अभ्यास और वैराग्य

मन को थामने की दो चाबियाँ: योगसूत्र और गीता दोनों में

संक्षेप में

अभ्यास और वैराग्य मन को स्थिर करने के दो उपाय हैं, जिन्हें योगसूत्र और भगवद्गीता दोनों बताते हैं। अभ्यास यानी मन को स्थिरता में रखने का बार-बार का प्रयत्न, और वैराग्य यानी देखे-सुने विषयों की प्यास से मुक्ति। सूत्र के अनुसार अभ्यास लंबे समय, बिना रुके और आदर से करने पर दृढ़ होता है।

एक नज़र में

मूल सूत्र
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः (1.12)
अभ्यास
स्थिति के लिए यत्न (1.13)
दृढ़ता की शर्त
दीर्घ काल, निरंतरता, सत्कार (1.14)
वैराग्य के स्तर
वशीकार (1.15) और पर-वैराग्य (1.16)
गीता में
6.35

अभ्यास क्या है?

ग्रंथ में

सूत्र अभ्यास की परिभाषा बहुत सीधी देता है: मन की स्थिरता के लिए किया गया यत्न। और फिर एक ऐसी बात कहता है जो हर साधना, हर कला पर लागू होती है: अभ्यास तभी दृढ़ भूमि बनता है जब वह लंबे समय तक, बिना अंतराल के और पूरे आदर से किया जाए।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥

उन (वृत्तियों) का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.12
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥

वह (अभ्यास) लंबे समय तक, निरंतर और आदर के साथ किए जाने पर दृढ़ भूमि वाला होता है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 1.14

वैराग्य क्या है?

ग्रंथ में

वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं है। सूत्र के अनुसार देखे हुए और सुने हुए विषयों की प्यास से मुक्त व्यक्ति की "वशीकार" नाम की अवस्था वैराग्य है, यानी मन अपने वश में हो।

इससे आगे एक ऊँचा वैराग्य है। पुरुष के ज्ञान से गुणों की भी प्यास न रहे, उसे पर-वैराग्य कहा गया है।

गीता में अभ्यास और वैराग्य

ग्रंथ में

गीता में अर्जुन कहते हैं कि मन बहुत चंचल है। कृष्ण इसे मानते हैं, और यही दो उपाय बताते हैं। गीता के अनुवादक तेलंग ने भी गीता और योगसूत्र की इस समानता की ओर ध्यान दिलाया है।

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

हे महाबाहो, निश्चय ही मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। पर हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से वह वश में आ जाता है।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 6.35

चित्त की नदी: भाष्य की उपमा

ग्रंथ में

सूत्र 1.12 के भाष्य में व्यास की प्रसिद्ध उपमा है: चित्त नाम की नदी दोनों दिशाओं में बहती है, अच्छाई की ओर भी और बुराई की ओर भी। जब वह विवेक की ढलान पर कैवल्य की ओर बहती है, तो कल्याण की ओर बहती है; और जब अविवेक की ढलान पर संसार के भँवर की ओर बहती है, तो पाप की ओर।

भाष्य कहता है कि विषयों की ओर बहने वाली धारा को वैराग्य से बाँधा जाता है, और विवेक की ओर बहने वाली धारा के फाटक विवेक-ज्ञान के अभ्यास से खोले जाते हैं। इसीलिए चित्त का निरोध दोनों उपायों, अभ्यास और वैराग्य, पर निर्भर है।

दो तरह का वैराग्य

ग्रंथ में

सूत्र के अनुसार देखे हुए (इस लोक के) और सुने हुए (शास्त्रों में बताए स्वर्ग आदि के) विषयों से तृष्णा-रहित हुए व्यक्ति की वशीकार नाम की अवस्था वैराग्य है।

इससे ऊँचा, पर-वैराग्य वह है जो पुरुष की ख्याति (आत्म-ज्ञान) से आता है, और जिसमें गुणों के प्रति भी तृष्णा नहीं रहती।

किसे जल्दी सिद्धि मिलती है?

ग्रंथ में

सूत्र बताता है कि विदेह और प्रकृतिलय अवस्था वालों की समाधि जन्म से ही (भव-प्रत्यय) होती है; बाकी सबकी समाधि श्रद्धा, वीर्य (उत्साह), स्मृति, समाधि और प्रज्ञा के क्रम से आती है।

जिनका संवेग, यानी लगन, तीव्र है, उनके लिए समाधि निकट है; और लगन के मृदु, मध्य और अधिमात्र होने से उनमें भी अंतर होता है।

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अभ्यास और वैराग्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न