योग उपनिषद् कौन-से हैं?
ग्रंथ में
Adyar के 1920 के संस्करण में संकलित उपनिषदों में ये नाम हैं: अद्वयतारक, अमृतनाद, अमृतबिन्दु, क्षुरिका, तेजोबिन्दु, त्रिशिखिब्राह्मण, दर्शन, ध्यानबिन्दु, नादबिन्दु, पाशुपतब्रह्म, ब्रह्मविद्या, महावाक्य, योगकुण्डली, योगचूडामणि, योगतत्त्व, योगशिखा, वराह और शाण्डिल्य। स्कैन की सूची OCR से पढ़ी गई है, इसलिए हम कुल संख्या नहीं दे रहे।
योगतत्त्व उपनिषद् की शिक्षा
ग्रंथ में
योगतत्त्व उपनिषद् में ब्रह्मा भगवान विष्णु से आठ अंगों वाले योग का तत्त्व पूछते हैं। उत्तर में विष्णु पहले ज्ञान का स्वरूप बताते हैं, और फिर कहते हैं कि व्यवहार के कारण योग अनेक प्रकार का कहा जाता है।
उपनिषद् हर योग में चार अवस्थाएँ बताता है: आरंभ, घट, परिचय और निष्पत्ति। प्रदीपिका भी योग की यही चार अवस्थाएँ गिनाती है।
योगो हि बहुधा ब्रह्मन्भिद्यते व्यवहारतः। मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगतः॥हे ब्रह्मा, व्यवहार से योग अनेक प्रकार का कहा जाता है: मंत्र योग, लय योग, हठ योग और राज योग।
योगतत्त्व: ज्ञान और योग, दोनों ज़रूरी
ग्रंथ में
योगतत्त्व उपनिषद् कहता है कि योग के बिना ज्ञान निश्चित रूप से मोक्ष कैसे देगा, और ज्ञान के बिना योग भी मोक्ष के काम में समर्थ नहीं; इसलिए मुमुक्षु ज्ञान और योग, दोनों का दृढ़ अभ्यास करे। संसार अज्ञान से ही है, और ज्ञान से ही मुक्ति होती है।
उपनिषद् ज्ञान को ऐसा बताता है जिससे अपना रूप जाना जाए: कैवल्य, परम पद, निष्कल, निर्मल, साक्षात सच्चिदानंद, और उत्पत्ति, स्थिति, संहार व स्फुरण के ज्ञान से रहित।
योगतत्त्व: चार योग और हठ के बीस अंग
ग्रंथ में
उपनिषद् के अनुसार मंत्र योग में मातृका आदि से युक्त मंत्र का बारह वर्ष जप किया जाता है, जिससे क्रम से अणिमा आदि गुणों वाला ज्ञान मिलता है; उपनिषद् इसे अल्प-बुद्धि वाले, अधम साधक का योग कहता है। लय योग चित्त का लय है, जो करोड़ों प्रकार का बताया गया है: चलते, खड़े, सोते और खाते हुए निष्कल ईश्वर का ध्यान करना ही लय योग है।
हठ योग के अंग उपनिषद् इस तरह गिनाता है: यम, नियम, आसन, प्राण-संयम, प्रत्याहार, धारणा, भौंहों के बीच हरि का ध्यान, और समता की अवस्था समाधि, यह आठ अंगों वाला योग है; और साथ में महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, जालंधर, उड्डियाण और मूल बंध, लंबा प्रणव-जप, सिद्धांत का श्रवण, और तीन तरह की वज्रोली, अमरोली और सहजोली।
उपनिषद् कहता है कि यमों में हल्का भोजन (लघ्वाहार) ही मुख्य है और नियमों में अहिंसा; और आसनों में चार: सिद्ध, पद्म, सिंह और भद्र।
अभ्यास के आरंभ में विघ्न आते हैं: आलस्य, डींग मारना, धूर्तों की संगत, मंत्र आदि की साधना, धातु (रसायन), स्त्री और लोभ आदि। उपनिषद् इन्हें मृगतृष्णा जैसा कहता है, और बुद्धिमान को पुण्य के बल से इन सबको छोड़ने को कहता है।
योगतत्त्व: मठ, मात्रा और नाड़ी-शुद्धि
ग्रंथ में
अभ्यास के लिए उपनिषद् सुंदर मठ बनाने को कहता है: छोटा दरवाज़ा, कोई दरार नहीं, गोबर या चूने से अच्छी तरह लिपा, खटमल, मच्छर और मकड़ियों से रहित, रोज़ झाड़ू से साफ़, सुगंध से महकता और गुग्गुल आदि की धूप से सुवासित। आसन न बहुत ऊँचा, न बहुत नीचा, जिस पर कपड़ा, मृगचर्म और कुश बिछे हों; वहाँ पद्मासन में, सीधे शरीर से बैठकर, हाथ जोड़कर अपने इष्टदेव को प्रणाम करे।
फिर दाहिने हाथ के अँगूठे से पिंगला (दाहिनी नासिका) रोककर इड़ा से धीरे-धीरे वायु भरे, शक्ति के अनुसार बिना ज़ोर के कुंभक करे, और पिंगला से धीरे छोड़े, वेग से नहीं; फिर पिंगला से भरकर, रोककर, इड़ा से छोड़े। जिस नासिका से छोड़े, उसी से भरे।
उपनिषद् मात्रा की परिभाषा भी देता है: घुटने के चारों ओर हाथ घुमाकर, न जल्दी न देर से, चुटकी बजाने में जितना समय लगे, वह एक मात्रा है। इड़ा से सोलह मात्रा में भरे, चौंसठ मात्रा रोके, और पिंगला से बत्तीस मात्रा में छोड़े। सुबह, दोपहर, शाम और आधी रात, चार बार, धीरे-धीरे अस्सी कुंभक तक अभ्यास करे।
ऐसे तीन महीने के अभ्यास से नाड़ी-शुद्धि होती है, और तब शरीर में बाहर से लक्षण दिखते हैं: शरीर का हल्कापन, कांति, जठराग्नि का बढ़ना और शरीर का दुबलापन।
योग में विघ्न डालने वाला भोजन छोड़ने को उपनिषद् कहता है: नमक, सरसों, खट्टा, गरम, रूखा, तीखा, साग, हींग आदि; और आग, स्त्री, यात्रा, सुबह का स्नान, उपवास और शरीर को कष्ट देने वाले काम। अभ्यास के आरंभ में दूध और घी का भोजन श्रेष्ठ है, और गेहूँ, मूँग और शालि चावल योग बढ़ाने वाले हैं।
योगतत्त्व: चार अवस्थाएँ
ग्रंथ में
उपनिषद् के अनुसार सब योगों में चार अवस्थाएँ हैं: आरंभ, घट, परिचय और निष्पत्ति। आरंभ में पहले पसीना आता है, जिसे शरीर पर मलना चाहिए; फिर धीरे-धीरे आसन पर बैठे शरीर में कंपन होता है; और अधिक अभ्यास से अपने आप दार्दुरी होती है, जिसमें पद्मासन में बैठा योगी मेंढक की तरह उछलता हुआ भूमि पर चलता है, और उससे भी अधिक अभ्यास से भूमि छूट जाती है।
तब मूत्र, मल और नींद कम हो जाते हैं, आँख का मैल, लार, पसीना और मुँह की दुर्गंध नहीं रहती, और बल बहुत बढ़ता है। प्रणव का प्लुत मात्रा में जप पहले के पापों के नाश के लिए बताया गया है, क्योंकि प्रणव सब विघ्नों और दोषों को हरने वाला मंत्र है। ऐसे आरंभ की सिद्धि होती है।
घट अवस्था वह है जब प्राण, अपान, मन, बुद्धि, जीवात्मा और परमात्मा बिना विरोध के एक होते हैं। इसमें दिन या शाम को एक याम (लगभग तीन घंटे) अभ्यास, और रोज़ एक बार केवल कुंभक बताया गया है। कुंभक में बैठकर इंद्रियों को विषयों से हटाना प्रत्याहार है: आँख जो-जो देखे, कान जो सुने, नाक जो सूँघे, जीभ जो चखे और त्वचा जो छुए, उस-उस को आत्मा ही समझे।
उपनिषद् कहता है कि इससे दूर सुनना, दूर देखना, क्षण में दूर जाना, वाक-सिद्धि, इच्छा से रूप लेना, अदृश्य होना और आकाश में गति जैसी शक्तियाँ आती हैं; पर ये महासिद्धि के विघ्न हैं, बुद्धिमान इनमें न रमे। योगिराज अपनी शक्ति किसी को न दिखाए, और उसे छिपाने के लिए लोगों के बीच मूढ़, मूर्ख या बहरे की तरह रहे; गुरु के वचन को न भूलकर दिन-रात अभ्यास करे, क्योंकि अभ्यास के बिना केवल बातों से सिद्धि नहीं मिलती।
परिचय अवस्था में यत्न से परिचित हुई वायु अग्नि के साथ कुंडलिनी को जगाकर बिना रुकावट सुषुम्ना में प्रवेश करती है, और वायु के साथ चित्त भी उस महापथ में प्रवेश करता है।
योगतत्त्व: पाँच तत्वों की धारणा
ग्रंथ में
उपनिषद् भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश, पाँच तत्वों पर पाँच तरह की धारणा बताता है। हर एक में वायु को उस तत्व के स्थान पर ले जाकर, उसके बीज के साथ, उसके देवता का पाँच घटिका (लगभग दो घंटे) तक ध्यान किया जाता है। उपनिषद् कहता है कि ऐसी पाँच धारणाएँ करने वाला दृढ़ शरीर वाला होता है, और महाबुद्धि वाला ब्रह्मा के प्रलय में भी नहीं डूबता।
इसके बाद सगुण ध्यान है: वायु को आकाश में रोककर इष्ट देने वाले देवता का साठ घटिका ध्यान, जो अणिमा आदि गुण देता है। निर्गुण ध्यान से समाधि होती है, और उपनिषद् कहता है कि बारह दिन में ही समाधि मिल सकती है, और वायु को रोकने वाला मेधावी जीवन्मुक्त होता है।
| तत्व | स्थान | मंडल, रंग, बीज | देवता | उपनिषद् में बताया फल | स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|
| पृथ्वी | पैर से घुटने तक | चौकोर, पीला, लं | चार मुख, चार भुजा, सुनहरे (ब्रह्मा) | पृथ्वी पर जय, मृत्यु नहीं | योग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 85–87 |
| जल | घुटने से गुदा तक | अर्धचंद्र, श्वेत, वं | नारायण: चार भुजा, किरीट, स्फटिक जैसे, पीतांबर | पापों से मुक्ति, जल से भय नहीं | योग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 88–91 |
| अग्नि | गुदा से हृदय तक | त्रिकोण, लाल, रं | रुद्र: त्रिनेत्र, वरद, उगते सूर्य जैसे, भस्म लगाए | अग्नि में नहीं जलता | योग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 91–94 |
| वायु | हृदय से भौंहों के बीच तक | षट्कोण, काला, यं | सर्वज्ञ, विश्वतोमुख ईश्वर | वायु की तरह आकाश में गति, वायु से भय नहीं | योग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 95–97 |
| आकाश | भौंहों के बीच से मूर्धा तक | गोल, धूम्र, हं | सदाशिव: बिंदु-रूप, पाँच मुख, दस भुजा, त्रिनेत्र, उमा अर्धांग | खेचरत्व, जहाँ भी हो, अत्यंत सुख | योग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 98–102 |
हमने पाठ कैसे जाँचा?
योगतत्त्व उपनिषद् के श्लोक हमने संस्कृत विकिस्रोत के पाठ से लिए हैं और Adyar 1920 के स्कैन से मिलाए हैं। स्कैन की संस्कृत OCR कच्ची है, इसलिए जिन श्लोकों का मिलान साफ़ नहीं हुआ, उन्हें इस कोश में उद्धृत नहीं किया गया।
आगे पढ़ें
- मंत्र योग — जप से योग: योगतत्त्व उपनिषद् और योगसूत्र में
- लय योग — मन का अपने स्रोत में विलीन होना: योगतत्त्व और प्रदीपिका में
- योग के प्रकार — ग्रंथ योग को कैसे बाँटते हैं, और इस कोश के दस मार्ग
- योग के प्राचीन ग्रंथ — योगसूत्र से हठयोग प्रदीपिका तक: कौन-सा ग्रंथ क्या सिखाता है
