हठ योग क्या है?
ग्रंथ में
"हठ" सुनकर लगता है कि यह ज़बरदस्ती का योग होगा। ग्रंथ की भावना इसके उलट है। प्रदीपिका हठ योग की तुलना ऐसे घर से करती है जो तीन तापों की धूप से बचाता है, और उस कछुए से जो योग में लगे साधकों को आधार देता है।
ग्रंथ के अनुसार आसन हठ का पहला अंग है, जो स्थिरता, स्वास्थ्य और शरीर के हल्केपन के लिए किया जाता है। और यह सीधे राज योग की ओर ले जाने वाली साधना है।
हठ योग के मुख्य साधन
ग्रंथ में
| साधन | हठयोग प्रदीपिका | घेरंड संहिता | स्रोत |
|---|---|---|---|
| षट्कर्म | केवल मेद या कफ की अधिकता वालों के लिए (2.21) | पहला उपदेश (1.12) | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 2.21–22; घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.12 |
| आसन | पहला अध्याय | 32 आसन (2.3–6) | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), अध्याय 1; घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 2.3–6 |
| कुंभक | आठ कुंभक (2.44) | आठ कुंभक (5.46) | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 2.44; घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 5.46 |
हठ योग में अभ्यास क्यों ज़रूरी है?
ग्रंथ में
प्रदीपिका का एक वचन हर साधक के लिए है। युवा हो, वृद्ध हो, अति वृद्ध हो, रोगी हो या दुर्बल, जो आलस छोड़कर अभ्यास करता है, उसे सिद्धि मिलती है।
और इसके तुरंत बाद वह साफ़ कहती है कि योग की पुस्तकें पढ़ने से सिद्धि नहीं मिलती, और न विशेष वेश या कथा कहने से। अभ्यास ही साधन है। यह बात इस ज्ञानकोश पर भी लागू होती है: पढ़ना शुरुआत है, साधना नहीं।
हठ योग में क्या सावधानी रखें?
ग्रंथों के कई अभ्यास गुरु के बिना नहीं
कुंभक, मुद्रा और षट्कर्म की बातें जानकारी के लिए हैं, घर पर करने के निर्देश नहीं। प्रदीपिका स्वयं षट्कर्म को केवल मेद या कफ की अधिकता वालों के लिए बताती है, सबके लिए नहीं।
- नए हैं तो शीर्षासन, सर्वांगासन, पद्मासन और ज़ोर की श्वास जैसे कठिन अभ्यासों से बचिए, और योग्य प्रशिक्षक से सीखिए।
- पुराना रोग, दर्द, हृदय की समस्या या गर्भावस्था हो तो पहले चिकित्सक या योग विशेषज्ञ से पूछिए।
पुराना हठ योग और आज का योग
आज जिसे लोग "हठ योग की क्लास" कहते हैं, वह ज़्यादातर आसनों का अभ्यास होती है। ग्रंथों का हठ योग उससे बड़ा है: उसमें कुंभक, मुद्रा और नाद भी हैं, और उसका लक्ष्य राज योग है। दूसरी ओर, आज के कई प्रचलित आसन प्रदीपिका और घेरंड की सूचियों में नहीं मिलते। इसलिए दोनों को एक कहना ठीक नहीं।
हठ योग के अंग और उसके अधिकारी
ग्रंथ में
योगतत्त्व उपनिषद् हठ योग के अंग इस तरह गिनाता है: यम, नियम, आसन, प्राण-संयम, प्रत्याहार, धारणा, भौंहों के बीच हरि का ध्यान, और समता की अवस्था समाधि; और साथ में महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, जालंधर, उड्डियाण और मूल बंध, लंबा प्रणव-जप, सिद्धांत का श्रवण, और वज्रोली, अमरोली व सहजोली।
शिव संहिता के अनुसार हठ योग अधिमात्र साधकों के लिए है: स्थिर मन वाले, स्वतंत्र, ऊर्जावान, उदार, दयालु, क्षमाशील, सत्यवादी, साहसी, श्रद्धालु, गुरु के चरणों के उपासक और सदा योग में लगे; ग्रंथ कहता है कि वे छह वर्ष में सफल होते हैं।
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार बहुत खाना, बहुत परिश्रम, बहुत बोलना, नियमों से चिपके रहना, लोगों की संगत और चंचलता योग को नष्ट करते हैं; और साहस, हिम्मत, लगन, विवेक, श्रद्धा और संगत से दूरी जल्दी सफलता देते हैं।
आगे पढ़ें
- राज योग — मन की वह अवस्था, जिसे हठयोग अपना लक्ष्य कहता है
- हठयोग प्रदीपिका — स्वात्माराम का ग्रंथ: आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि
- घेरंड संहिता — घेरंड और चंडकापालि का संवाद: शरीर की शुद्धि से समाधि तक सात साधन
- शुद्धि क्रियाएँ (षट्कर्म) — हठयोग की छह शुद्धि क्रियाएँ: ग्रंथ क्या कहते हैं, और कौन इन्हें करे
- योगासन — आसनों की विधि, सावधानियाँ, और पुराने ग्रंथों में उनका स्थान
- प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास
