिव से प्रार्थना की कि दूध के लिए यह बालक सब जला रहा है, इसे रोकिए। शिव सफ़ेद ऐरावत पर बैठे, शची सहित इंद्र का रूप लेकर उपमन्यु के आश्रम गए और वर देने को कहा। उपमन्यु ने हाथ जोड़कर केवल शिव-भक्ति माँगी। तब "इंद्र" ने कहा, "मुझे, त्रिलोक के स्वामी इंद्र को नहीं पहचानते? मेरे भक्त बनो और उस निर्गुण रुद्र को छोड़ दो, जो देवताओं की पंक्ति से बाहर है।" पंचाक्षर मंत्र जपते उपमन्यु ने कहा, "हे देवाधम, दूध की इच्छा तो रहने दो," और शिव-निंदा सुनकर इंद्र को मारने और स्वयं प्राण त्यागने को उद्यत हो गया।

तब शिव अपने रूप में प्रकट हुए और बोले कि मैं तुम्हें हज़ार क्षीर-सागर, अमृत का सागर भी दे सकता हूँ; "आज मैंने तुम्हें पुत्र बनाया और क्षीर-सागर दिया।" शिव ने उसे दोनों हाथों से उठाया, और साकार क्षीर-सागर ने स्वयं आकर उसके हाथ में अविनाशी मीठा दूध रखा। लिंग पुराण में भी उपमन्यु की यही कथा है, पर वहाँ इंद्र-रूप वाली परीक्षा नहीं है।

वायवीय संहिता का उत्तर खंड: पाशुपत ज्ञान और "नमः शिवाय"

वायवीय संहिता का उत्तर खंड वहीं से आगे बढ़ता है जहाँ उपमन्यु की कथा रुकी थी। पुत्र की कामना से कृष्ण शिव के पास जाते हैं, उपमन्यु से एक वर्ष का पाशुपत व्रत पाते हैं, और शिव की प्रसन्नता से उन्हें सांब नाम का पुत्र मिलता है। फिर उपमन्यु कृष्ण को पाशुपत ज्ञान देते हैं: जीव "पशु" है, माया और अहंकार उसके "पाश" (बंधन), और शिव "पशुपति"; पशुपति के बिना कोई जीव तिनका भी नहीं तोड़ सकता। यहीं "एकं तं बहुधा वदन्ति" (उस एक को ही बहुत प्रकार से कहते हैं) वाला वचन शिव पर समझाया गया है, और यह भी कि जैसे आग से चिनगारियाँ निकलकर उसी में लीन होती हैं, वैसे ही शिव से अनंत शक्तियाँ।

उत्तर खंड का हृदय पंचाक्षर मंत्र "नमः शिवाय" है। तीन अध्याय उसी पर हैं: उसका माहात्म्य, यह कि कलियुग के कलुष भरे समय में भी श्रद्धा से इसका अनुष्ठान करने वाला शिवलोक पाता है, और उसके जप की विधि। इसके बाद शिव-दीक्षा, गुरु की महिमा, शिष्य के संस्कार, "षडध्व" (छह मार्गों) की शुद्धि, न्यास, नित्य और नैमित्तिक कर्म, शैवागम की पूजा-पद्धति, लिंग-पूजा, होम, पंचावरण पूजा और लिंग-प्रतिष्ठा की पूरी विधियाँ हैं। एक अध्याय यह भी कहता है कि बड़े पापी भी शिवलिंग की पूजा से पापमुक्त होते हैं, इसलिए लिंग-पूजा का अधिकार सबको है।

अंत में योग-मार्ग और शिव-योग के भेद आते हैं, और फिर पूरी कथा की समाप्ति: नैमिषारण्य के ऋषि काशी की यात्रा पर जाते हैं, आकाश में एक तेज-पुंज देखते हैं, ब्रह्मा से पूछते हैं, और ब्रह्मा कहते हैं कि वह शैव तेज तुम्हें भी मिलेगा। स्कंद-सरोवर के पास नंदी ऋषियों को शैव ज्ञान देकर शिव के पास चले जाते हैं, और संहिता शिव पुराण के माहात्म्य के साथ पूरी होती है।

विद्वानों के मत: शिव पुराण या वायु पुराण?

अठारह पुराणों की सूचियों में एक पुराना प्रश्न है: चौथा पुराण "शैव" है या "वायवीय"? H. H. Wilson ने 1840 में लिखा कि जिन सूचियों में शिव पुराण नहीं है, उनमें प्रायः उसकी जगह वायु पुराण है; और भागवत की तरह जहाँ शिव का नाम है, वहाँ वायु छूट जाता है। इससे उन्हें लगा कि दोनों नाम एक ही ग्रंथ के हो सकते हैं। मत्स्य पुराण वायवीय को रुद्र-माहात्म्य वाला बताता है, और भागवत (शैव) और मत्स्य (वायवीय) दोनों इसकी संख्या चौबीस हज़ार देते हैं।

Wilson ने यह भी लिखा कि उनके पास जिस "शिव पुराण" की प्रति थी और जिसकी उन्होंने अनुक्रमणिका बनाई, उसमें लगभग सात हज़ार श्लोक ही थे; इसलिए उनके अनुसार वह भागवत वाला शिव पुराण नहीं हो सकता, और भागवत का शिव पुराण मत्स्य का वायवीय ही है। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ परंपराओं में "शैव" नाम एक उपपुराण का माना जाता है।

आज छपा हुआ शिव पुराण, जिसकी सातों संहिताएँ इस पृष्ठ पर हैं, स्वयं को चौबीस हज़ार श्लोकों वाला चौथा पुराण कहता है, और अपनी सातवीं संहिता को "वायवीय" नाम देता है, जिसका अधिकांश उपदेश वायु देते हैं। यानी शिव पुराण ने वायु से जुड़ी परंपरा को भी अपने भीतर रखा है। दोनों में से कौन मूल महापुराण था, इस पर विद्वानों में एक मत नहीं है।

महत्व और आज के लिए अर्थ

आज जो शिव-भक्ति भारत के घर-घर में दिखती है, उसका बड़ा भाग शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता से सीधे जुड़ता है: शिवरात्रि का व्रत, केतकी का फूल शिव पर न चढ़ाना, रुद्राक्ष पहनना, भस्म लगाना, मिट्टी का पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजना, और "शिव, शिव" नाम का जप। ये सब इस पुराण में अपनी कथा और कारण के साथ मिलते हैं। और भी बहुत-सा इसी पुराण से आता है: हर पूजा में पहले गणेश की पूजा, बारह ज्योतिर्लिंगों का सुबह का पाठ, "नमः शिवाय" का जप, शिवरात्रि पर बेलपत्र, और शिव-पार्वती विवाह की पूरी कथा।

पर इस पुराण का सबसे गहरा संदेश शायद उसके आरंभ में ही है: कलियुग में जब यज्ञ और बड़े साधन कठिन हो जाएँ, तब भी शिव तक पहुँचने का रास्ता बंद नहीं होता। कथा सुनो, नाम गाओ, और उस पर मनन करो; और यदि इतना भी न हो, तो श्रद्धा से एक लिंग या मूर्ति की पूजा करो। केतकी की कथा याद दिलाती है कि शिव को सत्य प्रिय है, और उपमन्यु की कथा कि सच्ची भक्ति के आगे क्षीर-सागर भी छोटा है।

आगे पढ़ें

  • लिंग पुराण — ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट शिव, ओंकार, पाशुपत योग, श्वेत और दधीचि की मृत्यु पर विजय, नंदी का जन्म, सुदर्शन चक्र, उपमन्यु और काशी
  • कूर्म पुराण — समुद्र-मंथन के समय कूर्म-रूप विष्णु ने इंद्रद्युम्न और ऋषियों को सुनाया: सृष्टि, त्रिदेव की एकता, देवी, वंश, काशी-प्रयाग, ईश्वर गीता और व्यास गीता
  • पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
  • विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
  • वेद व्यास — जिन्होंने शिव पुराण को 24,000 श्लोकों में संक्षिप्त किया
  • अष्टांग योग — शिव-योग और ध्यान से तुलना के लिए
  • वेद-विभाजन — व्यास और पुराण-परंपरा
  • बारह ज्योतिर्लिंग — हर ज्योतिर्लिंग का अपना पृष्ठ
  • महाशिवरात्रि व्रत कथा — शिवरात्रि की कथा और व्रत
  • श्री गणेश — गणेश की पूजा, आरती और मंत्र

स्रोत एवं संदर्भ

शिव पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न