अष्टांग योग

पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक

संक्षेप में

अष्टांग योग पतंजलि के योगसूत्र का आठ अंगों वाला मार्ग है: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यह केवल व्यायाम का क्रम नहीं है। इसकी शुरुआत आचरण से होती है, और इसका लक्ष्य चित्त की शुद्धि और विवेक का ज्ञान है।

एक नज़र में

मूल ग्रंथ
पतंजलि योगसूत्र 2.28–3.8
अंग
8
बहिरंग
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार
अंतरंग
धारणा, ध्यान, समाधि
फल
अशुद्धि का क्षय और विवेक-ख्याति तक ज्ञान का प्रकाश (2.28)

अष्टांग योग क्या है?

ग्रंथ में

बहुत लोग योग की शुरुआत चटाई बिछाकर करते हैं। पतंजलि की शुरुआत उससे पहले होती है: हम दूसरों से कैसा व्यवहार करते हैं, और अपने साथ कैसा। आठ अंगों में आसन तीसरे स्थान पर आता है, और उससे पहले दो पूरे अंग जीवन के आचरण के हैं।

सूत्र इन अंगों का फल भी बताता है। इनके अनुष्ठान से अशुद्धि घटती जाती है, और ज्ञान का प्रकाश विवेक-ख्याति तक पहुँचता है।

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि॥

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये योग के आठ अंग हैं।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.29

अष्टांग योग के आठ अंग कौन-से हैं?

ग्रंथ में

आठ अंग एक नज़र में
अंगसूत्र के अनुसार अर्थस्रोत
1. यमअहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रहपतंजलि योगसूत्र, 2.30
2. नियमशौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधानपतंजलि योगसूत्र, 2.32
3. आसनस्थिर और सुखद बैठनापतंजलि योगसूत्र, 2.46
4. प्राणायामश्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेदपतंजलि योगसूत्र, 2.49
5. प्रत्याहारइंद्रियों का विषयों से हटकर चित्त का अनुसरण करनापतंजलि योगसूत्र, 2.54
6. धारणाचित्त को एक स्थान पर बाँधनापतंजलि योगसूत्र, 3.1
7. ध्यानवहीं ज्ञान का एक-सा प्रवाहपतंजलि योगसूत्र, 3.2
8. समाधिकेवल विषय का भासना, मानो अपना स्वरूप शून्य होपतंजलि योगसूत्र, 3.3

पाँच यम: दूसरों के साथ व्यवहार

ग्रंथ में

सूत्र कहता है कि जब ये पाँचों जाति, देश, काल और समय की सीमा से बँधे बिना सर्वत्र पाले जाएँ, तब ये महाव्रत कहलाते हैं। यानी "आज छूट है" या "इस व्यक्ति पर लागू नहीं" वाली शर्तें यहाँ नहीं चलतीं।

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥

अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये यम हैं।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.30
यम में स्थिरता का फल (सूत्रों के अनुसार)
यमदृढ़ होने पर सूत्र का कथनस्रोत
अहिंसाउसके पास वैर छूट जाता हैपतंजलि योगसूत्र, 2.35
सत्यकर्म और फल उसकी वाणी के आश्रित होते हैंपतंजलि योगसूत्र, 2.36
अस्तेयसब रत्न उसके सामने उपस्थित होते हैंपतंजलि योगसूत्र, 2.37
ब्रह्मचर्यवीर्य (शक्ति) का लाभपतंजलि योगसूत्र, 2.38
अपरिग्रहजन्म के कारण का बोधपतंजलि योगसूत्र, 2.39

पाँच नियम: अपने साथ व्यवहार

ग्रंथ में

अगर मन में इनके विरोधी विचार उठें, तो सूत्र का उपाय बहुत व्यावहारिक है: उनके उलटे भाव का चिंतन कीजिए।

शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥

शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, ये नियम हैं।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.32
नियमों का फल (सूत्रों के अनुसार)
नियमसूत्र का कथनस्रोत
शौचअपने शरीर से विरक्ति और दूसरों के संसर्ग से दूरीपतंजलि योगसूत्र, 2.40
संतोषसबसे उत्तम सुख की प्राप्तिपतंजलि योगसूत्र, 2.42
तपअशुद्धि के क्षय से शरीर और इंद्रियों की सिद्धिपतंजलि योगसूत्र, 2.43
स्वाध्यायइष्ट देवता से संयोगपतंजलि योगसूत्र, 2.44
ईश्वर-प्रणिधानसमाधि की सिद्धिपतंजलि योगसूत्र, 2.45

आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार

ग्रंथ में

पतंजलि आसनों की कोई सूची नहीं देते। वे केवल इतना कहते हैं कि आसन स्थिर और सुखद हो, और यह प्रयत्न की शिथिलता से सधता है। इसका फल यह बताया गया है कि फिर सर्दी-गर्मी जैसे द्वंद्व नहीं सताते।

आसन सधने के बाद ही प्राणायाम की बात आती है, यानी श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद। इसका फल यह है कि प्रकाश पर पड़ा आवरण क्षीण होता है, और मन धारणा के योग्य बनता है।

प्रत्याहार में इंद्रियाँ अपने विषयों से हटकर मानो चित्त के स्वरूप का अनुसरण करती हैं। इससे इंद्रियों पर परम वश प्राप्त होता है। यहीं बाहर की साधना पूरी होती है।

स्थिरसुखमासनम्॥

जो स्थिर भी हो और सुखद भी, वही आसन है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.46

बहिरंग और अंतरंग साधन

ग्रंथ में

अंतिम तीन अंग, धारणा, ध्यान और समाधि, एक ही विषय पर साथ होने पर संयम कहलाते हैं। पहले पाँच की तुलना में ये तीनों अंतरंग हैं।

पर सूत्र यहीं नहीं रुकता। निर्बीज समाधि की तुलना में ये तीनों भी बहिरंग ही हैं। यानी साधक को हमेशा याद रहता है कि मंज़िल इससे भी आगे है।

त्रयमेकत्र संयमः॥

ये तीनों एक ही विषय पर हों, तो संयम कहलाते हैं।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 3.4

अष्टांग योग और आज का "अष्टांग विन्यास" एक हैं क्या?

नाम एक होने से भ्रम होता है। इस पृष्ठ का "अष्टांग योग" योगसूत्र का आठ अंगों वाला मार्ग है। यह किसी व्यायाम की शैली या आसनों का क्रम नहीं है; सूत्र आसनों का कोई क्रम देते ही नहीं।

इसी तरह राज योग और अष्टांग योग को भी हर जगह एक मान लेना ठीक नहीं है। इनका संबंध राज योग के पृष्ठ पर समझाया गया है।

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अष्टांग योग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न