मंत्र ध्यान

ॐ पर ध्यान: योगसूत्र और मुण्डक उपनिषद् में

संक्षेप में

मंत्र ध्यान में मन को किसी मंत्र पर टिकाया जाता है, और ग्रंथों में सबसे प्रमुख मंत्र ॐ है। योगसूत्र कहता है कि ॐ ईश्वर का वाचक है, और उसका जप उसके अर्थ की भावना के साथ करना चाहिए। मुण्डक उपनिषद् ॐ को धनुष और आत्मा को बाण कहता है।

योगसूत्र में ॐ का ध्यान

ग्रंथ में

योगसूत्र ईश्वर-प्रणिधान को समाधि का एक उपाय बताता है, और फिर कहता है कि ईश्वर का वाचक प्रणव है। उसके बाद की बात ध्यान देने लायक है: केवल जप नहीं, जप के साथ उसके अर्थ की भावना। सूत्र आगे कहता है कि इससे भीतर की चेतना का बोध होता है और विघ्न दूर होते हैं।

तस्य वाचकः प्रणवः॥

उस (ईश्वर) का वाचक प्रणव (ॐ) है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.27
तज्जपस्तदर्थभावनम्॥

उसका जप, और उसके अर्थ की भावना।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.28

मुण्डक उपनिषद् की धनुष वाली उपमा

ग्रंथ में

मुण्डक उपनिषद् मंत्र ध्यान को एक सुंदर चित्र देता है। ॐ धनुष है, आत्मा बाण है, और ब्रह्म लक्ष्य है। उसे वही भेद सकता है जो असावधान न हो; और जैसे बाण लक्ष्य से एक हो जाता है, वैसे ही साधक ब्रह्म से एक हो जाता है।

मंत्र ध्यान का सरल आरंभ

एक बात पहले

ये चरण योगसूत्र 1.28 से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं, किसी ग्रंथ की शब्दशः विधि नहीं।

  1. सुखद आसन में सीधी पीठ से बैठिए और कुछ श्वास शांत होने दीजिए।
  2. मन में धीरे-धीरे ॐ का जप कीजिए।
  3. जप के साथ उसके अर्थ पर मन टिकाइए; सूत्र जप और अर्थ-भावना को साथ रखता है।
  4. मन भटके तो जप पर लौट आइए।

योगसूत्र: ॐ के जप से कौन-से विघ्न हटते हैं?

ग्रंथ में

योगसूत्र कहता है कि प्रणव के जप और उसके अर्थ की भावना से भीतर की चेतना का बोध होता है और विघ्नों का अभाव होता है। फिर वह नौ विघ्न गिनाता है, जो चित्त को बिखेरते हैं: रोग, जड़ता (स्त्यान), संशय, प्रमाद, आलस्य, विषयों से विरक्ति का अभाव (अविरति), भ्रांति-दर्शन, किसी भूमि का न मिलना, और मिली भूमि पर न टिक पाना।

इन विघ्नों के साथ पाँच और बातें आती हैं: दुख, मन की खिन्नता (दौर्मनस्य), शरीर का काँपना, और अनियमित श्वास-प्रश्वास। इन्हें रोकने के लिए सूत्र एक ही तत्व के अभ्यास को कहता है।

घेरंड संहिता: बीज मंत्र के साथ प्राणायाम

ग्रंथ में

घेरंड संहिता सहित कुंभक का एक रूप बताती है जिसमें मंत्र और ध्यान, दोनों साथ हैं: सगर्भ। इसमें पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके सुखासन में बैठकर, बाईं नासिका से "अ" का सोलह बार जप करते हुए साँस भरी जाती है और रक्त-वर्ण, रजोगुणी ब्रह्मा का ध्यान होता है; "उ" का चौंसठ बार जप करते हुए रोकी जाती है और श्याम-वर्ण, सत्त्वगुणी हरि का ध्यान; और "म" का बत्तीस बार जप करते हुए दाहिनी नासिका से छोड़ी जाती है और श्वेत-वर्ण, तमोगुणी शिव का ध्यान। अ, उ और म मिलकर ॐ बनते हैं।

ग्रंथ कहता है कि बीज मंत्र के जप के साथ किया जाने वाला कुंभक सगर्भ है, और बिना जप के निर्गर्भ। श्वास रोकने वाला यह अभ्यास गुरु से ही सीखिए।

आगे पढ़ें

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  • मंत्र योग — जप से योग: योगतत्त्व उपनिषद् और योगसूत्र में
  • ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर
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मंत्र ध्यान — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न