उज्जायी

गले से ध्वनि वाली श्वास: हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता का कुंभक

संक्षेप में

उज्जायी हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता, दोनों के आठ कुंभकों में है। इसमें गले को बंद-सा करके साँस ऐसे भरी जाती है कि वह गले से छाती तक छूती हुई, ध्वनि करती हुई जाए; फिर उसे रोककर बाईं नासिका से छोड़ा जाता है। प्रदीपिका इसे चलते-बैठते भी करने योग्य कहती है।

एक नज़र में

पहचान
गले से ध्वनि वाली श्वास
छोड़ना
बाईं नासिका से (प्रदीपिका 2.52)
विशेष
चलते-बैठते भी (प्रदीपिका 2.53)
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका 2.51–53; घेरंड संहिता 5.69–72

उज्जायी क्या है?

उज्जायी प्रदीपिका और घेरंड संहिता, दोनों की आठ कुंभकों वाली सूची में है। इसकी पहचान गले से निकलने वाली ध्वनि वाली श्वास है।

हठयोग प्रदीपिका में उज्जायी

ग्रंथ में

प्रदीपिका के अनुसार नाड़ी (गले, यानी स्वरयंत्र) का मुख बंद करके साँस ऐसे भरी जाए कि वह गले से छाती तक छूती हुई, ध्वनि करती हुई जाए।

फिर उसे पहले की तरह रोका जाए (कुंभक), और इड़ा, यानी बाईं नासिका से छोड़ा जाए। ग्रंथ कहता है कि उज्जायी जीवन की हर अवस्था में, चलते या बैठते हुए भी किया जाना चाहिए।

घेरंड संहिता में उज्जायी

ग्रंथ में

घेरंड संहिता इसे अलग ढंग से बताती है: मुँह बंद करके दोनों नासिकाओं से बाहर की हवा खींची जाती है, और फेफड़ों और गले की भीतरी हवा ऊपर खींचकर मुँह में रोकी जाती है; फिर मुँह से हवा निकालकर जालंधर बंध लगाया जाता है, और पूरी शक्ति से कुंभक किया जाता है।

स्वामी शिवानंद की "हठ योग" में उज्जायी

परंपरा

Sivananda के वर्णन में पद्मासन या सिद्धासन में, मुँह बंद रखकर, दोनों नासिकाओं से धीरे, एक-सी हल्की ध्वनि के साथ साँस भरी जाती है, जालंधर बंध लगाकर जितना सहज हो उतना रोकी जाती है, और फिर बाईं नासिका से बहुत धीरे छोड़ी जाती है। वे लिखते हैं कि इसे खड़े होकर भी किया जा सकता है, और सुबह-शाम चार-चार बार किया जा सकता है।

ग्रंथों में उज्जायी के फल

ग्रंथ में

प्रदीपिका कहती है कि उज्जायी गले के कफ को हटाता है और भूख बढ़ाता है; यह नाड़ियों के दोष, जलोदर और धातुओं के विकार नष्ट करता है।

घेरंड संहिता के अनुसार उज्जायी कुंभक से सारे काम सिद्ध होते हैं; उसके अभ्यासी पर कफ के रोग, नाड़ियों के रोग, अपच, पेचिश, क्षय, खाँसी, ज्वर या तिल्ली के रोग कभी आक्रमण नहीं करते। ग्रंथ कहता है कि बुढ़ापे और मृत्यु को नष्ट करने के लिए उज्जायी करना चाहिए।

उज्जायी में क्या सावधानी रखें?

यह अभ्यास गुरु से ही सीखिए

हठयोग प्रदीपिका स्वयं चेताती है: जैसे शेर, हाथी और बाघ धीरे-धीरे वश में किए जाते हैं, वैसे ही प्राण भी धीरे-धीरे; जल्दबाज़ी या ज़ोर से यह अभ्यासी को ही हानि पहुँचाता है। ठीक से किया प्राणायाम रोगों को मिटाता है, और गलत अभ्यास हिचकी, दमा, खाँसी, और सिर, कान व आँख के दर्द जैसे रोग पैदा करता है।

आयुष की पुस्तिका कहती है कि विशेष निर्देश के बिना साँस न रोकें, और NCCIH नए अभ्यासियों को ज़ोर की श्वास से बचने को कहता है। हृदय की समस्या, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था या कोई पुराना रोग हो, तो पहले चिकित्सक से पूछिए।

आगे पढ़ें

  • भस्त्रिका — धौंकनी जैसी श्वास: हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता का कुंभक
  • सूर्यभेदन — दाहिनी नासिका से श्वास भरना: हठयोग प्रदीपिका का पहला कुंभक
  • भ्रामरी प्राणायाम — भौंरे की गुंजन जैसी ध्वनि के साथ श्वास छोड़ने का अभ्यास
  • प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास

उज्जायी — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न