मौन साधना

चुप रहना केवल वाणी का नहीं, मन का तप भी: गीता के अनुसार

संक्षेप में

मौन साधना का अर्थ केवल न बोलना नहीं है। गीता मौन को मन के तप में गिनती है, साथ में मन की प्रसन्नता, सौम्यता, आत्म-संयम और भावों की शुद्धि के। और भगवान कहते हैं कि गोपनीय बातों में मैं मौन हूँ।

गीता में मौन

ग्रंथ में

गीता तप को तीन भागों में बाँटती है: शरीर का, वाणी का और मन का। ध्यान देने वाली बात यह है कि मौन को वह वाणी के नहीं, मन के तप में रखती है। यानी असली मौन भीतर का है।

दसवें अध्याय में भगवान अपनी विभूतियाँ गिनाते हुए कहते हैं कि गोपनीय बातों में मैं मौन हूँ।

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥

मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम और भावों की शुद्धि, इसे मन का तप कहा जाता है।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 17.16

मौन का सरल अभ्यास

एक बात पहले

ये सुझाव गीता के भाव से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं, किसी ग्रंथ की शब्दशः विधि नहीं।

  • दिन में थोड़ा समय तय कीजिए जब आप बोलेंगे नहीं, और फ़ोन या दूसरी आवाज़ों से भी दूर रहेंगे।
  • उस समय मन में चलती बातचीत को देखिए; गीता का मौन मन का तप है, केवल होंठों का नहीं।
  • मौन के बाद पहली बात सोच-समझकर कहिए; भाष्य के अनुसार सत्य वाणी वह है जो सबके हित में हो।

गीता का मौनी भक्त

ग्रंथ में

बारहवें अध्याय में भगवान अपने प्रिय भक्त के लक्षण गिनाते हुए कहते हैं: जो मित्र और शत्रु, मान और अपमान, सर्दी और गर्मी, सुख और दुख में समान है, आसक्ति से मुक्त है, जिसके लिए निंदा और स्तुति बराबर हैं, जो मौनी है, जो कुछ भी मिले उसी में संतुष्ट है, जिसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं, और जिसका मन स्थिर है, वह भक्तिमान मनुष्य मुझे प्रिय है।

गीता का तप-विभाग यह भी बताता है कि वाणी का तप क्या है: ऐसी वाणी जो उद्वेग न करे, सच्ची, प्रिय और हितकारी हो, और स्वाध्याय का अभ्यास। यानी वाणी का संयम और मन का मौन, दोनों साथ चलते हैं।

सनत्सुजातीय में मौन

ग्रंथ में

महाभारत के सनत्सुजातीय में धृतराष्ट्र पूछते हैं: यह मौन किसका है, और दोनों में मौन कौन-सा है? क्या विद्वान मौन से मौन तक पहुँचता है, और लोग इस संसार में मौन का अभ्यास कैसे करते हैं?

सनत्सुजात उत्तर देते हैं कि वेद और मन, दोनों उस (ब्रह्म) तक नहीं पहुँच पाते, इसलिए वही मौन है; वही, जिसके बारे में वेदों के शब्द कहे गए, और जो उनके साथ एकरूप होकर प्रकाशित होता है। Telang की टिप्पणी के अनुसार मौन यहाँ दो अर्थों में है: केवल चुप रहना, और सब इंद्रियों को रोककर आत्मा का चिंतन।

सनत्सुजातीय के दूसरे अध्याय में यह भी कहा गया है कि सम्मान और मौन कभी साथ नहीं रहते: यह संसार सम्मान के लिए है, और परलोक मौन के लिए।

आगे पढ़ें

  • साक्षी भाव — देखने वाला बनकर बैठना: गीता और मुण्डक उपनिषद् में
  • ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर
  • यम — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह: भाष्य के अनुसार
  • प्रत्याहार — इंद्रियों को भीतर समेटना: बाहरी और भीतरी साधना के बीच का पुल

मौन साधना — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न