प्राणायाम क्या है?
ग्रंथ में
योगसूत्र प्राणायाम को आठ अंगों में चौथा रखता है, और उसे आसन के सधने के बाद की चीज़ बताता है। इसका फल यह बताया गया है कि प्रकाश पर पड़ा आवरण क्षीण होता है, और मन धारणा के योग्य बनता है।
तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥उस (आसन) के सधने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद प्राणायाम है।
ग्रंथों के आठ कुंभक
ग्रंथ में
प्रदीपिका कुंभक के साथ बंधों का भी विधान करती है: पूरक के अंत में जालंधर बंध, और कुंभक के अंत में उड्डीयान बंध। ये अभ्यास गुरु से सीखे जाते हैं।
| ग्रंथ | आठ कुंभक | स्रोत |
|---|---|---|
| हठयोग प्रदीपिका | सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा, प्लाविनी | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 2.44 |
| घेरंड संहिता | सहित, सूर्यभेद, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा, केवली | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 5.46 |
हठयोग प्रदीपिका में प्राणायाम के नियम
ग्रंथ में
प्रदीपिका के अनुसार कुंभक धीरे-धीरे दिन-रात में चार बार किए जाएँ, सुबह, दोपहर, शाम और आधी रात, जब तक एक बार में 80 और पूरे दिन में 320 कुंभक न हो जाएँ।
अभ्यास की तीन अवस्थाएँ बताई गई हैं: शुरुआत में पसीना आता है, बीच में कंपन होता है, और तीसरी अवस्था में स्थिरता आती है। परिश्रम से निकला पसीना पोंछना नहीं, शरीर पर मलना चाहिए, इससे शरीर मज़बूत होता है।
अभ्यास की शुरुआत में दूध और घी वाला भोजन हितकारी बताया गया है; अभ्यास सध जाने पर ऐसा कोई नियम ज़रूरी नहीं।
ग्रंथ की चेतावनी: जैसे शेर, हाथी और बाघ धीरे-धीरे वश में होते हैं, वैसे ही प्राण भी धीरे-धीरे; जल्दबाज़ी से यह अभ्यासी को ही हानि पहुँचाता है। ठीक से किया प्राणायाम सब रोग मिटाता है, और गलत अभ्यास हिचकी, दमा, खाँसी, और सिर, कान व आँख के दर्द जैसे रोग पैदा करता है। इसलिए साँस कुशलता से छोड़ी जाए, कुशलता से भरी जाए, और ठीक से रोकी जाए।
प्रदीपिका कहती है कि जब तक साँस शरीर में रुकी है, मन शांत है और दृष्टि भौंहों के बीच टिकी है, तब तक मृत्यु का भय नहीं; और प्राण के ठीक नियंत्रण से नाड़ियाँ शुद्ध होकर वायु सुषुम्ना में आसानी से प्रवेश करती है, जिससे मन स्थिर होता है। इसी मनोन्मनी अवस्था के लिए अलग-अलग कुंभक किए जाते हैं।
सहित और केवल कुंभक
ग्रंथ में
प्रदीपिका के अनुसार पूरक (भरना), रेचक (छोड़ना) और कुंभक (रोकना) के हिसाब से प्राणायाम तीन तरह का है, पर पूरक-रेचक के साथ या उनके बिना, इस हिसाब से दो ही तरह का: सहित और केवल। केवल कुंभक की सिद्धि तक सहित का अभ्यास किया जाए; केवल कुंभक में बिना पूरक और रेचक के, सहजता से वायु रोकी जाती है।
ग्रंथ कहता है कि जो केवल कुंभक से इच्छानुसार वायु रोक सके, उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं; वह निःसंदेह राजयोग की अवस्था पाता है। कुंभक से कुंडलिनी जागती है और सुषुम्ना अशुद्धियों से मुक्त होती है। हठयोग के बिना राजयोग में सफलता नहीं, और राजयोग के बिना हठयोग में नहीं; और कुंभक पूरा होने पर मन को विश्राम देना चाहिए।
घेरंड संहिता सहित कुंभक के दो भेद बताती है: सगर्भ, जो बीज मंत्र के जप के साथ किया जाता है, और निर्गर्भ, जो बिना जप के। सगर्भ में पूर्व या उत्तर मुख सुखासन में बैठकर, बाईं नासिका से "अ" का सोलह बार जप करते हुए भरा जाता है, "उ" का चौंसठ बार जप करते हुए रोका जाता है, और "म" का बत्तीस बार जप करते हुए दाहिनी से छोड़ा जाता है; साथ में क्रमशः लाल वर्ण के ब्रह्मा, काले वर्ण के हरि और श्वेत वर्ण के शिव का ध्यान होता है।
घेरंड संहिता कहती है कि कुंभक के समय दाहिनी नासिका अँगूठे से और बाईं अनामिका व छोटी उँगली से बंद की जाए, तर्जनी और मध्यमा कभी नहीं।
निर्गर्भ में पूरक, कुंभक और रेचक की अवधि एक से सौ मात्रा तक हो सकती है। ग्रंथ तीन श्रेणियाँ बताता है: उत्तम 20 मात्रा (पूरक 20, कुंभक 80, रेचक 40), मध्यम 16 (16, 64, 32), और अधम 12 (12, 48, 24)। अधम के अभ्यास से पसीना आता है, मध्यम से मेरुदंड में कंपन, और उत्तम से शरीर भूमि छोड़ देता है।
घेरंड संहिता प्राणायाम का फल बताती है: इससे खेचरी शक्ति मिलती है, रोग मिटते हैं, शक्ति जागती है, मन शांत होता है और मन की शक्तियाँ बढ़ती हैं; मन आनंद से भर जाता है, और प्राणायाम का अभ्यासी सचमुच सुखी होता है।
मूर्छा, प्लाविनी और केवली
ग्रंथ में
मूर्छा: प्रदीपिका के अनुसार पूरक के अंत में जालंधर बंध से मार्ग दृढ़ता से बंद करके साँस धीरे छोड़ी जाती है; मन को मूर्छित-सा करने और सुख देने के कारण इसे मूर्छा कहते हैं। घेरंड संहिता के अनुसार सुख से कुंभक करके मन को सब विषयों से हटाकर भौंहों के बीच टिकाया जाता है; मन और आत्मा के इस मिलन से योग का आनंद निश्चित मिलता है।
प्लाविनी: प्रदीपिका के अनुसार जब पेट और शरीर का भीतर पूरी तरह वायु से भर जाता है, तो शरीर गहरे पानी पर कमल के पत्ते की तरह तैरता है।
केवली: घेरंड संहिता के अनुसार हर साँस भीतर जाते "सः" और बाहर आते "हं" की ध्वनि करती है, जिससे "सोऽहं" या "हंस" बनता है। दिन-रात में 21,600 साँसें होती हैं, और हर जीव यह जप अनजाने करता है; इसे अजपा गायत्री कहते हैं। यह जप मूलाधार, अनाहत और आज्ञा में होता है।
ग्रंथ कहता है कि सामान्य साँस बाहर बारह अंगुल जाती है, गाने में सोलह, खाने में बीस, चलने में चौबीस, सोने में तीस, संभोग में छत्तीस, और व्यायाम में उससे भी अधिक; बाहर जाती साँस की लंबाई घटाने से आयु बढ़ती है और बढ़ाने से घटती है। जब तक साँस शरीर में है, मृत्यु नहीं; और जब पूरी वायु शरीर में ही रोकी जाए, तो वह केवल कुंभक है।
घेरंड संहिता केवली को दिन में आठ बार, हर तीन घंटे पर, या पाँच बार, या तीन बार (सुबह, दोपहर, शाम) करने की बात करती है, और कहती है कि प्राणायाम और केवली को जानने वाला ही सच्चा योगी है; केवली कुंभक में सिद्ध व्यक्ति इस संसार में क्या नहीं कर सकता।
हठयोग में सफलता के लक्षण
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार जब शरीर दुबला हो, मुख प्रसन्नता से चमके, अनाहत नाद प्रकट हो, आँखें साफ़ हों, शरीर स्वस्थ हो, बिंदु वश में हो और भूख बढ़े, तब जानना चाहिए कि नाड़ियाँ शुद्ध हो गई हैं और हठयोग में सफलता निकट है।
कपालभाति कहाँ है?
कपालभाति अक्सर प्राणायाम के साथ गिना जाता है, पर हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता दोनों उसे षट्कर्म, यानी शुद्धि क्रिया में रखते हैं। इसलिए इस कोश में उसका पृष्ठ शुद्धि क्रियाओं में है।
प्राणायाम का सुरक्षित अभ्यास
श्वास रोकना गुरु से ही सीखें
आयुष की पुस्तिका कहती है कि जब तक विशेष रूप से न कहा जाए, साँस नहीं रोकनी चाहिए, और साँस हमेशा नाक से ली जाए।
NCCIH नए अभ्यासियों को ज़ोर की श्वास (forceful breathing) से बचने को कहता है।
- पुराना रोग, हृदय की समस्या या गर्भावस्था हो तो पहले चिकित्सक या योग विशेषज्ञ से पूछिए।
- खाली या हल्के पेट, शांत जगह में अभ्यास कीजिए।
आयुष प्रोटोकॉल के प्राणायाम
हठयोग प्रदीपिका के कुंभक
आगे पढ़ें
- अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
- शुद्धि क्रियाएँ (षट्कर्म) — हठयोग की छह शुद्धि क्रियाएँ: ग्रंथ क्या कहते हैं, और कौन इन्हें करे
- श्वास ध्यान — साँस के सहारे मन को टिकाना: योगसूत्र, गीता और आज का अभ्यास
