प्रत्याहार

इंद्रियों को भीतर समेटना: बाहरी और भीतरी साधना के बीच का पुल

संक्षेप में

प्रत्याहार अष्टांग योग का पाँचवाँ अंग है। योगसूत्र के अनुसार इसमें इंद्रियाँ अपने विषयों से हटकर मानो चित्त के स्वरूप का अनुसरण करती हैं, और इससे इंद्रियों पर पूरा वश होता है। गीता इसे कछुए की उपमा से समझाती है, जो अपने अंग भीतर समेट लेता है।

एक नज़र में

अंग
अष्टांग का पाँचवाँ
परिभाषा
योगसूत्र 2.54
फल
इंद्रियों पर परम वश (2.55)
गीता की उपमा
कछुआ (2.58)

प्रत्याहार क्या है?

ग्रंथ में

आज हमारी इंद्रियाँ लगभग हर समय बाहर की ओर खिंची रहती हैं: फ़ोन, आवाज़ें, चित्र। प्रत्याहार इस खिंचाव को उलटने का अभ्यास है। सूत्र के अनुसार जब इंद्रियाँ अपने विषयों से जुड़ना छोड़ती हैं, तब वे मानो चित्त के स्वरूप का अनुसरण करती हैं; यही प्रत्याहार है। इससे इंद्रियों पर परम वश प्राप्त होता है।

आठ अंगों में प्रत्याहार का स्थान ख़ास है। यह बाहरी पाँच अंगों में अंतिम है, और इसके तुरंत बाद धारणा, यानी भीतरी साधना शुरू होती है।

ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्॥

उससे इंद्रियों पर परम वश प्राप्त होता है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.55

गीता में कछुए की उपमा

ग्रंथ में

गीता स्थितप्रज्ञ का वर्णन करते हुए कहती है कि जैसे कछुआ अपने अंग सब ओर से भीतर समेट लेता है, वैसे ही जो इंद्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जब यह साधक इंद्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 2.58

प्रत्याहार की शुरुआत कैसे करें?

एक बात पहले

नीचे के सुझाव सूत्र और गीता के भाव से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं, किसी ग्रंथ की शब्दशः विधि नहीं।

  1. दिन में थोड़े समय के लिए उन चीज़ों से दूर रहिए जो इंद्रियों को सबसे ज़्यादा खींचती हैं।
  2. बैठकर ध्यान दीजिए कि इंद्रियाँ किस ओर भागती हैं, और उन्हें धीरे से लौटा लाइए।
  3. यह अभ्यास धारणा की तैयारी है; इसके बाद मन को एक जगह टिकाने का अभ्यास आसान होता है।

भाष्य की मधुमक्खियों वाली उपमा

ग्रंथ में

सूत्र 2.54 के भाष्य में व्यास प्रत्याहार को एक सुंदर उपमा से समझाते हैं: जब इंद्रियाँ अपने विषयों से नहीं जुड़तीं, तो वे चित्त की नकल करती हुई मानो रुक जाती हैं; चित्त रुकता है तो वे भी रुक जाती हैं, और इंद्रिय-जय की तरह उन्हें किसी और सहारे की ज़रूरत नहीं होती।

जैसे रानी मधुमक्खी (Woods के अनुवाद में "राजा मधुमक्खी") उड़ती है तो सारी मधुमक्खियाँ उसके पीछे उड़ती हैं, और वह बैठती है तो वे भी बैठ जाती हैं, वैसे ही चित्त रुकता है तो इंद्रियाँ भी रुक जाती हैं। यही प्रत्याहार है।

आगे पढ़ें

  • धारणा, ध्यान और समाधि — योगसूत्र के तीन अंतरंग अंग, और उनका अंतर
  • अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
  • यम — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह: भाष्य के अनुसार
  • ध्यान योग — भगवद्गीता का छठा अध्याय: मन को एक जगह टिकाने का मार्ग

प्रत्याहार — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न