शीतली का अर्थ
शीतल का अर्थ ठंडा है, और आयुष की पुस्तिका के अनुसार इसका अर्थ शांत और वासना-रहित भी है। गर्मी के दिनों में यह अभ्यास इसी नाम का अनुभव कराता है।
शीतली प्राणायाम कैसे करें?
आधुनिक अभ्यास
विधि आयुष के Common Yoga Protocol के अनुसार है। पद्मासन या किसी भी सुखद आसन में बैठिए, हाथ घुटनों पर ज्ञान मुद्रा या अंजलि मुद्रा में।
- जीभ को दोनों ओर से मोड़कर नली जैसा बनाइए।
- इस नली से साँस लेकर फेफड़ों को भरिए।
- जीभ भीतर लेकर मुँह बंद कीजिए।
- दोनों नासिकाओं से धीरे साँस छोड़िए। यह एक चक्र हुआ; ऐसे 4 चक्र और कीजिए।
ग्रंथों में शीतली
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका में शीतली आठ कुंभकों में है। सीत्कारी की तरह, पर जीभ होंठों से थोड़ी बाहर निकालकर साँस ली जाती है, उसे पहले की तरह रोका जाता है (कुंभक), और फिर नासिकाओं से धीरे छोड़ा जाता है।
घेरंड संहिता के अनुसार होंठ सिकोड़कर और जीभ बाहर निकालकर मुँह से हवा खींची जाती है, पेट धीरे-धीरे भरा जाता है, थोड़ी देर रोका जाता है, और फिर दोनों नासिकाओं से छोड़ा जाता है। ग्रंथ इसे आनंद देने वाला कहता है और योगी को इसे सदा करने को कहता है।
ग्रंथों के शीतली में कुंभक है; आयुष का प्रोटोकॉल इसे बिना कुंभक के सिखाता है। Swami Sivananda भी लिखते हैं कि यह बैठे, खड़े या चलते हुए भी किया जा सकता है।
शीतली के लाभ: आयुष पुस्तिका और ग्रंथ
आयुष की पुस्तिका के अनुसार शीतली शरीर और मन को ठंडक देती है और मन को शांत करती है।
हठयोग प्रदीपिका कहती है कि यह शीतली कुंभक शूल, तिल्ली के बढ़ने, ज्वर, पित्त के विकार, भूख और प्यास को मिटाता है, और विष के प्रभाव को काटता है।
घेरंड संहिता के अनुसार इसके नियमित अभ्यास से योगी अपच, कफ और पित्त के विकारों से मुक्त रहता है।
ये पुस्तिका और ग्रंथों के कथन हैं; किसी रोग में शीतली दवा की जगह नहीं ले सकती।
शीतली में क्या सावधानी रखें?
किन्हें यह नहीं करना चाहिए
तेज़ सर्दी, खाँसी या टॉन्सिल की समस्या हो तो यह प्राणायाम न कीजिए।
- साँस मत रोकिए; प्रोटोकॉल का शीतली बिना कुंभक का है।
- हृदय की समस्या, पुराना रोग या गर्भावस्था हो तो पहले चिकित्सक या योग विशेषज्ञ से पूछिए।
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