ग्रंथ योग को क्यों महत्व देते हैं?
ग्रंथ में
गीता के छठे अध्याय के अंत में योगी को तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्म करने वालों से भी बड़ा कहा गया है, और अर्जुन से कहा गया है: इसलिए तुम योगी बनो।
योगसूत्र के अनुसार योग के अंगों का अभ्यास करने से अशुद्धि घटती जाती है, और ज्ञान का प्रकाश विवेक तक पहुँचता है।
हठयोग प्रदीपिका इसे ऐसे घर जैसा कहती है जो तीनों तापों की धूप से बचाता है।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥योगी तपस्वियों से बड़ा है, ज्ञानियों से भी बड़ा माना गया है, और कर्म करने वालों से भी बड़ा है। इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो।
क्या योग सबके लिए है?
ग्रंथ में
प्रदीपिका का उत्तर बहुत उदार है। युवा हो, वृद्ध हो, अति वृद्ध हो, रोगी हो या दुर्बल, जो आलस छोड़कर अभ्यास करता है, उसे सिद्धि मिलती है। पर यही ग्रंथ यह भी कहता है कि केवल योग की पुस्तकें पढ़ने से सिद्धि नहीं मिलती, अभ्यास ही साधन है।
आज का शोध योग के बारे में क्या कहता है?
आधुनिक शोध
अमेरिका के सरकारी संस्थान NCCIH के अनुसार शोध से संकेत मिलते हैं कि योग तनाव कम करने, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य, नींद और संतुलन में सहायक हो सकता है। गर्दन के दर्द, सिरदर्द और घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस के दर्द में राहत के संकेत भी हैं, और कमर के निचले दर्द में थोड़ा लाभ।
यहाँ शब्द "संकेत" और "सहायक" पर ध्यान दीजिए। शोध योग को चिकित्सा का विकल्प नहीं बताता। आयुष मंत्रालय की पुस्तिका भी साफ़ लिखती है कि उसकी जानकारी चिकित्सक की सलाह का स्थान नहीं लेती।
योग से क्या जोखिम हो सकते हैं?
आधुनिक शोध
NCCIH के अनुसार योग सामान्यतः सुरक्षित है जब योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में सही ढंग से किया जाए। पर चोटें हो सकती हैं, सबसे आम मोच और खिंचाव, और घुटना व निचला पैर सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। गंभीर चोटें दुर्लभ हैं। 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में योग से जुड़ी चोटों की दर ज़्यादा पाई गई है।
ग्रंथों के शब्दों में योग के फल
ग्रंथ में
श्वेताश्वतर उपनिषद् योग के पहले फल गिनाता है: हल्कापन, आरोग्य, स्थिरता, अच्छा रंग, स्वर की मधुरता, अच्छी गंध और मल-मूत्र की कमी। और कहता है कि जैसे धूल से मैला दर्पण साफ़ होकर चमक उठता है, वैसे ही आत्मा का सच्चा स्वरूप देखकर देहधारी संतुष्ट और शोक-रहित हो जाता है।
योगसूत्र के अनुसार योग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि घटती है और ज्ञान का प्रकाश विवेक-ख्याति तक बढ़ता है।
घेरंड संहिता हर साधन का फल अलग बताती है: षट्कर्म से शुद्धि, आसन से दृढ़ता, मुद्रा से स्थिरता, प्रत्याहार से धीरता, प्राणायाम से हल्कापन, ध्यान से आत्मा का प्रत्यक्ष, और समाधि से निर्लिप्तता, जो मुक्ति है।
गीता कहती है कि योगी तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है, और योग से चूके व्यक्ति का भी न इस लोक में नाश होता है, न परलोक में।
हठयोग प्रदीपिका की उपमा: जैसे घर सूर्य की तपन से बचाता है, वैसे ही हठ योग अपने अभ्यासी को तीन तापों से बचाता है। और ग्रंथ कहता है कि युवा, वृद्ध, बहुत वृद्ध, रोगी या दुर्बल, कोई भी आलस छोड़कर अभ्यास करे तो सिद्धि पाता है।
आगे पढ़ें
- योग क्या है? — योग शब्द का अर्थ, उसकी परिभाषाएँ और उसका उद्देश्य
- योग का इतिहास — उपनिषदों से हठ ग्रंथों और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस तक
- योगासन — आसनों की विधि, सावधानियाँ, और पुराने ग्रंथों में उनका स्थान
- प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास
- ध्यान और साधना — ध्यान क्या है, उसका महत्व, और साधना के अलग-अलग रास्ते
