पाँच क्लेश कौन-से हैं?
ग्रंथ में
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, ये पाँच क्लेश हैं।
| क्लेश | सूत्र के अनुसार अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| अविद्या | अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुख को सुख और अनात्म को आत्मा मानना | पतंजलि योगसूत्र, 2.5 |
| अस्मिता | देखने वाली शक्ति और देखने के साधन को एक मान लेना | पतंजलि योगसूत्र, 2.6 |
| राग | सुख के पीछे चलने वाली इच्छा | पतंजलि योगसूत्र, 2.7 |
| द्वेष | दुख के पीछे चलने वाला विरोध | पतंजलि योगसूत्र, 2.8 |
| अभिनिवेश | जीने की स्वाभाविक चाह, जो विद्वान में भी रहती है | पतंजलि योगसूत्र, 2.9 |
अविद्या सबकी जड़ क्यों है?
ग्रंथ में
सूत्र कहता है कि अविद्या बाकी क्लेशों का खेत है। क्लेश चार अवस्थाओं में रहते हैं: सोए हुए (प्रसुप्त), कमज़ोर (तनु), बीच-बीच में दबे (विच्छिन्न), और पूरी तरह जागे (उदार)। एक छोटा उदाहरण: क्रोध, जो अभी नहीं है, वह मिटा नहीं, शायद सोया है।
अभिनिवेश का सूत्र विशेष रूप से विनम्र बनाता है। जीने की यह चाह अपने रस से बहती है और विद्वान में भी वैसी ही जमी रहती है। यानी केवल पढ़ लेने से क्लेश नहीं जाते।
क्लेशों को कैसे कमज़ोर करें?
ग्रंथ में
साधन पाद क्रिया योग से शुरू होता है: तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान। सूत्र के अनुसार इसका उद्देश्य समाधि की भावना और क्लेशों को कमज़ोर करना है।
सूत्र दो स्तर बताता है। क्लेशों की वृत्तियाँ, यानी उनके जागे हुए रूप, ध्यान से हटाई जाती हैं। और उनके सूक्ष्म रूप चित्त के अपने कारण में लौटने (प्रतिप्रसव) से समाप्त होते हैं।
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः॥उन (क्लेशों) की वृत्तियाँ ध्यान से त्यागी जाती हैं।
क्लेशों की चार अवस्थाएँ
ग्रंथ में
सूत्र कहता है कि अविद्या बाकी चार क्लेशों का खेत है, और वे चार अवस्थाओं में रहते हैं: प्रसुप्त (सोए हुए), तनु (पतले पड़े हुए), विच्छिन्न (बीच-बीच में दबे हुए) और उदार (पूरी तरह सक्रिय)।
सूत्र के अनुसार अविद्या है अनित्य को नित्य, अशुचि को शुचि, दुख को सुख और अनात्म को आत्मा समझना; अस्मिता है देखने की शक्ति और देखने के साधन (बुद्धि) को एक मान लेना; राग सुख के पीछे चलने वाला भाव है और द्वेष दुख के पीछे; और अभिनिवेश वह है जो अपने ही रस से बहता है और विद्वान में भी वैसा ही जमा रहता है, यानी जीवन से चिपके रहने का भाव।
सूक्ष्म हो चुके क्लेश प्रतिप्रसव से, यानी चित्त के अपने मूल में लौटकर लीन होने से, हटते हैं; और उनकी स्थूल वृत्तियाँ ध्यान से।
विवेकी के लिए सब दुख क्यों है, इसके चार कारण सूत्र देता है: परिणाम, ताप और संस्कार के दुख, और गुणों की वृत्तियों का विरोध। और जो दुख अभी आया नहीं, वही हटाने योग्य है।
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