षट्कर्म कौन-से हैं?
ग्रंथ में
दोनों ग्रंथ छह कर्म गिनाते हैं। घेरंड संहिता नौली को लौलिकी कहती है, और कई कर्मों के भेद भी बताती है।
| कर्म | घेरंड संहिता के भेद | स्रोत |
|---|---|---|
| धौति | अंतर्धौति (वातसार, वारिसार, अग्निसार, बहिष्कृत); दंतधौति (दंतमूल, जिह्वा, दोनों कान, कपालरंध्र); हृद्धौति (दंड, वमन, वस्त्र); मूलशोधन | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.13–44 |
| बस्ती | जल बस्ती, स्थल (सूखी) बस्ती | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.45–49 |
| नेति | सूत्र से | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.50–51 |
| लौलिकी (नौली) | पेट को एक ओर से दूसरी ओर घुमाना | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.52 |
| त्राटक | छोटी वस्तु पर अपलक दृष्टि | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.53–54 |
| कपालभाति | वामक्रम, व्युत्क्रम, शीतक्रम | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.55–60 |
घेरंड संहिता में षट्कर्म का स्थान
ग्रंथ में
घेरंड संहिता योग के सात साधन बताती है और हर एक का फल: छह कर्मों से शुद्धि, आसन से दृढ़ता, मुद्रा से स्थिरता, प्रत्याहार से धीरता, प्राणायाम से हल्कापन, ध्यान से आत्मा का प्रत्यक्ष, और समाधि से निर्लिप्तता, जो निश्चित ही मुक्ति है।
यानी इस ग्रंथ में षट्कर्म योग की पहली सीढ़ी हैं, जिनसे बाकी अभ्यासों के लिए शरीर तैयार होता है।
षट्कर्म किसके लिए हैं?
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका कहती है कि जिनके शरीर में मेद या कफ की अधिकता हो, वे पहले षट्कर्म करें; और जिनमें यह अधिकता नहीं, उन्हें इनकी आवश्यकता नहीं। ग्रंथ इन क्रियाओं को गुप्त रखने को भी कहता है, यानी ये गुरु से सीखी जाने वाली चीज़ें हैं।
प्रदीपिका कहती है कि ये छह कर्म शरीर को शुद्ध करते हैं, असाधारण गुण देते हैं, और श्रेष्ठ योगी इन्हें लगन से करते हैं।
प्रदीपिका के अनुसार षट्कर्मों से कफ के दोषों से पैदा मोटापा दूर करके जब प्राणायाम किया जाता है, तो उसमें सफलता आसानी से मिलती है।
प्रदीपिका यह भी बताती है कि कुछ आचार्य मानते हैं कि केवल प्राणायाम से ही सारी अशुद्धियाँ सूख जाती हैं, और वे किसी दूसरे अभ्यास की सलाह नहीं देते।
नाड़ी-शुद्धि के लक्षण
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार जब नाड़ियाँ अशुद्धियों से मुक्त होती हैं, तो बाहर के लक्षण दिखते हैं: शरीर दुबला होता है और रंग चमकने लगता है; तब सफलता निश्चित समझनी चाहिए।
अशुद्धियाँ दूर होने पर वायु इच्छा के अनुसार रोकी जा सकती है, भूख बढ़ती है, दिव्य नाद जागता है, और शरीर स्वस्थ होता है।
गजकरणी: प्रदीपिका की एक और क्रिया
ग्रंथ में
छह कर्मों के बाद प्रदीपिका गजकरणी का वर्णन करती है: अपान वायु को कंठ तक ले जाकर पेट का भोजन आदि बाहर निकाल दिया जाता है। ग्रंथ कहता है कि धीरे-धीरे इससे शंखिनी नाड़ी-तंत्र का ज्ञान होता है। इसे हठ में गजकरणी कहते हैं।
सावधानी
ये पृष्ठ ग्रंथ का वर्णन हैं, घर पर करने की विधि नहीं
षट्कर्म के पृष्ठों पर ग्रंथों का पूरा वर्णन और उनके बताए सारे लाभ दिए गए हैं। ये ग्रंथ के कथन हैं; इन्हें किसी रोग का इलाज न मानें।
धौति, बस्ती और नेति जैसी क्रियाएँ शरीर के भीतर की जाती हैं, जिनमें चोट और संक्रमण का जोखिम है। इन्हें योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में ही सीखिए, और कोई भी रोग हो तो पहले चिकित्सक से पूछिए।
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