योगासन क्या है?
ग्रंथ में
योगसूत्र आसन की कोई सूची नहीं देता। वह कहता है कि आसन स्थिर और सुखद हो, और यह प्रयत्न की शिथिलता से सधता है। यह परिभाषा हर आसन पर लागू होती है: जिस आसन में शरीर काँपे और मन बेचैन हो, वह अभी सधा नहीं।
हठयोग प्रदीपिका आसन को हठ का पहला अंग कहती है, जो स्थिरता, आरोग्य और शरीर के हल्केपन के लिए है।
स्थिरसुखमासनम्॥जो स्थिर भी हो और सुखद भी, वही आसन है।
पुराने ग्रंथों के आसन और आज के आसन
हठयोग प्रदीपिका पहले अध्याय में 15 आसन देती है, घेरंड संहिता 32, और शिव संहिता 84 में से चार को प्रमुख कहती है। आज के कई लोकप्रिय आसन इन सूचियों में नहीं मिलते। इसलिए हर आसन के पृष्ठ पर एक label लगा है, जो बताता है कि वह इन ग्रंथों में मिलता है, नाम मिलता है पर रूप अलग है, या इनमें नहीं मिला।
हठयोग प्रदीपिका के 15 आसन
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका कहती है कि वह वसिष्ठ जैसे मुनियों और मत्स्येन्द्र जैसे योगियों के अपनाए कुछ आसन बता रही है। शिव ने 84 आसन सिखाए, जिनमें पहले चार, सिद्ध, पद्म, सिंह और भद्र, आवश्यक हैं; और उनमें भी सिद्धासन सबसे सुखद होने से सदा करने योग्य है।
| आसन | ग्रंथ का वर्णन और फल | स्रोत |
|---|---|---|
| स्वस्तिक | दोनों तलवे जाँघों के नीचे, शरीर सीधा, शांत बैठना | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.21 |
| गोमुख | दाहिना टखना बाईं ओर, बायाँ दाहिनी ओर; गाय के मुख जैसा | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.22 |
| वीर | एक पैर विपरीत जाँघ पर, दूसरा पैर दूसरी जाँघ पर | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.23 |
| कूर्म | दाहिना टखना गुदा के बाईं ओर, बायाँ दाहिनी ओर | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.24 |
| कुक्कुट | पद्मासन में हाथ जाँघों के नीचे से निकालकर, हथेलियों पर शरीर उठाना | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.25 |
| उत्तान कूर्म | कुक्कुटासन से हाथों से गर्दन पकड़कर पीठ के बल लेटना; कछुए जैसा | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.26 |
| धनुर | हाथों से पैरों के अँगूठे पकड़कर, शरीर धनुष की तरह खींचते हुए कानों तक | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.27 |
| मत्स्येन्द्र | पैर विपरीत जाँघों की जड़ पर, पीठ के पीछे से अँगूठे पकड़ना; भूख बढ़ाता, कुंडलिनी जगाता | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.28–29 |
| पश्चिमतान | पैर लाठी की तरह फैलाकर, अँगूठे पकड़कर, माथा जाँघों पर; जठराग्नि, मोटापा घटाना | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.30–31 |
| मयूर | हथेलियाँ ज़मीन पर, नाभि कोहनियों पर, शरीर लाठी की तरह; रोग, अपच और विष का नाश | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.32–33 |
| शव | भूमि पर शव की तरह लेटना; थकान दूर, मन को विश्राम | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.34 |
| सिद्ध | एड़ी मूलाधार पर, दूसरी जननेंद्रिय के ऊपर, दृष्टि भौंहों के बीच; सब आसनों में प्रमुख | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.37–45 |
| पद्म | पैर विपरीत जाँघों पर, ठोड़ी छाती पर, दृष्टि नासाग्र; सब रोगों का नाशक | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.46–51 |
| सिंह | एड़ियाँ सीवन के विपरीत ओर, उँगलियाँ फैलाए हाथ जाँघों पर, मुँह खुला, दृष्टि नासाग्र; तीनों बंध पूरे करता | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.52–54 |
| भद्र | एड़ियाँ सीवन के दोनों ओर, हाथों से पैर दृढ़ता से पकड़ना; सब रोगों का नाशक, इसे गोरक्षासन भी कहते हैं | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.55–57 |
घेरंड संहिता के 32 आसन
ग्रंथ में
घेरंड संहिता कहती है कि संसार में जितनी जीवों की जातियाँ हैं, उतने ही आसन हैं, यानी चौरासी लाख। उनमें चौरासी श्रेष्ठ हैं, और उन चौरासी में से बत्तीस इस संसार में मनुष्यों के लिए उपयोगी पाए गए हैं।
ये बत्तीस आसन हैं: सिद्ध, पद्म, भद्र, मुक्त, वज्र, स्वस्तिक, सिंह, गोमुख, वीर, धनुर, मृत (शव), गुप्त, मत्स्य, मत्स्येन्द्र, गोरक्ष, पश्चिमोत्तान, उत्कट, संकट, मयूर, कुक्कुट, कूर्म, उत्तान मंडूक, उत्तान कूर्म, वृक्ष, मंडूक, गरुड़, वृष, शलभ, मकर, उष्ट्र, भुजंग और योगासन।
घेरंड संहिता शरीर-शुद्धि के बाद आसन को योग की दूसरी सीढ़ी कहती है, जिससे दृढ़ता आती है।
हर आसन के लिए सामान्य नियम
आधुनिक अभ्यास
अभ्यास से पहले: आयुष की पुस्तिका शौच, यानी आसपास, शरीर और मन की स्वच्छता, को योग की पहली शर्त कहती है। अभ्यास शांत वातावरण में, शिथिल शरीर और मन से, खाली या हल्के पेट किया जाए; कमज़ोरी लगे तो गुनगुने पानी में थोड़ा शहद लिया जा सकता है। मूत्राशय और आँतें खाली हों, और चटाई, दरी या मुड़ा कंबल हो, सूती, ढीले कपड़ों के साथ।
थकान, बीमारी, जल्दबाज़ी या तीव्र तनाव में अभ्यास न करें। पुराना रोग, दर्द या हृदय की समस्या हो, तो पहले चिकित्सक या योग-चिकित्सक से पूछें; गर्भावस्था और मासिक धर्म में योग विशेषज्ञ की सलाह से ही अभ्यास करें।
अभ्यास के दौरान: शुरुआत प्रार्थना से हो। हर अभ्यास धीरे, शिथिल होकर, शरीर और साँस के प्रति सजग रहकर किया जाए। विशेष रूप से न कहा जाए तो साँस न रोकें, और साँस हमेशा नाक से लें। शरीर को अकड़ाएँ नहीं और झटका न दें; अपनी क्षमता के अनुसार ही करें। अच्छे परिणाम में समय लगता है, इसलिए नियमित अभ्यास ज़रूरी है। हर अभ्यास के अपने निषेध हैं, जिन्हें हमेशा ध्यान में रखें। सत्र ध्यान, मौन, संकल्प या शांति पाठ से समाप्त हो।
अभ्यास के बाद: नहाना और भोजन, दोनों अभ्यास के 20–30 मिनट बाद। पुस्तिका सामान्यतः शाकाहारी भोजन की सलाह देती है, और कहती है कि 30 वर्ष से अधिक आयु वाले के लिए, रोग या बहुत अधिक शारीरिक श्रम को छोड़कर, दिन में दो बार भोजन पर्याप्त है।
साँस के बारे में: Swami Sivananda की "Yoga Asanas" कई आसनों में साँस रोकने को कहती है, जबकि आयुष की पुस्तिका कहती है कि विशेष रूप से न कहा जाए तो साँस न रोकें। इस कोश के आसन-पृष्ठों पर आयुष वाला नियम माना गया है।
आसनों के लाभ के बारे में
आयुष की पुस्तिका कहती है कि योग मूलतः सब बंधनों से मुक्ति का मार्ग है, और हाल के चिकित्सा शोध ने इसके कई शारीरिक और मानसिक लाभ पाए हैं: शारीरिक फ़िटनेस, मांसपेशियों-हड्डियों के कामकाज और हृदय-स्वास्थ्य के लिए लाभ; मधुमेह, श्वास-रोग, उच्च और निम्न रक्तचाप और जीवनशैली से जुड़े विकारों के प्रबंधन में लाभ; अवसाद, थकान, चिंता और तनाव में कमी; और मासिक धर्म व रजोनिवृत्ति के लक्षणों को संतुलित करने में मदद।
हर आसन के पृष्ठ पर पुस्तिका और ग्रंथों में बताए लाभ पूरे दिए गए हैं, उनके स्रोत के नाम से। वे पुस्तिका और ग्रंथों के कथन हैं; किसी रोग में आसन दवा या चिकित्सक की जगह नहीं लेता।
आसन का सुरक्षित अभ्यास कैसे करें?
पहले यह पढ़िए
यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है, चिकित्सक की सलाह का स्थान नहीं लेती। कठिन आसन योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में ही सीखिए।
- खाली या हल्के पेट अभ्यास कीजिए, और मूत्राशय व आँतें खाली हों।
- चटाई, दरी या मुड़े कंबल पर, ढीले आरामदायक कपड़ों में अभ्यास कीजिए।
- थकान, बीमारी, जल्दबाज़ी या तीव्र तनाव में अभ्यास न कीजिए।
- नए हैं तो शीर्षासन, सर्वांगासन और पद्मासन जैसे कठिन आसनों से बचिए।
- अभ्यास के 20–30 मिनट बाद ही नहाइए या भोजन कीजिए।
खड़े होकर किए जाने वाले आसन
बैठकर किए जाने वाले आसन
पेट के बल किए जाने वाले आसन
पीठ के बल किए जाने वाले आसन
संतुलन और कठिन आसन
आगे पढ़ें
- अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
- हठ योग — शरीर और प्राण से मन तक पहुँचने वाला मार्ग
- प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास
