योग क्या है?

योग शब्द का अर्थ, उसकी परिभाषाएँ और उसका उद्देश्य

संक्षेप में

योग मन को स्थिर करने की विद्या है। पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है, और कठ उपनिषद् इंद्रियों की स्थिर धारणा को योग कहता है। योगसूत्र के भाष्य में सीधे कहा गया है कि योग समाधि है। आसन इस विद्या का एक अंग है, पूरी विद्या नहीं।

एक नज़र में

परिभाषा (योगसूत्र)
चित्त की वृत्तियों का निरोध (1.2)
परिभाषा (भाष्य)
योग समाधि है (1.1 पर भाष्य)
परिभाषा (कठ उपनिषद्)
इंद्रियों की स्थिर धारणा
परिभाषा (गीता)
समता (2.48); कर्मों में कुशलता (2.50)
शब्द की धातु (वाचस्पति)
युज् समाधौ, युजिर् योगे नहीं

योग शब्द का अर्थ क्या है?

ग्रंथ में

आम तौर पर कहा जाता है कि योग का अर्थ "जुड़ना" है। यह अर्थ प्रचलित है, पर योग दर्शन की परंपरा एक और बात कहती है। योगसूत्र का भाष्य पहले ही सूत्र पर योग की सीधी परिभाषा देता है: योग समाधि है।

टीकाकार वाचस्पति मिश्र इसे और साफ़ करते हैं। उनके अनुसार यहाँ योग शब्द "युज्" धातु से बना है जिसका अर्थ समाधि है (युज् समाधौ), न कि उस "युज्" से जिसका अर्थ जोड़ना है (युजिर् योगे)। इसलिए योग दर्शन में योग का अर्थ मन की एकाग्र और स्थिर अवस्था है।

ग्रंथों में योग की परिभाषाएँ

ग्रंथ में

कठ उपनिषद् में योग की एक बहुत पुरानी परिभाषा मिलती है: जब पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ मन के साथ ठहर जाती हैं और बुद्धि भी नहीं डोलती, वह सबसे ऊँची अवस्था है। इंद्रियों की इसी स्थिर धारणा को योग कहते हैं। उपनिषद् यह चेतावनी भी देता है कि योग आता-जाता है, इसलिए साधक को सावधान रहना चाहिए।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥

चित्त की वृत्तियों को रोक लेना ही योग है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.2
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनंजय, योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर कर्म करो। सफलता और असफलता में समान रहो। इसी समता को योग कहते हैं।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 2.48

मन की पाँच अवस्थाएँ

परंपरा

भाष्य एक बहुत उपयोगी बात कहता है। एकाग्रता तो मन का गुण है जो हर अवस्था में थोड़ी-बहुत रहती है, इसलिए वह मन की पाँच भूमियाँ गिनाता है। इन्हें पढ़कर अपने मन को पहचानना आसान हो जाता है।

चित्त की पाँच भूमियाँ (योगसूत्र 1.1 पर भाष्य)
भूमिअर्थस्रोत
क्षिप्तबेचैन, इधर-उधर फेंका हुआ मनयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य
मूढ़मोह और जड़ता में डूबा मनयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य
विक्षिप्तकभी टिकने वाला, कभी भटकने वाला मनयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य
एकाग्रएक ही विषय पर टिका मनयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य
निरुद्धजिसकी वृत्तियाँ रुक गई होंयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 1.1 पर भाष्य

योग का असली उद्देश्य क्या है?

ग्रंथ में

योगसूत्र का उत्तर दूसरे और तीसरे सूत्र में ही है। जब वृत्तियाँ रुक जाती हैं, तब द्रष्टा, यानी देखने वाला आत्मा, अपने स्वरूप में ठहर जाता है। स्वस्थ शरीर और शांत मन इस यात्रा में मिलने वाले फल हैं, मंज़िल नहीं।

योगसूत्र का अंतिम सूत्र इस यात्रा के अंत को कैवल्य कहता है: चिति-शक्ति का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना।

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥

तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.3

ग्रंथों में योग की परिभाषाएँ

ग्रंथ में

योग शब्द की कोई एक परिभाषा नहीं है; हर ग्रंथ उसे अपने ढंग से कहता है। नीचे की तालिका में ग्रंथों की अपनी परिभाषाएँ हैं, उनके स्थान के साथ।

कठ उपनिषद् कहता है कि जब ज्ञान की पाँचों इंद्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं, और बुद्धि भी नहीं डोलती, तो वह परम अवस्था है; इंद्रियों की यह दृढ़ धारणा ही योग कहलाती है। उपनिषद् चेताता भी है कि तब प्रमाद से मुक्त रहना चाहिए, क्योंकि योग आता भी है और जाता भी है।

मैत्रायणी उपनिषद् षडंग योग बताता है: प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, तर्क और समाधि। वह यह भी कहता है कि प्राण, ॐ और इस अनेक रूपों वाले संसार को जोड़ने के कारण इसे योग कहते हैं, और श्वास, मन और इंद्रियों की एकता और फिर सब धारणाओं का त्याग योग है।

योग की परिभाषाएँ: कौन-सा ग्रंथ क्या कहता है
ग्रंथपरिभाषास्रोत
कठ उपनिषद्इंद्रियों की दृढ़ धारणाउपनिषद् (Max Müller अनु.), कठ उपनिषद् 6.11
मैत्रायणी उपनिषद्श्वास, मन और इंद्रियों की एकता, और सब धारणाओं का त्यागउपनिषद् (Max Müller अनु.), मैत्रायणी उपनिषद् 6.25
योगसूत्रचित्त की वृत्तियों का निरोधपतंजलि योगसूत्र, 1.2
भगवद्गीतासमता योग है; कर्मों में कुशलता योग है; दुख के संयोग से वियोग योग हैभगवद्गीता (Telang अनु.), 2.48, 2.50, 6.23
योगतत्त्व उपनिषद्योग व्यवहार से अनेक प्रकार का है: मंत्र, लय, हठ और राजयोग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 19
शिव संहिताचार प्रकार: मंत्र, हठ, लय, और द्वैत मिटाने वाला राज योगशिव संहिता (Vasu अनु.), 5.9
हठयोग प्रदीपिकाजैसे नमक पानी में घुलकर एक होता है, वैसे आत्मा और मन का एक होना समाधि हैहठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 4.5
घेरंड संहितासात साधनों का क्रम: शुद्धि से समाधि तक, जो मुक्ति हैघेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.10–11

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योग क्या है? — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न