योग शब्द का अर्थ क्या है?
ग्रंथ में
आम तौर पर कहा जाता है कि योग का अर्थ "जुड़ना" है। यह अर्थ प्रचलित है, पर योग दर्शन की परंपरा एक और बात कहती है। योगसूत्र का भाष्य पहले ही सूत्र पर योग की सीधी परिभाषा देता है: योग समाधि है।
टीकाकार वाचस्पति मिश्र इसे और साफ़ करते हैं। उनके अनुसार यहाँ योग शब्द "युज्" धातु से बना है जिसका अर्थ समाधि है (युज् समाधौ), न कि उस "युज्" से जिसका अर्थ जोड़ना है (युजिर् योगे)। इसलिए योग दर्शन में योग का अर्थ मन की एकाग्र और स्थिर अवस्था है।
ग्रंथों में योग की परिभाषाएँ
ग्रंथ में
कठ उपनिषद् में योग की एक बहुत पुरानी परिभाषा मिलती है: जब पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ मन के साथ ठहर जाती हैं और बुद्धि भी नहीं डोलती, वह सबसे ऊँची अवस्था है। इंद्रियों की इसी स्थिर धारणा को योग कहते हैं। उपनिषद् यह चेतावनी भी देता है कि योग आता-जाता है, इसलिए साधक को सावधान रहना चाहिए।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥चित्त की वृत्तियों को रोक लेना ही योग है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥हे धनंजय, योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर कर्म करो। सफलता और असफलता में समान रहो। इसी समता को योग कहते हैं।
मन की पाँच अवस्थाएँ
परंपरा
भाष्य एक बहुत उपयोगी बात कहता है। एकाग्रता तो मन का गुण है जो हर अवस्था में थोड़ी-बहुत रहती है, इसलिए वह मन की पाँच भूमियाँ गिनाता है। इन्हें पढ़कर अपने मन को पहचानना आसान हो जाता है।
| भूमि | अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| क्षिप्त | बेचैन, इधर-उधर फेंका हुआ मन | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य |
| मूढ़ | मोह और जड़ता में डूबा मन | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य |
| विक्षिप्त | कभी टिकने वाला, कभी भटकने वाला मन | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य |
| एकाग्र | एक ही विषय पर टिका मन | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य |
| निरुद्ध | जिसकी वृत्तियाँ रुक गई हों | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य |
योग का असली उद्देश्य क्या है?
ग्रंथ में
योगसूत्र का उत्तर दूसरे और तीसरे सूत्र में ही है। जब वृत्तियाँ रुक जाती हैं, तब द्रष्टा, यानी देखने वाला आत्मा, अपने स्वरूप में ठहर जाता है। स्वस्थ शरीर और शांत मन इस यात्रा में मिलने वाले फल हैं, मंज़िल नहीं।
योगसूत्र का अंतिम सूत्र इस यात्रा के अंत को कैवल्य कहता है: चिति-शक्ति का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना।
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।
ग्रंथों में योग की परिभाषाएँ
ग्रंथ में
योग शब्द की कोई एक परिभाषा नहीं है; हर ग्रंथ उसे अपने ढंग से कहता है। नीचे की तालिका में ग्रंथों की अपनी परिभाषाएँ हैं, उनके स्थान के साथ।
कठ उपनिषद् कहता है कि जब ज्ञान की पाँचों इंद्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं, और बुद्धि भी नहीं डोलती, तो वह परम अवस्था है; इंद्रियों की यह दृढ़ धारणा ही योग कहलाती है। उपनिषद् चेताता भी है कि तब प्रमाद से मुक्त रहना चाहिए, क्योंकि योग आता भी है और जाता भी है।
मैत्रायणी उपनिषद् षडंग योग बताता है: प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, तर्क और समाधि। वह यह भी कहता है कि प्राण, ॐ और इस अनेक रूपों वाले संसार को जोड़ने के कारण इसे योग कहते हैं, और श्वास, मन और इंद्रियों की एकता और फिर सब धारणाओं का त्याग योग है।
| ग्रंथ | परिभाषा | स्रोत |
|---|---|---|
| कठ उपनिषद् | इंद्रियों की दृढ़ धारणा | उपनिषद् (Max Müller अनु.), कठ उपनिषद् 6.11 |
| मैत्रायणी उपनिषद् | श्वास, मन और इंद्रियों की एकता, और सब धारणाओं का त्याग | उपनिषद् (Max Müller अनु.), मैत्रायणी उपनिषद् 6.25 |
| योगसूत्र | चित्त की वृत्तियों का निरोध | पतंजलि योगसूत्र, 1.2 |
| भगवद्गीता | समता योग है; कर्मों में कुशलता योग है; दुख के संयोग से वियोग योग है | भगवद्गीता (Telang अनु.), 2.48, 2.50, 6.23 |
| योगतत्त्व उपनिषद् | योग व्यवहार से अनेक प्रकार का है: मंत्र, लय, हठ और राज | योग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 19 |
| शिव संहिता | चार प्रकार: मंत्र, हठ, लय, और द्वैत मिटाने वाला राज योग | शिव संहिता (Vasu अनु.), 5.9 |
| हठयोग प्रदीपिका | जैसे नमक पानी में घुलकर एक होता है, वैसे आत्मा और मन का एक होना समाधि है | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 4.5 |
| घेरंड संहिता | सात साधनों का क्रम: शुद्धि से समाधि तक, जो मुक्ति है | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.10–11 |
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- पतंजलि योगसूत्र — चार पाद, 195 सूत्र: मूल संस्कृत पाठ और सरल अर्थ
