अभ्यास क्या है?
ग्रंथ में
सूत्र अभ्यास की परिभाषा बहुत सीधी देता है: मन की स्थिरता के लिए किया गया यत्न। और फिर एक ऐसी बात कहता है जो हर साधना, हर कला पर लागू होती है: अभ्यास तभी दृढ़ भूमि बनता है जब वह लंबे समय तक, बिना अंतराल के और पूरे आदर से किया जाए।
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥उन (वृत्तियों) का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है।
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥वह (अभ्यास) लंबे समय तक, निरंतर और आदर के साथ किए जाने पर दृढ़ भूमि वाला होता है।
वैराग्य क्या है?
ग्रंथ में
वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं है। सूत्र के अनुसार देखे हुए और सुने हुए विषयों की प्यास से मुक्त व्यक्ति की "वशीकार" नाम की अवस्था वैराग्य है, यानी मन अपने वश में हो।
इससे आगे एक ऊँचा वैराग्य है। पुरुष के ज्ञान से गुणों की भी प्यास न रहे, उसे पर-वैराग्य कहा गया है।
गीता में अभ्यास और वैराग्य
ग्रंथ में
गीता में अर्जुन कहते हैं कि मन बहुत चंचल है। कृष्ण इसे मानते हैं, और यही दो उपाय बताते हैं। गीता के अनुवादक तेलंग ने भी गीता और योगसूत्र की इस समानता की ओर ध्यान दिलाया है।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥हे महाबाहो, निश्चय ही मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। पर हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से वह वश में आ जाता है।
चित्त की नदी: भाष्य की उपमा
ग्रंथ में
सूत्र 1.12 के भाष्य में व्यास की प्रसिद्ध उपमा है: चित्त नाम की नदी दोनों दिशाओं में बहती है, अच्छाई की ओर भी और बुराई की ओर भी। जब वह विवेक की ढलान पर कैवल्य की ओर बहती है, तो कल्याण की ओर बहती है; और जब अविवेक की ढलान पर संसार के भँवर की ओर बहती है, तो पाप की ओर।
भाष्य कहता है कि विषयों की ओर बहने वाली धारा को वैराग्य से बाँधा जाता है, और विवेक की ओर बहने वाली धारा के फाटक विवेक-ज्ञान के अभ्यास से खोले जाते हैं। इसीलिए चित्त का निरोध दोनों उपायों, अभ्यास और वैराग्य, पर निर्भर है।
दो तरह का वैराग्य
ग्रंथ में
सूत्र के अनुसार देखे हुए (इस लोक के) और सुने हुए (शास्त्रों में बताए स्वर्ग आदि के) विषयों से तृष्णा-रहित हुए व्यक्ति की वशीकार नाम की अवस्था वैराग्य है।
इससे ऊँचा, पर-वैराग्य वह है जो पुरुष की ख्याति (आत्म-ज्ञान) से आता है, और जिसमें गुणों के प्रति भी तृष्णा नहीं रहती।
किसे जल्दी सिद्धि मिलती है?
ग्रंथ में
सूत्र बताता है कि विदेह और प्रकृतिलय अवस्था वालों की समाधि जन्म से ही (भव-प्रत्यय) होती है; बाकी सबकी समाधि श्रद्धा, वीर्य (उत्साह), स्मृति, समाधि और प्रज्ञा के क्रम से आती है।
जिनका संवेग, यानी लगन, तीव्र है, उनके लिए समाधि निकट है; और लगन के मृदु, मध्य और अधिमात्र होने से उनमें भी अंतर होता है।
आगे पढ़ें
- चित्त और वृत्ति — मन की पाँच लहरें: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति
- ध्यान योग — भगवद्गीता का छठा अध्याय: मन को एक जगह टिकाने का मार्ग
- योग दर्शन — पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य
- ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर
- योग-सूत्र: मन को थामने की विद्या — सूत्रों की ऋषि-परंपरा और सरल व्याख्या
