कर्म योग का अर्थ क्या है?
ग्रंथ में
हम में से ज़्यादातर लोग किसी काम को उसके नतीजे के लिए करते हैं, और नतीजा बिगड़ते ही मन भी बिगड़ जाता है। कर्म योग इसी गाँठ को खोलता है। यह कर्म और उसके फल के बीच की पकड़ को ढीला करने का अभ्यास है।
गीता दूसरे अध्याय में अर्जुन से कहती है कि योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर कर्म करो, और सिद्धि और असिद्धि में समान रहो। यही समता योग कहलाती है।
कुछ आगे गीता योग की एक और छोटी परिभाषा देती है: कर्मों में कुशलता ही योग है। इसके संदर्भ में कुशलता का अर्थ केवल काम में चतुराई नहीं है। यह श्लोक उस बुद्धि की बात करता है जो पुण्य और पाप, दोनों के बंधन से ऊपर उठती है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर कभी नहीं। फल को कर्म का कारण मत बनाओ, और न कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥हे धनंजय, योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर कर्म करो। सफलता और असफलता में समान रहो। इसी समता को योग कहते हैं।
कर्म छोड़ना संभव क्यों नहीं है?
ग्रंथ में
अर्जुन का मन युद्ध से हटना चाहता था, और मन का यह भाव हम सब पहचानते हैं: सब छोड़कर कहीं चले जाएँ। गीता का उत्तर सीधा है। कोई भी एक क्षण के लिए भी बिना कर्म के नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुण हर किसी से कर्म करवाते ही हैं।
गीता यहाँ तक कहती है कि कर्म के बिना शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता। इसलिए वह अर्जुन को नियत कर्म करने को कहती है, और कर्म को अकर्म से श्रेष्ठ बताती है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म के नहीं रहता। प्रकृति से उत्पन्न गुण हर किसी से विवश करके कर्म करवाते हैं।
कर्म योग के मुख्य सिद्धांत
ग्रंथ में
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥इसलिए आसक्ति के बिना अपना कर्तव्य निरंतर करते रहो। आसक्ति छोड़कर कर्म करने वाला मनुष्य परम को प्राप्त होता है।
- कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं: नतीजा हमारे अकेले के हाथ में नहीं होता।
- अकर्म भी उपाय नहीं: फल छोड़ने का अर्थ काम छोड़ना नहीं है।
- समता: सफलता और असफलता में मन का एक-सा रहना।
- अनासक्त कर्म: आसक्ति छोड़कर किया गया कर्तव्य मनुष्य को परम तक पहुँचाता है।
- लोक-संग्रह: कर्म केवल अपने लिए नहीं, समाज को साथ लेकर चलने के लिए भी है।
कर्म योग का उदाहरण: राजा जनक
ग्रंथ में
गीता स्वयं एक उदाहरण देती है। जनक जैसे लोगों ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि पाई। एक राजा, जो राज्य भी चलाता है और जिसका मन उसमें बँधता भी नहीं: यही कर्म योग का चित्र है।
कर्म योग और ज्ञान योग में क्या संबंध है?
ग्रंथ में
गीता दो निष्ठाओं की बात करती है: सांख्यों के लिए ज्ञान योग और योगियों के लिए कर्म योग। वह इन्हें एक ही नहीं कहती, पर आपस में विरोधी भी नहीं मानती।
पाँचवें अध्याय में संन्यास और कर्म योग, दोनों को कल्याणकारी बताया गया है, और इनमें कर्म योग को विशेष कहा गया है। यह कथन गृहस्थ के लिए बड़ा भरोसा है: मोक्ष का रास्ता घर छोड़ने से ही नहीं खुलता।
| मार्ग | किसके लिए | गीता का कथन | स्रोत |
|---|---|---|---|
| ज्ञान योग | सांख्य | ज्ञान की निष्ठा | भगवद्गीता (Telang अनु.), 3.3 |
| कर्म योग | योगी | कर्म की निष्ठा; संन्यास से विशेष कहा गया | भगवद्गीता (Telang अनु.), 3.3, 5.2 |
आज के जीवन में कर्म योग कैसे करें?
एक बात पहले
नीचे के सुझाव गीता के शब्द नहीं हैं। ये गीता के श्लोकों से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं, ताकि बात रोज़ के जीवन तक पहुँचे।
- काम शुरू करने से पहले एक क्षण रुककर देखिए कि आपका कर्तव्य क्या है, और कौन-सा हिस्सा आपके हाथ में है।
- अपनी पूरी शक्ति उसी हिस्से पर लगाइए। फल छोड़ने का अर्थ लापरवाही नहीं है; योग को कर्म की कुशलता कहा गया है।
- नतीजा आने पर उसे देखिए, उससे सीखिए, और उसे अपनी पहचान मत बनने दीजिए।
- हार के बाद काम छोड़ने का मन हो तो गीता का यह वचन याद कीजिए कि अकर्म में भी आसक्ति न हो।
आगे पढ़ें
- ज्ञान योग — भगवद्गीता का ज्ञान का मार्ग: श्रद्धा, गुरु और विवेक
- भक्ति योग — भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय: प्रेम और समर्पण का मार्ग
- भगवद्गीता में योग — अठारह अध्याय, हर एक "योग": गीता को योगशास्त्र क्यों कहा गया
- योग के प्रकार — ग्रंथ योग को कैसे बाँटते हैं, और इस कोश के दस मार्ग
- महान भक्त ज्ञानकोश — भक्ति के मार्ग पर चले भक्तों की कथाएँ
