ध्यान क्या है?
ग्रंथ में
ध्यान शब्द इतना सुना जा चुका है कि उसका अर्थ धुँधला हो गया है। योगसूत्र उसे एक वाक्य में साफ़ कर देता है: धारणा में मन जिस जगह बाँधा गया, वहीं ज्ञान का एक-सा प्रवाह बने रहना ध्यान है।
गीता ध्यान को आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाने वाला योग कहती है, जिसमें आसन पर बैठकर मन को एकाग्र किया जाता है।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥वहीं ज्ञान का एक-सा प्रवाह बने रहना ध्यान है।
ध्यान किस पर करें?
ग्रंथ में
यह जानकर बहुत लोगों को राहत मिलती है कि योगसूत्र ध्यान के विषय को लेकर कठोर नहीं है। मन को स्थिर करने के कई उपाय गिनाने के बाद वह कहता है: या जो भी तुम्हें प्रिय हो, उसके ध्यान से।
यथाभिमतध्यानाद्वा॥या जो अपने को प्रिय हो, उसके ध्यान से (मन स्थिर होता है)।
ध्यान के प्रकार
ग्रंथ में
| रास्ता | आधार | स्रोत |
|---|---|---|
| मंत्र ध्यान | प्रणव का जप और उसके अर्थ की भावना | पतंजलि योगसूत्र, 1.27–1.28 |
| श्वास ध्यान | प्राण के छोड़ने और रोकने से मन की स्थिरता | पतंजलि योगसूत्र, 1.34 |
| साक्षी भाव | गुणों से विचलित न होकर उदासीन की तरह बैठना | भगवद्गीता (Telang अनु.), 14.23 |
| मौन | मानसिक तप का अंग | भगवद्गीता (Telang अनु.), 17.16 |
| जप | यज्ञों में जप-यज्ञ | भगवद्गीता (Telang अनु.), 10.25 |
घेरंड संहिता के तीन ध्यान
ग्रंथ में
घेरंड संहिता ध्यान के तीन प्रकार बताती है: स्थूल, ज्योति और सूक्ष्म। जब किसी विशेष रूप, जैसे अपने गुरु या इष्टदेव का ध्यान हो, तो वह स्थूल ध्यान है; जब ब्रह्म या प्रकृति का ज्योति-पुंज के रूप में ध्यान हो, तो ज्योति ध्यान; और जब ब्रह्म का बिंदु के रूप में और कुंडलिनी शक्ति का ध्यान हो, तो सूक्ष्म ध्यान।
स्थूल ध्यान में आँखें बंद करके कल्पना की जाती है: अमृत के समुद्र में रत्नों का एक द्वीप, जिसकी रेत हीरे और माणिक का चूर्ण है; चारों ओर फूलों से लदे कदंब के पेड़, और उनके आगे मालती, मल्लिका, जाती, केसर, चंपक, पारिजात और कमल जैसे फूलों की पंक्ति, जिनकी सुगंध हर दिशा में फैली है। बाग के बीच चार वेद रूपी चार डालियों वाला सुंदर कल्पवृक्ष है, फूलों और फलों से भरा, जिस पर भौंरे गुंजार रहे हैं और कोयलें गा रही हैं। उसके नीचे रत्नों का चबूतरा, उस पर रत्नजड़ित सिंहासन, और उस पर गुरु के बताए अपने इष्टदेव, उनके रूप, आभूषण और वाहन के साथ। ऐसे रूप का निरंतर चिंतन स्थूल ध्यान है।
स्थूल ध्यान का दूसरा रूप: सहस्रार के बीच बारह पंखुड़ियों वाला एक छोटा, श्वेत, बहुत तेजस्वी कमल है, जिसकी पंखुड़ियों पर बारह बीज-अक्षर हैं; उसके बीच अ-क-थ रेखाओं का त्रिकोण, और उसके मध्य नाद और बिंदु के साथ प्रणव। वहाँ दो हंस और एक जोड़ी खड़ाऊँ हैं, और वहाँ श्वेत वस्त्र, श्वेत चंदन और श्वेत फूलों की माला पहने, दो भुजाओं और दो नेत्रों वाले गुरुदेव का ध्यान किया जाता है, जिनके बाईं ओर रक्त-वर्ण शक्ति हैं।
ज्योति ध्यान, जिससे ग्रंथ के अनुसार योगी सिद्धि पाता है और अपनी आत्मा को देखता है: मूलाधार में सर्प के आकार की कुंडलिनी है, और वहीं जीवात्मा दीपक की लौ की तरह है; इस लौ का तेजस्वी ब्रह्म के रूप में ध्यान तेजो-ध्यान या ज्योति-ध्यान है। दूसरा तरीका: दोनों भौंहों के बीच, मन के ऊपर, ॐ-रूप एक ज्योति है; उस लौ का ध्यान।
सूक्ष्म ध्यान: बड़े सौभाग्य से जब कुंडलिनी जागती है, तो वह आत्मा से मिलकर दोनों आँखों के द्वार से निकलती है और राजमार्ग पर विचरती है; अत्यंत सूक्ष्म और चंचल होने से वह दिखती नहीं। योगी शांभवी मुद्रा से, यानी बिना पलक झपकाए आकाश में स्थिर दृष्टि रखकर, यह सिद्धि पाता है। ग्रंथ इसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ, बड़ा रहस्य कहता है।
घेरंड संहिता कहती है कि ज्योति ध्यान रूप के ध्यान से सौ गुना श्रेष्ठ है, और सूक्ष्म ध्यान ज्योति ध्यान से लाख गुना। यह ध्यान-योग बहुत मूल्यवान ज्ञान है, क्योंकि इससे आत्मा का प्रत्यक्ष होता है।
योगसूत्र में ध्यान का स्थान
ग्रंथ में
योगसूत्र में ध्यान आठ अंगों में सातवाँ है: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
सूत्र कहता है कि क्लेशों की स्थूल वृत्तियाँ ध्यान से हटाई जाती हैं। यानी ध्यान केवल शांति का अभ्यास नहीं, अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश जैसे क्लेशों की वृत्तियों को कमज़ोर करने का साधन है।
मन को स्थिर करने के जो उपाय सूत्र गिनाता है, उनमें एक है शोक-रहित, ज्योतिर्मय वृत्ति; और एक है राग से मुक्त हुए मन वाले किसी व्यक्ति पर ध्यान। अंत में सूत्र छूट देता है: जो अपने को प्रिय हो, उसके ध्यान से भी मन स्थिर होता है।
ध्यान में क्या सावधानी रखें?
ध्यान चिकित्सा का विकल्प नहीं
ध्यान को किसी रोग के इलाज की जगह, या चिकित्सक से मिलने में देर का कारण मत बनाइए।
- ध्यान में जोखिम आम तौर पर कम माने जाते हैं, पर इसकी सुरक्षा पर कम ही अध्ययन हुए हैं, इसलिए पक्का कुछ नहीं कहा जा सकता।
- 2020 की एक समीक्षा में 83 में से 55 अध्ययनों ने ध्यान से जुड़े नकारात्मक अनुभव दर्ज किए; सबसे आम चिंता और अवसाद थे। अभ्यास में बेचैनी बढ़े तो रुकिए और किसी अनुभवी से बात कीजिए।
- जिनसे सीख रहे हैं, उनके प्रशिक्षण और अनुभव के बारे में पूछिए।
शुरुआत
ध्यान के रास्ते
आगे पढ़ें
- ध्यान योग — भगवद्गीता का छठा अध्याय: मन को एक जगह टिकाने का मार्ग
- अभ्यास और वैराग्य — मन को थामने की दो चाबियाँ: योगसूत्र और गीता दोनों में
- प्रत्याहार — इंद्रियों को भीतर समेटना: बाहरी और भीतरी साधना के बीच का पुल
