योगसूत्र क्या है?
ग्रंथ में
सूत्र का अर्थ है बहुत कम शब्दों में कही गई बात, जिसे याद रखा जा सके और गुरु के मुख से खोला जा सके। योगसूत्र की शुरुआत ही तीन शब्दों से होती है: अब योग का अनुशासन। "अनुशासन" कहने का भाव यह है कि विद्या नई नहीं रची जा रही, पहले से चली आती विद्या को क्रम दिया जा रहा है।
सूत्रों की परंपरा, उनकी कथा और अष्टांग योग की सरल व्याख्या हमारे ऋषि-खंड के लेख में है। यह पृष्ठ ग्रंथ के ढाँचे और उसके मूल पाठ पर केंद्रित है।
योगसूत्र में कितने पाद और सूत्र हैं?
ग्रंथ में
| पाद | सूत्र | मुख्य विषय | स्रोत |
|---|---|---|---|
| समाधि पाद | 51 | योग की परिभाषा, वृत्तियाँ, अभ्यास और वैराग्य | पतंजलि योगसूत्र, 1.1–1.51 |
| साधन पाद | 55 | क्रिया योग, क्लेश, अष्टांग के पहले पाँच अंग | पतंजलि योगसूत्र, 2.1–2.55 |
| विभूति पाद | 55 | धारणा, ध्यान, समाधि और उनसे होने वाली विभूतियाँ | पतंजलि योगसूत्र, 3.1–3.55 |
| कैवल्य पाद | 34 | चित्त, कर्म और कैवल्य | पतंजलि योगसूत्र, 4.1–4.34 |
योगसूत्र के प्रमुख सूत्र और उनके अर्थ
ग्रंथ में
नीचे के सूत्र मूल पाठ से लिए गए हैं, और हर सूत्र दो स्रोतों से मिलाया गया है। अर्थ हमारे अपने सरल शब्दों में है।
अथ योगानुशासनम्॥अब योग का अनुशासन आरंभ होता है।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥चित्त की वृत्तियों को रोक लेना ही योग है।
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥उन वृत्तियों का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है।
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान क्रिया योग हैं।
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, ये पाँच क्लेश हैं।
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि॥यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये योग के आठ अंग हैं।
स्थिरसुखमासनम्॥जो स्थिर भी हो और सुखद भी, वही आसन है।
धारणा, ध्यान और समाधि में क्या अंतर है?
ग्रंथ में
विभूति पाद के पहले तीन सूत्र इन तीनों को एक-एक वाक्य में अलग कर देते हैं। अंतर गहराई का है: पहले मन को एक जगह रखना है, फिर वहाँ मन का टिके रहना है, और अंत में केवल विषय का रह जाना है।
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥चित्त को किसी एक स्थान पर बाँधना धारणा है।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥वहीं ज्ञान का एक-सा प्रवाह बने रहना ध्यान है।
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥जब वही ध्यान केवल विषय के रूप में भासे, और मानो अपने स्वरूप से शून्य हो जाए, तब वह समाधि है।
योगसूत्र की भाष्य-परंपरा
परंपरा
छोटे सूत्र बिना व्याख्या के खुलते नहीं, इसलिए यह ग्रंथ अकेला नहीं पढ़ा जाता। सूत्रों पर व्यास के नाम से प्रसिद्ध भाष्य है, और उस पर वाचस्पति मिश्र की टीका तत्त्ववैशारदी है। James Woods का 1914 का अंग्रेज़ी अनुवाद इन तीनों को साथ देता है।
पतंजलि कौन थे? रचयिता और काल पर मतभेद
विद्वानों में मतभेद
परंपरा में एक मान्यता है कि योगसूत्र, व्याकरण-महाभाष्य और चरक का संशोधन, तीनों एक ही पतंजलि के हैं। Woods के अनुसार इस मान्यता का सबसे पुराना प्रमाण दसवीं सदी से पहले का नहीं मिलता, और दोनों ग्रंथों की तुलना से यह एकता सिद्ध नहीं होती।
काल के बारे में भी कोई एक उत्तर नहीं है। Woods सूत्रों को ईसा की चौथी-पाँचवीं सदी का मानते हैं, पर यह उनका मत है और दूसरे विद्वान अलग मानते हैं। इसलिए हम ग्रंथ की कोई पक्की तिथि नहीं दे रहे।
आगे पढ़ें
- अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
- राज योग — मन की वह अवस्था, जिसे हठयोग अपना लक्ष्य कहता है
- महर्षि पतंजलि — योगसूत्र के रचयिता: परंपरा क्या कहती है, और विद्वान क्या
- चित्त और वृत्ति — मन की पाँच लहरें: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति
- योग के प्राचीन ग्रंथ — योगसूत्र से हठयोग प्रदीपिका तक: कौन-सा ग्रंथ क्या सिखाता है
- योग-सूत्र: मन को थामने की विद्या — ऋषि-परंपरा, वृत्तियाँ, क्लेश और अष्टांग योग की सरल व्याख्या
