अर्ध मत्स्येन्द्रासन

Ardha Matsyendrasana: रीढ़ को बगल में घुमाने वाला आसन

संक्षेप में

अर्ध मत्स्येन्द्रासन बैठकर रीढ़ को बगल की ओर घुमाने का आसन है, जिसमें एक घुटना ऊपर मोड़कर धड़ और चेहरा उसी ओर घुमाया जाता है। इसका नाम योगी मत्स्येन्द्रनाथ से जुड़ा है। हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता में पूरा मत्स्येन्द्रासन है; "अर्ध" यानी आधा रूप उनमें इस नाम से नहीं मिलता।

नाम ग्रंथों में है, पर रूप आज से अलग है

एक नज़र में

संस्कृत नाम
अर्ध मत्स्येन्द्रासन
प्रकार
बैठकर, रीढ़ का घुमाव
समय
5 से 15 सेकंड, दोनों ओर (Sivananda)
ग्रंथ में
मत्स्येन्द्रासन: हठयोग प्रदीपिका अध्याय 1; घेरंड संहिता 2.22–23

अर्ध मत्स्येन्द्रासन का नाम कैसे पड़ा?

अर्ध का अर्थ आधा है। Sivananda के अनुसार यह नाम योगी मत्स्येन्द्र से है, जिन्होंने हठ योग के शिष्यों को सबसे पहले यह आसन सिखाया।

Sivananda एक पारंपरिक कथा भी देते हैं: एक निर्जन द्वीप पर शिव पार्वती को योग सिखा रहे थे, और पास की एक मछली ने वह उपदेश सुन लिया। शिव ने कृपा करके उस पर जल छिड़का, और वह दिव्य शरीर वाला सिद्ध योगी बन गई, जिसे मत्स्येन्द्र कहा गया। यह परंपरा की कथा है, इतिहास नहीं।

अर्ध मत्स्येन्द्रासन करने की विधि

आधुनिक अभ्यास

विधि Sivananda की "Yoga Asanas" के अनुसार है।

  1. बाईं एड़ी गुदा के पास, शरीर के नीचे रखिए।
  2. दाहिना घुटना मोड़कर दाहिना पैर बाएँ कूल्हे के पास ज़मीन पर रखिए, घुटना ऊपर की ओर।
  3. बाईं बगल को दाहिने घुटने के ऊपर लाइए, और बाएँ हाथ से बायाँ घुटना पकड़िए।
  4. धीरे-धीरे रीढ़ को दाहिनी ओर घुमाइए, चेहरा भी दाहिने कंधे की सीध में। दाहिना हाथ पीठ के पीछे घुमाकर बाईं जाँघ पकड़िए।
  5. रीढ़ सीधी रखते हुए 5 से 15 सेकंड रुकिए, फिर दूसरी ओर दोहराइए।

अर्ध मत्स्येन्द्रासन का उद्देश्य

Sivananda के अनुसार आगे और पीछे मोड़ने वाले आसनों के साथ रीढ़ का बगल में घुमाव भी ज़रूरी है, और यह आसन वही घुमाव देता है।

अर्ध मत्स्येन्द्रासन में क्या सावधानी रखें?

पहले यह पढ़िए

रीढ़, कमर या पेट की कोई समस्या, या हाल की सर्जरी हो तो पहले चिकित्सक से पूछिए, और घुमाव ज़बरदस्ती मत बढ़ाइए।

अर्ध मत्स्येन्द्रासन की आम ग़लतियाँ

आधुनिक अभ्यास

  • झुककर घूमना: Sivananda रीढ़ को सीधा रखने और न झुकने को कहते हैं।

क्या अर्ध मत्स्येन्द्रासन पुराने ग्रंथों में है?

हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता दोनों में मत्स्येन्द्रासन है, "अर्ध" नहीं। घेरंड का वर्णन भी अलग है: बायाँ पैर दाहिनी जाँघ पर, उस पर दाहिने हाथ की कोहनी, चेहरा दाहिनी हथेली पर, और दृष्टि भौंहों के बीच।

हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनुवाद) के वर्णन में दाहिना पैर बाईं जाँघ की जड़ पर रखकर, पीठ के पीछे से दाहिने हाथ से उसका अँगूठा पकड़ा जाता है, और बायाँ पैर दाहिनी जाँघ की जड़ पर रखकर पीठ के पीछे से बाएँ हाथ से पकड़ा जाता है; ग्रंथ इसे श्री मत्स्यनाथ का बताया आसन कहता है।

प्रदीपिका के अनुसार यह भूख बढ़ाता है, सबसे घातक रोगों के समूह को नष्ट करने का साधन है, इसके अभ्यास से कुंडलिनी जागती है, और यह चंद्र से टपकते अमृत को रोकता है।

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  • गोमुखासन — Gomukhasana (Cow-Face Posture): गाय के मुख जैसी आकृति
  • पश्चिमोत्तानासन — Paschimottanasana: बैठकर आगे झुकना, पैरों के अँगूठे पकड़कर
  • वज्रासन — Vajrasana (Thunderbolt Posture): एड़ियों के बीच बैठने वाला ध्यान का आसन
  • योगासन — आसनों की विधि, सावधानियाँ, और पुराने ग्रंथों में उनका स्थान

अर्ध मत्स्येन्द्रासन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न