योगतत्त्व उपनिषद् में मंत्र योग
ग्रंथ में
योगतत्त्व उपनिषद् मंत्र योग का लक्षण देता है: मातृका (वर्णमाला) सहित मंत्र का जो बारह वर्ष तक जप करता है, उसे क्रम से ज्ञान और अणिमा आदि गुण मिलते हैं।
पर अगली ही पंक्ति में यह उपनिषद् एक कड़ी बात भी कहता है: इस योग का सेवन अल्पबुद्धि, यानी साधकों में अधम साधक करता है। हम यह बात इसलिए दे रहे हैं कि ग्रंथ को उसके पूरे रूप में रखना ज़रूरी है, केवल सुविधाजनक हिस्सा नहीं।
योगसूत्र में जप
ग्रंथ में
योगसूत्र का दृष्टिकोण अलग है। वह ईश्वर-प्रणिधान को समाधि का एक उपाय बताता है, कहता है कि ईश्वर का वाचक प्रणव (ॐ) है, और उसका जप और उसके अर्थ की भावना करने को कहता है।
तस्य वाचकः प्रणवः॥उस (ईश्वर) का वाचक प्रणव (ॐ) है।
तज्जपस्तदर्थभावनम्॥उसका जप, और उसके अर्थ की भावना।
दो ग्रंथ, दो दृष्टियाँ
ग्रंथ में
| ग्रंथ | कथन | स्रोत |
|---|---|---|
| योगतत्त्व उपनिषद् | मंत्र योग चार भेदों में; बारह वर्ष का जप; अल्पबुद्धि साधक का मार्ग | योग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 19–22 |
| पतंजलि योगसूत्र | प्रणव का जप और अर्थ-भावना, ईश्वर-प्रणिधान का अंग | पतंजलि योगसूत्र, 1.23, 1.27–28 |
मंत्र योग किसके लिए?
ग्रंथ में
शिव संहिता के अनुसार मंत्र योग मृदु साधकों के लिए है: कम उद्यम वाले, भुलक्कड़, रोगी, दोष ढूँढने वाले, बुरे चरित्र वाले और दुर्बल। ग्रंथ कहता है कि वे बड़े प्रयत्न से बारह वर्ष में सफल होते हैं, और गुरु उन्हें मंत्र योग के योग्य जाने।
योगतत्त्व उपनिषद् भी मंत्र योग की यही अवधि देता है: मातृका आदि से युक्त मंत्र का बारह वर्ष जप करने वाला क्रम से अणिमा आदि गुणों वाला ज्ञान पाता है। उपनिषद् इसे अल्प-बुद्धि वाले, अधम साधक का योग कहता है, यानी सबसे सरल आरंभ।
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