मुण्डक उपनिषद् के दो पक्षी
ग्रंथ में
उपनिषद् का यह चित्र बहुत प्रसिद्ध है। दो पक्षी, जो अलग न होने वाले मित्र हैं, एक ही पेड़ पर बैठे हैं। एक मीठा फल खाता है, दूसरा बिना खाए केवल देखता है।
उपनिषद् आगे कहता है कि उसी पेड़ पर बैठा मनुष्य अपनी असमर्थता से मोहित होकर दुखी होता है। पर जब वह दूसरे, संतुष्ट स्वामी को देखता है और उसकी महिमा जानता है, तो उसका दुख चला जाता है।
गीता में उदासीन की तरह बैठना
ग्रंथ में
गीता गुणों से ऊपर उठे व्यक्ति का वर्णन करती है: वह उदासीन की तरह बैठा है, गुण उसे विचलित नहीं करते। वह जानता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, इसलिए स्थिर रहता है और डोलता नहीं।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥जो उदासीन की तरह बैठा है, गुण जिसे विचलित नहीं करते, जो जानता है कि गुण ही बरत रहे हैं, और स्थिर रहता है, डोलता नहीं।
योगसूत्र का द्रष्टा
ग्रंथ में
योगसूत्र भी यही बात दार्शनिक भाषा में कहता है। वृत्तियाँ शांत होने पर द्रष्टा अपने स्वरूप में ठहरता है; बाकी समय वह वृत्तियों जैसा हो जाता है। साक्षी भाव इसी पहचान को रोज़ के अनुभव में लाने का प्रयास है।
साक्षी भाव का अभ्यास कैसे करें?
एक बात पहले
ये चरण ऊपर के ग्रंथों से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं, किसी ग्रंथ की शब्दशः विधि नहीं।
- शांत बैठकर विचारों को आने दीजिए; उन्हें रोकने का प्रयास मत कीजिए।
- हर विचार को देखिए, जैसे दूसरा पक्षी फल खाते पक्षी को देखता है।
- किसी विचार में बह जाएँ, तो बस इतना जान लीजिए कि बह गए, और फिर देखने वाले बन जाइए।
योगसूत्र: द्रष्टा और दृश्य
ग्रंथ में
योगसूत्र कहता है कि जिस दुख से बचना है, उसका कारण द्रष्टा और दृश्य का संयोग है, यानी देखने वाले का अपने को देखी जाने वाली चीज़ों में खो देना।
सूत्र के अनुसार द्रष्टा केवल देखने की शक्ति है; वह शुद्ध होते हुए भी बुद्धि के प्रत्ययों के अनुसार देखता है।
चौथे पाद में सूत्र कहता है कि चित्त की वृत्तियाँ अपने स्वामी, पुरुष, को सदा ज्ञात रहती हैं, क्योंकि पुरुष बदलता नहीं। साक्षी भाव का आधार यही है: बदलते विचारों को एक न बदलने वाला देखता है।
घेरंड संहिता: मैं दुख का भागी नहीं
ग्रंथ में
घेरंड संहिता समाधि के वर्णन में कहती है कि मन को शरीर से अलग करके परमात्मा से जोड़ना समाधि है, सब अवस्थाओं से मुक्ति।
ग्रंथ साधक की भावना का वर्णन करता है: मैं दुख का भागी नहीं हूँ; मैं सत्, चित् और आनंद हूँ; सदा मुक्त, एक-रूप।
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- ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर
- चित्त और वृत्ति — मन की पाँच लहरें: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति
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- ज्ञान योग — भगवद्गीता का ज्ञान का मार्ग: श्रद्धा, गुरु और विवेक
