अष्टांग योग क्या है?
ग्रंथ में
बहुत लोग योग की शुरुआत चटाई बिछाकर करते हैं। पतंजलि की शुरुआत उससे पहले होती है: हम दूसरों से कैसा व्यवहार करते हैं, और अपने साथ कैसा। आठ अंगों में आसन तीसरे स्थान पर आता है, और उससे पहले दो पूरे अंग जीवन के आचरण के हैं।
सूत्र इन अंगों का फल भी बताता है। इनके अनुष्ठान से अशुद्धि घटती जाती है, और ज्ञान का प्रकाश विवेक-ख्याति तक पहुँचता है।
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि॥यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये योग के आठ अंग हैं।
अष्टांग योग के आठ अंग कौन-से हैं?
ग्रंथ में
| अंग | सूत्र के अनुसार अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| 1. यम | अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह | पतंजलि योगसूत्र, 2.30 |
| 2. नियम | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान | पतंजलि योगसूत्र, 2.32 |
| 3. आसन | स्थिर और सुखद बैठना | पतंजलि योगसूत्र, 2.46 |
| 4. प्राणायाम | श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद | पतंजलि योगसूत्र, 2.49 |
| 5. प्रत्याहार | इंद्रियों का विषयों से हटकर चित्त का अनुसरण करना | पतंजलि योगसूत्र, 2.54 |
| 6. धारणा | चित्त को एक स्थान पर बाँधना | पतंजलि योगसूत्र, 3.1 |
| 7. ध्यान | वहीं ज्ञान का एक-सा प्रवाह | पतंजलि योगसूत्र, 3.2 |
| 8. समाधि | केवल विषय का भासना, मानो अपना स्वरूप शून्य हो | पतंजलि योगसूत्र, 3.3 |
पाँच यम: दूसरों के साथ व्यवहार
ग्रंथ में
सूत्र कहता है कि जब ये पाँचों जाति, देश, काल और समय की सीमा से बँधे बिना सर्वत्र पाले जाएँ, तब ये महाव्रत कहलाते हैं। यानी "आज छूट है" या "इस व्यक्ति पर लागू नहीं" वाली शर्तें यहाँ नहीं चलतीं।
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये यम हैं।
| यम | दृढ़ होने पर सूत्र का कथन | स्रोत |
|---|---|---|
| अहिंसा | उसके पास वैर छूट जाता है | पतंजलि योगसूत्र, 2.35 |
| सत्य | कर्म और फल उसकी वाणी के आश्रित होते हैं | पतंजलि योगसूत्र, 2.36 |
| अस्तेय | सब रत्न उसके सामने उपस्थित होते हैं | पतंजलि योगसूत्र, 2.37 |
| ब्रह्मचर्य | वीर्य (शक्ति) का लाभ | पतंजलि योगसूत्र, 2.38 |
| अपरिग्रह | जन्म के कारण का बोध | पतंजलि योगसूत्र, 2.39 |
पाँच नियम: अपने साथ व्यवहार
ग्रंथ में
अगर मन में इनके विरोधी विचार उठें, तो सूत्र का उपाय बहुत व्यावहारिक है: उनके उलटे भाव का चिंतन कीजिए।
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, ये नियम हैं।
| नियम | सूत्र का कथन | स्रोत |
|---|---|---|
| शौच | अपने शरीर से विरक्ति और दूसरों के संसर्ग से दूरी | पतंजलि योगसूत्र, 2.40 |
| संतोष | सबसे उत्तम सुख की प्राप्ति | पतंजलि योगसूत्र, 2.42 |
| तप | अशुद्धि के क्षय से शरीर और इंद्रियों की सिद्धि | पतंजलि योगसूत्र, 2.43 |
| स्वाध्याय | इष्ट देवता से संयोग | पतंजलि योगसूत्र, 2.44 |
| ईश्वर-प्रणिधान | समाधि की सिद्धि | पतंजलि योगसूत्र, 2.45 |
आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार
ग्रंथ में
पतंजलि आसनों की कोई सूची नहीं देते। वे केवल इतना कहते हैं कि आसन स्थिर और सुखद हो, और यह प्रयत्न की शिथिलता से सधता है। इसका फल यह बताया गया है कि फिर सर्दी-गर्मी जैसे द्वंद्व नहीं सताते।
आसन सधने के बाद ही प्राणायाम की बात आती है, यानी श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद। इसका फल यह है कि प्रकाश पर पड़ा आवरण क्षीण होता है, और मन धारणा के योग्य बनता है।
प्रत्याहार में इंद्रियाँ अपने विषयों से हटकर मानो चित्त के स्वरूप का अनुसरण करती हैं। इससे इंद्रियों पर परम वश प्राप्त होता है। यहीं बाहर की साधना पूरी होती है।
स्थिरसुखमासनम्॥जो स्थिर भी हो और सुखद भी, वही आसन है।
बहिरंग और अंतरंग साधन
ग्रंथ में
अंतिम तीन अंग, धारणा, ध्यान और समाधि, एक ही विषय पर साथ होने पर संयम कहलाते हैं। पहले पाँच की तुलना में ये तीनों अंतरंग हैं।
पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। निर्बीज समाधि की तुलना में ये तीनों भी बहिरंग ही हैं। यानी साधक को हमेशा याद रहता है कि मंज़िल इससे भी आगे है।
त्रयमेकत्र संयमः॥ये तीनों एक ही विषय पर हों, तो संयम कहलाते हैं।
अष्टांग योग और आज का "अष्टांग विन्यास" एक हैं क्या?
नाम एक होने से भ्रम होता है। इस पृष्ठ का "अष्टांग योग" योगसूत्र का आठ अंगों वाला मार्ग है। यह किसी व्यायाम की शैली या आसनों का क्रम नहीं है; सूत्र आसनों का कोई क्रम देते ही नहीं।
इसी तरह राज योग और अष्टांग योग को भी हर जगह एक मान लेना ठीक नहीं है। इनका संबंध राज योग के पृष्ठ पर समझाया गया है।
आगे पढ़ें
- राज योग — मन की वह अवस्था, जिसे हठयोग अपना लक्ष्य कहता है
- पतंजलि योगसूत्र — चार पाद, 195 सूत्र: मूल संस्कृत पाठ और सरल अर्थ
- यम — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह: भाष्य के अनुसार
- नियम — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान: भाष्य के अनुसार
- प्रत्याहार — इंद्रियों को भीतर समेटना: बाहरी और भीतरी साधना के बीच का पुल
- धारणा, ध्यान और समाधि — योगसूत्र के तीन अंतरंग अंग, और उनका अंतर
- योग-सूत्र: मन को थामने की विद्या — सूत्रों की ऋषि-परंपरा और सरल व्याख्या
