जप का महत्व
ग्रंथ में
जप शायद सबसे सरल साधना है: न विशेष स्थान चाहिए, न सामग्री। गीता अपनी विभूतियाँ गिनाते हुए कहती है कि यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ, और वाणी में एक अक्षर ॐ।
योगसूत्र का भाष्य स्वाध्याय की परिभाषा में मोक्ष के शास्त्रों के अध्ययन के साथ प्रणव के जप को भी रखता है। और सूत्र के अनुसार स्वाध्याय से इष्ट देवता से संयोग होता है।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में एक अक्षर (ॐ), यज्ञों में जप-यज्ञ, और अचल वस्तुओं में हिमालय।
जप कैसे करें?
एक बात पहले
ये सुझाव योगसूत्र 1.28 और भाष्य से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं। किसी विशेष मंत्र की दीक्षा और विधि अपनी परंपरा के गुरु से लीजिए।
- एक मंत्र या नाम चुनिए और उसे बदलते मत रहिए।
- जप के साथ उसके अर्थ पर मन टिकाइए; योगसूत्र जप और अर्थ-भावना को साथ रखता है।
- रोज़ नियम से कीजिए; अभ्यास निरंतरता से दृढ़ होता है।
योगसूत्र: जप, स्वाध्याय और क्रियायोग
ग्रंथ में
योगसूत्र क्रियायोग में तीन बातें रखता है: तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान। भाष्य स्वाध्याय में प्रणव के जप को रखता है, यानी जप योग की शुरुआती, रोज़ की साधना का हिस्सा है।
सूत्र के अनुसार स्वाध्याय से इष्ट देवता से संयोग होता है, और ईश्वर-प्रणिधान से समाधि की सिद्धि।
प्रणव के जप और अर्थ-भावना का फल सूत्र यह बताता है: भीतर की चेतना का बोध, और रोग, संशय, आलस्य जैसे नौ विघ्नों का अभाव।
घेरंड संहिता: श्वास के साथ जप
ग्रंथ में
घेरंड संहिता के सगर्भ प्राणायाम में जप श्वास के साथ चलता है: "अ" का सोलह बार जप करते हुए भरना, "उ" का चौंसठ बार जप करते हुए रोकना, और "म" का बत्तीस बार जप करते हुए छोड़ना, साथ में ब्रह्मा, हरि और शिव का ध्यान। यह कुंभक वाला अभ्यास गुरु से सीखा जाता है।
ग्रंथ का अजपा जप भी जप का ही एक रूप है: हर साँस में "सोऽहं" की ध्वनि, जिसे हर जीव अनजाने करता है और योगी जानकर, गिनकर करता है।
आगे पढ़ें
- मंत्र ध्यान — ॐ पर ध्यान: योगसूत्र और मुण्डक उपनिषद् में
- मंत्र योग — जप से योग: योगतत्त्व उपनिषद् और योगसूत्र में
- भक्ति योग — भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय: प्रेम और समर्पण का मार्ग
- नियम — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान: भाष्य के अनुसार
- मंत्र संग्रह — देवताओं के मंत्र, अर्थ और विधि
