धारणा, ध्यान और समाधि में क्या अंतर है?
ग्रंथ में
एक दीये की लौ को देखना सोचिए। पहले आप बार-बार आँख और मन को लौ पर लाते हैं: यह धारणा है। फिर मन बिना टूटे वहीं बना रहता है: यह ध्यान है। और अंत में केवल लौ रह जाती है, देखने वाले का भान भी नहीं: यह समाधि है। यह उदाहरण हमारा है; परिभाषाएँ सूत्र की हैं।
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥चित्त को किसी एक स्थान पर बाँधना धारणा है।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥वहीं ज्ञान का एक-सा प्रवाह बने रहना ध्यान है।
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥जब वही ध्यान केवल विषय के रूप में भासे, और मानो अपने स्वरूप से शून्य हो जाए, तब वह समाधि है।
संयम क्या है?
ग्रंथ में
तीनों एक ही विषय पर साथ हों तो सूत्र उन्हें संयम कहता है। उसकी जीत से प्रज्ञा का प्रकाश होता है, और उसका उपयोग धीरे-धीरे, एक भूमि से अगली भूमि पर किया जाता है।
त्रयमेकत्र संयमः॥ये तीनों एक ही विषय पर हों, तो संयम कहलाते हैं।
तज्जयात्प्रज्ञालोकः॥उसकी जीत से प्रज्ञा का प्रकाश होता है।
समाधि के दो रूप
ग्रंथ में
समाधि पाद दो प्रकार की समाधि बताता है। जिसमें वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता का साथ हो, वह संप्रज्ञात है। और जो रुकने के प्रत्यय के अभ्यास से आती है और जिसमें केवल संस्कार शेष रहते हैं, वह दूसरी (असंप्रज्ञात) है।
सूत्र यह भी कहता है कि धारणा, ध्यान और समाधि पहले पाँच अंगों की तुलना में अंतरंग हैं, पर निर्बीज समाधि की तुलना में ये भी बहिरंग हैं।
योगसूत्र में समाधि की सीढ़ियाँ
ग्रंथ में
योगसूत्र के अनुसार जब चित्त की वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं, तो चित्त स्वच्छ स्फटिक मणि जैसा हो जाता है, जो पास रखी चीज़ का रंग ले लेता है; ग्रहण करने वाले, ग्रहण और ग्राह्य, किसी पर भी टिककर उसी के रंग में रँग जाना समापत्ति है।
इसकी चार सीढ़ियाँ हैं। सवितर्का में शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्प मिले रहते हैं; स्मृति शुद्ध होने पर, अपने रूप से मानो शून्य होकर केवल विषय का भासना निर्वितर्का है। इसी तरह सूक्ष्म विषयों पर सविचारा और निर्विचारा समापत्ति होती है, और सूक्ष्म विषयों की सीमा अलिंग (मूल प्रकृति) तक है।
ये सब सबीज समाधि हैं। निर्विचार में निपुणता आने पर अध्यात्म-प्रसाद होता है, और वहाँ की प्रज्ञा ऋतंभरा, यानी सत्य को धारण करने वाली होती है। इसका विषय सुने हुए और अनुमान किए ज्ञान से अलग है, क्योंकि यह विशेष को जानती है; और इससे बना संस्कार दूसरे संस्कारों को रोकता है।
अंत में, उस संस्कार के भी रुक जाने पर, सब कुछ रुक जाने से निर्बीज समाधि होती है।
हठयोग प्रदीपिका में समाधि
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका कहती है कि ये सब एक ही अर्थ के शब्द हैं: राजयोग, समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व, लय, तत्त्व, शून्य, अशून्य, परम पद, अमनस्क, अद्वैत, निरालंब, निरंजन, जीवन्मुक्ति, सहज और तुर्या।
प्रदीपिका की उपमा: जैसे पानी में घुला नमक पानी से एक हो जाता है, वैसे ही जब आत्मा और मन एक हो जाते हैं, तो वह समाधि है। जब प्राण क्षीण हो और मन लीन हो जाए, तो उनका यह सम हो जाना समाधि है; और जब सब संकल्प मिट जाएँ, तो जीवात्मा और परमात्मा की यह समता और एकता समाधि है।
प्रदीपिका कहती है कि विषयों से वैराग्य और तत्त्व-ज्ञान, दोनों बहुत कठिन हैं, और सच्चे गुरु की कृपा के बिना समाधि की अवस्था पाना बहुत कठिन है। जिसके प्राण और मन वश में हो गए, उसी को मोक्ष मिलता है; और जिसने श्वास वश में की, उसने मन की क्रियाएँ भी वश में कर लीं।
घेरंड संहिता के छह समाधि
ग्रंथ में
घेरंड संहिता समाधि को बड़ा योग कहती है, जो बड़े सौभाग्य से, गुरु की कृपा और उनमें गहरी भक्ति से मिलता है; और वह योगी इसे जल्दी पाता है जिसे ज्ञान में, अपने गुरु में और अपनी आत्मा में श्रद्धा हो, और जिसका मन दिन-ब-दिन जागता जाए।
ग्रंथ छह समाधि बताता है: ध्यान-योग, नाद-योग, रसानंद और लय समाधि, जो क्रमशः शांभवी, खेचरी, भ्रामरी और योनि मुद्रा से सिद्ध होती हैं; पाँचवीं भक्ति-योग समाधि; और छठी राजयोग समाधि, जो मनो-मूर्छा कुंभक से मिलती है।
ध्यान-योग समाधि के बारे में ग्रंथ कहता है: शांभवी मुद्रा से आत्मा को देखो; एक बार बिंदु में ब्रह्म को देखकर मन को वहीं टिकाओ। आत्मा को आकाश में और आकाश को आत्मा में लाओ; आत्मा को आकाश से भरा देखकर कुछ भी बाधा नहीं रहती, और सदा आनंद से भरा व्यक्ति समाधि में प्रवेश करता है।
आगे पढ़ें
- अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
- प्रत्याहार — इंद्रियों को भीतर समेटना: बाहरी और भीतरी साधना के बीच का पुल
- ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर
- कैवल्य — योग का अंतिम लक्ष्य: द्रष्टा का अपने स्वरूप में ठहरना
