ध्यान योग

भगवद्गीता का छठा अध्याय: मन को एक जगह टिकाने का मार्ग

संक्षेप में

ध्यान योग मन को एकाग्र करके आत्मा में टिकाने का मार्ग है, जिसका वर्णन भगवद्गीता के छठे अध्याय में मिलता है। गीता मानती है कि मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। फिर भी वह कहती है कि अभ्यास और वैराग्य से यह संभव है।

एक नज़र में

मुख्य ग्रंथ
भगवद्गीता, अध्याय 6
मूल साधना
एकांत में बैठकर मन को एकाग्र करना (6.10–12)
मन को वश में करने का उपाय
अभ्यास और वैराग्य (6.35)
उद्देश्य
आत्मशुद्धि (6.12)

गीता में ध्यान योग क्या है?

ग्रंथ में

गीता का छठा अध्याय उस साधक से बात करता है जो बैठकर मन को साधना चाहता है। यहाँ योगी को एकांत में रहकर, मन और शरीर को संयमित करके, आशा और संग्रह से मुक्त होकर अपने को निरंतर योग में लगाने को कहा गया है।

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥

योगी एकांत में, अकेला रहकर, मन और शरीर को संयमित करके, आशा और संग्रह को छोड़कर अपने को निरंतर योग में लगाए।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 6.10
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥

वहाँ आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखकर, आत्मा की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 6.12

चंचल मन को कैसे वश में करें?

ग्रंथ में

अगर ध्यान में बैठते ही मन भागने लगता है, तो आप अकेले नहीं हैं। अर्जुन ने स्वयं यही कहा था कि मन चंचल और हठी है। कृष्ण इस बात को काटते नहीं, मान लेते हैं: निश्चय ही मन चंचल है और इसे रोकना कठिन है। फिर वे उपाय बताते हैं।

गीता का यह उपाय योगसूत्र के सूत्र 1.12 से बहुत मिलता है, जहाँ वृत्तियों का निरोध अभ्यास और वैराग्य से बताया गया है। गीता के अनुवादक तेलंग ने भी अपनी भूमिका में इन दोनों की यह समानता दिखाई है।

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

हे महाबाहो, निश्चय ही मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। पर हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से वह वश में आ जाता है।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 6.35

गीता का ध्यान और योगसूत्र का ध्यान

ग्रंथ में

दो ग्रंथों में ध्यान
ग्रंथध्यान का स्थानस्रोत
भगवद्गीताआत्मशुद्धि के लिए एकांत में मन की एकाग्रता का अभ्यासभगवद्गीता (Telang अनु.), 6.10–12
पतंजलि योगसूत्रआठ अंगों में सातवाँ: धारणा के स्थान पर ज्ञान का एक-सा प्रवाहपतंजलि योगसूत्र, 2.29, 3.2

ध्यान योग की शुरुआत कैसे करें?

एक बात पहले

गीता का वर्णन संन्यास-भाव के साधक का है। नीचे के चरण उसी से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं, गीता की शब्दशः विधि नहीं।

  1. एक शांत जगह और तय समय चुनिए।
  2. सीधे और स्थिर बैठिए।
  3. मन को किसी एक बिंदु पर लाइए, और जब भटके तो बिना खीझे वापस ले आइए।
  4. हर दिन थोड़ा ही सही, पर नियम से बैठिए। गीता का पहला उपाय अभ्यास ही है।

गीता: संन्यास ही योग है

ग्रंथ में

छठे अध्याय की शुरुआत में भगवान कहते हैं कि जो कर्म-फल की परवाह किए बिना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है; अग्नि छोड़ने वाला या कर्म न करने वाला नहीं। जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को योग जानो, क्योंकि संकल्पों को छोड़े बिना कोई योगी नहीं होता।

योग पर चढ़ना चाहने वाले मुनि के लिए कर्म साधन कहा गया है, और योग पर चढ़ चुके के लिए शम (शांति)। जब कोई न इंद्रियों के विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में, और सब संकल्प छोड़ देता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।

गीता का प्रसिद्ध उपदेश: अपने से अपना उद्धार करो, अपने को नीचे न गिराओ, क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु। जिसने अपने से अपने को जीत लिया, उसके लिए वह मित्र है; और जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही शत्रु की तरह बरतता है।

जिसने अपने को जीत लिया और शांत है, उसका आत्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान में एकाग्र रहता है। जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त, अविचल और जितेंद्रिय है, और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना बराबर हैं, वह योगी युक्त कहलाता है; और जो हितैषी, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बंधु, साधु और पापी, सबमें सम-बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।

गीता: योग से चूका व्यक्ति कहाँ जाता है?

ग्रंथ में

अर्जुन पूछते हैं: जो श्रद्धा रखता है पर प्रयत्न में ढीला है, जिसका मन योग से हट गया और जो योग की सिद्धि नहीं पा सका, उसकी क्या गति होती है? क्या वह दोनों ओर से गिरकर, बिखरे बादल की तरह, बिना सहारे नष्ट हो जाता है?

भगवान कहते हैं: न इस लोक में, न परलोक में उसका नाश होता है, क्योंकि भला करने वाला कोई दुर्गति को नहीं जाता। योग से चूका व्यक्ति पुण्य करने वालों के लोकों में बहुत वर्ष रहकर पवित्र और श्रीमान लोगों के घर जन्म लेता है, या ज्ञानी योगियों के कुल में, जो इस संसार में और भी दुर्लभ है।

वहाँ उसे पिछले शरीर की बुद्धि का संयोग मिलता है, और वह फिर सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है; पुराने अभ्यास से वह अनिच्छा से भी खिंचा चला आता है। प्रयत्न से लगा योगी पापों से शुद्ध होकर अनेक जन्मों में सिद्धि पाता है और परम गति को पहुँचता है।

गीता का निष्कर्ष: योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ, और कर्म करने वालों से भी; इसलिए योगी बनो। और सब योगियों में भी जो श्रद्धा से, अंतरात्मा से भगवान में लगकर उन्हें भजता है, वह भगवान को सबसे अधिक युक्त मान्य है।

आगे पढ़ें

ध्यान योग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न