मंत्र योग

जप से योग: योगतत्त्व उपनिषद् और योगसूत्र में

संक्षेप में

मंत्र योग मंत्र के जप के द्वारा योग की साधना है। योगतत्त्व उपनिषद् इसे योग के चार भेदों में पहला गिनाता है, और योगसूत्र प्रणव यानी ॐ के जप और उसके अर्थ के चिंतन की बात करता है। पर दोनों ग्रंथ इस मार्ग को एक ही दृष्टि से नहीं देखते।

एक नज़र में

मुख्य ग्रंथ
योगतत्त्व उपनिषद् 19–22; पतंजलि योगसूत्र 1.27–28
योगतत्त्व का लक्षण
मातृका सहित मंत्र का बारह वर्ष जप (21)
योगसूत्र में
ईश्वर का वाचक प्रणव; उसका जप और अर्थ-भावना

योगतत्त्व उपनिषद् में मंत्र योग

ग्रंथ में

योगतत्त्व उपनिषद् मंत्र योग का लक्षण देता है: मातृका (वर्णमाला) सहित मंत्र का जो बारह वर्ष तक जप करता है, उसे क्रम से ज्ञान और अणिमा आदि गुण मिलते हैं।

पर अगली ही पंक्ति में यह उपनिषद् एक कड़ी बात भी कहता है: इस योग का सेवन अल्पबुद्धि, यानी साधकों में अधम साधक करता है। हम यह बात इसलिए दे रहे हैं कि ग्रंथ को उसके पूरे रूप में रखना ज़रूरी है, केवल सुविधाजनक हिस्सा नहीं।

योगसूत्र में जप

ग्रंथ में

योगसूत्र का दृष्टिकोण अलग है। वह ईश्वर-प्रणिधान को समाधि का एक उपाय बताता है, कहता है कि ईश्वर का वाचक प्रणव (ॐ) है, और उसका जप और उसके अर्थ की भावना करने को कहता है।

तस्य वाचकः प्रणवः॥

उस (ईश्वर) का वाचक प्रणव (ॐ) है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.27
तज्जपस्तदर्थभावनम्॥

उसका जप, और उसके अर्थ की भावना।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.28

दो ग्रंथ, दो दृष्टियाँ

ग्रंथ में

मंत्र और जप पर ग्रंथ
ग्रंथकथनस्रोत
योगतत्त्व उपनिषद्मंत्र योग चार भेदों में; बारह वर्ष का जप; अल्पबुद्धि साधक का मार्गयोग उपनिषद् (Adyar, 1920), योगतत्त्व उपनिषद् 19–22
पतंजलि योगसूत्रप्रणव का जप और अर्थ-भावना, ईश्वर-प्रणिधान का अंगपतंजलि योगसूत्र, 1.23, 1.27–28

मंत्र योग किसके लिए?

ग्रंथ में

शिव संहिता के अनुसार मंत्र योग मृदु साधकों के लिए है: कम उद्यम वाले, भुलक्कड़, रोगी, दोष ढूँढने वाले, बुरे चरित्र वाले और दुर्बल। ग्रंथ कहता है कि वे बड़े प्रयत्न से बारह वर्ष में सफल होते हैं, और गुरु उन्हें मंत्र योग के योग्य जाने।

योगतत्त्व उपनिषद् भी मंत्र योग की यही अवधि देता है: मातृका आदि से युक्त मंत्र का बारह वर्ष जप करने वाला क्रम से अणिमा आदि गुणों वाला ज्ञान पाता है। उपनिषद् इसे अल्प-बुद्धि वाले, अधम साधक का योग कहता है, यानी सबसे सरल आरंभ।

आगे पढ़ें

  • जप साधना — यज्ञों में जप-यज्ञ: गीता, योगसूत्र और भाष्य के अनुसार
  • मंत्र ध्यान — ॐ पर ध्यान: योगसूत्र और मुण्डक उपनिषद् में
  • भक्ति योग — भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय: प्रेम और समर्पण का मार्ग
  • योग उपनिषद् — योग पर केंद्रित उपनिषदों का संग्रह, और योगतत्त्व उपनिषद् की शिक्षा
  • योग के प्रकार — ग्रंथ योग को कैसे बाँटते हैं, और इस कोश के दस मार्ग
  • मंत्र संग्रह — देवताओं के मंत्र, अर्थ और विधि

मंत्र योग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न