ग्रंथों में श्वास और मन
ग्रंथ में
मन और साँस का संबंध हम रोज़ अनुभव करते हैं: घबराहट में साँस तेज़ हो जाती है। योगसूत्र मन की प्रसन्नता और स्थिरता के उपायों में प्राण के बाहर छोड़ने और रोकने को भी गिनाता है।
गीता ध्यान करने वाले मुनि के वर्णन में बाहर के विषयों को बाहर रखने, दृष्टि को भौंहों के बीच रखने, और नासिका में चलने वाले प्राण और अपान को सम करने की बात करती है।
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥या प्राण के बाहर छोड़ने और रोकने से (मन स्थिर होता है)।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥बाहर के विषयों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को भौंहों के बीच रखकर, और नासिका में चलने वाले प्राण और अपान को सम करके।
श्वास ध्यान कैसे करें?
एक बात पहले
ये चरण आयुष प्रोटोकॉल की ध्यान-विधि और ऊपर के ग्रंथों से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं।
- सुखद आसन में सीधी पीठ से बैठिए, आँखें बंद कीजिए।
- साँस नाक से लीजिए और उसे बदले बिना केवल उसके आने-जाने के प्रति सजग रहिए।
- मन किसी विचार में चला जाए, तो उसे फिर साँस पर ले आइए।
साँस रोकने के बारे में
योगसूत्र प्राण को रोकने की बात करता है, पर आयुष का प्रोटोकॉल कहता है कि जब तक विशेष रूप से न कहा जाए, साँस नहीं रोकनी चाहिए। श्वास रोकने वाले अभ्यास योग्य गुरु से ही सीखिए।
अजपा जप: हर साँस में सोऽहं
ग्रंथ में
घेरंड संहिता श्वास ध्यान का एक बहुत पुराना रूप बताती है। हर व्यक्ति की साँस भीतर जाते समय "सः" और बाहर आते समय "हं" की ध्वनि करती है; ये दोनों मिलकर "सोऽहं" (मैं वह हूँ) या "हंस" बनते हैं।
ग्रंथ के अनुसार दिन-रात में 21,600 साँसें होती हैं, यानी लगभग 15 साँसें प्रति मिनट, और हर जीव यह जप अनजाने, पर लगातार करता है। इसे अजपा गायत्री कहते हैं, और यह मूलाधार, अनाहत और आज्ञा, तीन स्थानों पर होता है।
घेरंड संहिता कहती है कि सब जीव यह अजपा मंत्र अनजाने, तय संख्या में दोहराते हैं, पर योगी इसे जानकर, गिनकर करे।
योगसूत्र में श्वास की तीन वृत्तियाँ
ग्रंथ में
योगसूत्र श्वास की तीन वृत्तियाँ बताता है: बाहर की ओर (रेचक), भीतर की ओर (पूरक), और थमी हुई (स्तंभ)। ये देश, काल और संख्या से देखी जाती हैं, और लंबी और सूक्ष्म होती जाती हैं। एक चौथी वृत्ति भी है, जो बाहर और भीतर, दोनों विषयों से परे चली जाती है।
सूत्र के अनुसार इससे प्रकाश पर पड़ा आवरण क्षीण होता है, और मन धारणाओं के योग्य बनता है। यानी श्वास पर ध्यान, ध्यान की आगे की सीढ़ियों की तैयारी भी है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् भी ध्यान के प्रसंग में श्वासों को संयत करके नाक से धीमी साँस छोड़ने की बात करता है।
आगे पढ़ें
- ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर
- अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन) — बारी-बारी नासिका से श्वास: आयुष प्रोटोकॉल और हठयोग प्रदीपिका
- भ्रामरी प्राणायाम — भौंरे की गुंजन जैसी ध्वनि के साथ श्वास छोड़ने का अभ्यास
- प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास
