योग दर्शन

पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य

संक्षेप में

योग दर्शन वह विचार-धारा है जो पतंजलि के योगसूत्र और उस पर लिखे भाष्य में मिलती है। इसका केंद्र मन है: चित्त की वृत्तियाँ, दुख की जड़ में बैठे पाँच क्लेश, कर्म और संस्कार, और अंत में कैवल्य, यानी द्रष्टा का अपने स्वरूप में ठहर जाना।

योग दर्शन क्या है?

ग्रंथ में

योग का अभ्यास तो बहुत लोग करते हैं, पर योग दर्शन यह पूछता है कि अभ्यास किसलिए है। इसका उत्तर सूत्रों में बहुत छोटे वाक्यों में है, और भाष्य उन्हें खोलता है। सूत्र स्वयं को "अनुशासन" कहते हैं, यानी पहले से चली आती विद्या का क्रमबद्ध रूप।

योग दर्शन का एक बड़ा कथन दुख के बारे में है। सूत्र कहता है कि जो दुख अभी आया नहीं, वही त्यागने योग्य है, और उस दुख का कारण है द्रष्टा और दृश्य का संयोग। इसी संयोग के न रहने को कैवल्य कहा गया है, और उसका उपाय है अडिग विवेक-ख्याति।

हेयं दुःखमनागतम्॥

जो दुख अभी आया नहीं, वही त्यागने (रोकने) योग्य है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.16

योग दर्शन के मुख्य विचार

ग्रंथ में

योग दर्शन एक नज़र में
विचारसूत्र का कथनस्रोत
योगचित्त की वृत्तियों का निरोधपतंजलि योगसूत्र, 1.2
उपायअभ्यास और वैराग्यपतंजलि योगसूत्र, 1.12
क्लेशअविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेशपतंजलि योगसूत्र, 2.3
कर्मक्लेश की जड़ से बना कर्माशयपतंजलि योगसूत्र, 2.12
मार्गआठ अंगपतंजलि योगसूत्र, 2.29
लक्ष्यकैवल्यपतंजलि योगसूत्र, 2.25, 4.34

योगसूत्र के चार पाद

ग्रंथ में

योगसूत्र चार पादों (अध्यायों) में है। इस कोश में लिए गए आनंदाश्रम पाठ में कुल 195 सूत्र हैं: समाधि पाद में 51, साधन पाद में 55, विभूति पाद में 55, और कैवल्य पाद में 34।

चार पाद और उनके विषय
पादसूत्रमुख्य विषयस्रोत
समाधि पाद51योग की परिभाषा, वृत्तियाँ, अभ्यास-वैराग्य, ईश्वर, विघ्न, समाधि के प्रकारपतंजलि योगसूत्र, 1.1–1.51
साधन पाद55क्रियायोग, पाँच क्लेश, कर्म, द्रष्टा-दृश्य, अष्टांग के पहले पाँच अंगपतंजलि योगसूत्र, 2.1–2.55
विभूति पाद55धारणा, ध्यान, समाधि, संयम और उससे मिलने वाली विभूतियाँपतंजलि योगसूत्र, 3.1–3.55
कैवल्य पाद34सिद्धियों के स्रोत, कर्म और वासना, चित्त का स्वरूप, धर्ममेघ समाधि, कैवल्यपतंजलि योगसूत्र, 4.1–4.34

दृश्य, द्रष्टा और विवेक

ग्रंथ में

योग दर्शन संसार को दृश्य कहता है। सूत्र के अनुसार दृश्य का स्वभाव प्रकाश, क्रिया और स्थिति है (यानी सत्त्व, रज और तम), वह भूतों और इंद्रियों के रूप में है, और उसका प्रयोजन भोग और अपवर्ग (मुक्ति) है। दृश्य का अस्तित्व द्रष्टा के लिए ही है।

सूत्र कहता है कि जिसका प्रयोजन पूरा हो गया, उसके लिए दृश्य नष्ट हो जाता है, पर दूसरों के लिए बना रहता है, क्योंकि वह सबके लिए साझा है।

विवेकी के लिए सब कुछ दुख ही है, सूत्र के अनुसार चार कारणों से: परिणाम का दुख (सुख भी बदलकर दुख देता है), ताप का दुख (सुख छिनने का डर), संस्कार का दुख (सुख की छाप फिर लालसा जगाती है), और गुणों की वृत्तियों का आपसी विरोध।

इस दुख से छूटने का उपाय अविचल विवेक-ख्याति है, यानी द्रष्टा और दृश्य के भेद का निरंतर, बिना डगमगाए ज्ञान। सूत्र कहता है कि ऐसे साधक की अंतिम भूमि की प्रज्ञा सात प्रकार की होती है, और योग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि घटने पर ज्ञान का प्रकाश विवेक-ख्याति तक बढ़ता जाता है।

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