कपालभाति

षट्कर्म, प्राणायाम नहीं: ग्रंथों का वर्णन, तीन भेद और आयुष प्रोटोकॉल

संक्षेप में

कपालभाति में साँस तेज़ी से, पेट की मांसपेशियों को सिकोड़कर बाहर छोड़ी जाती है, और भीतर अपने आप आती है। हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता इसे प्राणायाम नहीं, षट्कर्म यानी शुद्धि क्रिया मानते हैं। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, चक्कर, मिर्गी, हर्निया, गर्भावस्था और मासिक धर्म में यह नहीं करना चाहिए।

एक नज़र में

वर्गीकरण
षट्कर्म (प्रदीपिका 2.22; घेरंड 1.12)
प्रदीपिका का वर्णन
धौंकनी की तरह तेज़ श्वास (2.35)
घेरंड के भेद
वामक्रम, व्युत्क्रम, शीतक्रम (1.55)
आयुष प्रोटोकॉल
शुरुआत में 20 तेज़ श्वासों के 3 चक्र तक

कपालभाति प्राणायाम है या षट्कर्म?

ग्रंथ में

Swami Sivananda के अनुसार कपाल का अर्थ है खोपड़ी और भाति का अर्थ है चमकना; यह क्रिया खोपड़ी को, यानी सिर के भीतर के मार्गों को, शुद्ध करती है।

कपालभाति को अक्सर प्राणायाम कहा जाता है, पर ग्रंथ इसे षट्कर्मों में रखते हैं। हठयोग प्रदीपिका की छह शुद्धि क्रियाओं में यह छठी है, और घेरंड संहिता में भी।

प्रदीपिका के अनुसार जब साँस का भरना और छोड़ना बहुत तेज़ी से, लोहार की धौंकनी की तरह किया जाए, तो वह कपालभाति है, और यह कफ की अधिकता से पैदा सारे विकारों को सुखा देती है।

घेरंड संहिता के तीन भेद

ग्रंथ में

घेरंड संहिता कपालभाति के तीन भेद बताती है: वामक्रम, व्युत्क्रम और शीतक्रम, और कहती है कि तीनों कफ के विकार नष्ट करते हैं।

वामक्रम में बाईं नासिका से साँस लेकर दाहिनी से छोड़ी जाती है, फिर दाहिनी से लेकर बाईं से। ग्रंथ साफ़ कहता है कि यह साँस लेना और छोड़ना बिना किसी ज़ोर के किया जाए, और यह कफ के विकार नष्ट करता है।

व्युत्क्रम में दोनों नासिकाओं से पानी खींचकर धीरे-धीरे मुँह से निकाला जाता है; यह भी कफ के विकार नष्ट करता है।

शीतक्रम में मुँह से पानी खींचकर नासिकाओं से निकाला जाता है। ग्रंथ कहता है कि इससे अभ्यासी कामदेव जैसा हो जाता है, उसे बुढ़ापा नहीं आता, जर्जरता उसे कुरूप नहीं करती, शरीर स्वस्थ और लचीला होता है, और कफ के विकार नष्ट होते हैं। पानी वाले ये दोनों भेद गुरु से ही सीखे जाने वाले अभ्यास हैं।

आयुष प्रोटोकॉल में कपालभाति

आधुनिक अभ्यास

आयुष मंत्रालय अपने Common Yoga Protocol में कपालभाति को एक क्रिया के रूप में सिखाता है। उसके वर्णन के अनुसार सुखासन, पद्मासन या वज्रासन जैसे किसी ध्यान के आसन में, आँखें बंद करके, पूरा शरीर ढीला छोड़कर बैठा जाता है; पहले दोनों नासिकाओं से गहरी साँस लेकर छाती फैलाई जाती है, फिर श्रोणि और पेट की मांसपेशियों को ज़ोर से सिकोड़कर साँस बाहर छोड़ी जाती है, और साँस भीतर अपने आप आती है। पुस्तिका कहती है: ज़ोर मत डालिए, और छाती व कंधों को अनावश्यक रूप से न हिलाइए।

पुस्तिका के अनुसार 30 तेज़ श्वासों के बाद एक गहरी साँस लेकर धीरे छोड़ी जाती है और पूरी तरह शिथिल हुआ जाता है; यह एक चक्र है, हर चक्र के बाद कुछ देर स्थिर रहा जाता है, और ऐसे दो चक्र और किए जाते हैं। शुरुआती लोग 20 तेज़ श्वासों के 3 चक्र तक कर सकते हैं, और संख्या समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ाई जाती है।

स्वामी शिवानंद की "हठ योग" में कपालभाति

परंपरा

Sivananda पद्मासन या सिद्धासन में आँखें बंद करके बैठने और रेचक व पूरक तेज़ी से करने का वर्णन करते हैं, जिसमें रेचक पेट की मांसपेशियाँ सिकोड़कर ज़ोर से किया जाता है। वे एक चक्र में 20 बार साँस बाहर फेंकने से शुरू करके धीरे-धीरे 120 तक बढ़ाने को कहते हैं, और स्पष्ट लिखते हैं कि कपालभाति में कुंभक, यानी साँस रोकना, नहीं होता।

वे लिखते हैं कि कपालभाति श्वसन-तंत्र और नासिका-मार्गों को साफ़ करती है, फेफड़ों के लिए भी अच्छा अभ्यास है, और जो कपालभाति में निपुण हो, वह भस्त्रिका आसानी से कर लेता है। वे घेरंड संहिता के शीतक्रम और व्युत्क्रम को भी कपालभाति के ही रूप मानते हैं।

कपालभाति के लाभ: ग्रंथ और आयुष पुस्तिका

ग्रंथ में

हठयोग प्रदीपिका इसे कफ की अधिकता से पैदा सारे विकारों को सुखाने वाली क्रिया कहती है, और घेरंड संहिता तीनों भेदों को कफ के विकार नष्ट करने वाला कहती है।

आयुष की पुस्तिका के अनुसार कपालभाति माथे के वायु-कोटरों (साइनस) को शुद्ध करती है और खाँसी के विकारों से उबरने में मदद करती है; यह ज़ुकाम, राइनाइटिस, साइनसाइटिस, दमा और श्वास-नली के संक्रमण में उपयोगी है; पूरे शरीर में नई ऊर्जा लाती है और चेहरे को चमकदार रखती है; और तंत्रिका-तंत्र को मज़बूत करती है और पाचन अंगों को सक्रिय करती है।

ये लाभ पुस्तिका और ग्रंथों के कथन हैं। किसी रोग में कपालभाति दवा की जगह नहीं ले सकती; रोग हो तो पहले चिकित्सक से पूछिए।

कपालभाति किन्हें नहीं करनी चाहिए?

आयुष की निषेध-सूची

हृदय की समस्या, चक्कर, उच्च रक्तचाप, वर्टिगो, नाक से बार-बार खून आना, मिर्गी, माइग्रेन, स्ट्रोक, हर्निया, पेट के अल्सर, गर्भावस्था और मासिक धर्म के दौरान कपालभाति न कीजिए।

  • हठयोग प्रदीपिका कहती है कि जिनके शरीर में मेद या कफ की अधिकता हो, वे पहले षट्कर्म करें; और जिनमें यह अधिकता नहीं, उन्हें इनकी आवश्यकता नहीं। ग्रंथ इन क्रियाओं को गुप्त रखने को भी कहता है, यानी ये गुरु से सीखी जाने वाली चीज़ें हैं।
  • NCCIH नए अभ्यासियों को ज़ोर की श्वास (forceful breathing) से बचने को कहता है। शुरुआत योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में कीजिए।

आगे पढ़ें

  • भस्त्रिका — धौंकनी जैसी श्वास: हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता का कुंभक
  • शुद्धि क्रियाएँ (षट्कर्म) — हठयोग की छह शुद्धि क्रियाएँ: ग्रंथ क्या कहते हैं, और कौन इन्हें करे
  • प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास
  • नेति — नासिका-मार्ग की शुद्धि: सूत्र नेति, हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता के अनुसार

कपालभाति — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न