सीत्कारी क्या है?
सीत्कारी नाम "सी" की ध्वनि से जुड़ा है, जो मुँह से साँस खींचते समय होती है; Sivananda भी लिखते हैं कि साँस भरते समय ध्वनि सुनाई देती है। यह प्रदीपिका के आठ कुंभकों में है, पर घेरंड संहिता की सूची में नहीं।
हठयोग प्रदीपिका में सीत्कारी
ग्रंथ में
प्रदीपिका के अनुसार जीभ को होंठों के बीच रखकर मुँह से साँस भरी जाती है, और भरी हुई साँस मुँह से नहीं छोड़ी जाती।
स्वामी शिवानंद की "हठ योग" में सीत्कारी
परंपरा
Sivananda के वर्णन में जीभ मोड़कर उसकी नोक ऊपर के तालु से लगाई जाती है, मुँह थोड़ा खोलकर धीरे साँस खींची जाती है, और फिर नासिकाओं से छोड़ी जाती है। वे लिखते हैं कि जीभ में दर्द हो तो उसे होंठों के बीच रखकर साँस ली जा सकती है, और यह दिन में बैठे या चलते हुए भी, दस बार तक किया जा सकता है।
ग्रंथों में सीत्कारी के फल
ग्रंथ में
प्रदीपिका कहती है कि इस अभ्यास से साधक सौंदर्य में कामदेव के समान हो जाता है।
योगिनियाँ उसे पूजनीय मानती हैं, वह सृष्टि के चक्र का नाश करने वाला बनता है, और उसे भूख, प्यास, नींद और आलस नहीं सताते।
उसके शरीर का सत्त्व सब विकारों से मुक्त होता है, और ग्रंथ कहता है कि वह सचमुच इस संसार में योगियों का स्वामी बन जाता है।
सीत्कारी में क्या सावधानी रखें?
यह अभ्यास गुरु से ही सीखिए
हठयोग प्रदीपिका स्वयं चेताती है: जैसे शेर, हाथी और बाघ धीरे-धीरे वश में किए जाते हैं, वैसे ही प्राण भी धीरे-धीरे; जल्दबाज़ी या ज़ोर से यह अभ्यासी को ही हानि पहुँचाता है। ठीक से किया प्राणायाम रोगों को मिटाता है, और गलत अभ्यास हिचकी, दमा, खाँसी, और सिर, कान व आँख के दर्द जैसे रोग पैदा करता है।
आयुष की पुस्तिका कहती है कि विशेष निर्देश के बिना साँस न रोकें, और NCCIH नए अभ्यासियों को ज़ोर की श्वास से बचने को कहता है। हृदय की समस्या, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था या कोई पुराना रोग हो, तो पहले चिकित्सक से पूछिए।
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