भस्त्रिका

धौंकनी जैसी श्वास: हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता का कुंभक

संक्षेप में

भस्त्रिका हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता, दोनों के आठ कुंभकों में है। इसमें लोहार की धौंकनी की तरह वेग से साँस भरी और छोड़ी जाती है, फिर कुंभक किया जाता है। प्रदीपिका कहती है कि यह कुंडलिनी को शीघ्र जगाता है और ब्रह्म, विष्णु और रुद्र, तीनों ग्रंथियों को भेदता है।

एक नज़र में

नाम
भस्त्रा यानी धौंकनी
आसन
पद्मासन (प्रदीपिका 2.59–60)
घेरंड
20 बार धौंकनी, फिर कुंभक; तीन बार (5.75–77)
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका 2.59–67; घेरंड संहिता 5.75–77

भस्त्रिका क्या है?

भस्त्रा का अर्थ धौंकनी है। प्रदीपिका स्वयं कहती है कि साँस बार-बार भरी और छोड़ी जाए, जैसे लोहार की धौंकनी चलती है।

हठयोग प्रदीपिका में भस्त्रिका

ग्रंथ में

प्रदीपिका पहले पद्मासन का वर्णन करती है, दोनों पैरों को दोनों जाँघों पर रखना, और उसे सब पापों का नाश करने वाला कहती है। फिर पद्मासन बाँधकर, शरीर सीधा और मुँह ध्यान से बंद रखकर, नाक से साँस बाहर छोड़ी जाती है।

फिर साँस वेग से, ध्वनि करते हुए, गले, छाती और सिर को छूती हुई, हृदय-कमल तक भरी जाती है; फिर छोड़ी जाती है और फिर भरी जाती है, बार-बार, जैसे लोहार की धौंकनी चलती है।

इसी तरह शरीर की वायु को समझदारी से चलाया जाता है, और थकान होने पर दाहिनी नासिका से भरा जाता है: बाईं नासिका को अँगूठे से दबाकर बंद करके दाहिनी से भरा जाता है, और पूरा भर जाने पर अनामिका से बंद करके रोका जाता है। अच्छी तरह रोककर फिर बाईं नासिका से छोड़ा जाता है।

घेरंड संहिता में भस्त्रिका

ग्रंथ में

घेरंड संहिता के अनुसार जैसे लोहार की धौंकनी लगातार फैलती और सिकुड़ती है, वैसे ही दोनों नासिकाओं से धीरे साँस भरकर पेट फुलाया जाता है और फिर तेज़ी से, धौंकनी जैसी ध्वनि के साथ बाहर फेंका जाता है। ऐसे बीस बार जल्दी-जल्दी करके कुंभक किया जाता है, फिर पहले की तरह छोड़ा जाता है। ग्रंथ इसे तीन बार करने को कहता है।

स्वामी शिवानंद की "हठ योग" में भस्त्रिका

परंपरा

Sivananda लिखते हैं कि भस्त्रिका की पहचान लगातार, ज़ोर से साँस बाहर फेंकना है। उनके वर्णन में पद्मासन या सिद्धासन में, शरीर, गर्दन और सिर सीधे, हथेलियाँ घुटनों पर, मुँह बंद रखकर बीस बार धौंकनी जैसी श्वास के बाद गहरी साँस भरकर रोकी जाती है और फिर बहुत धीरे छोड़ी जाती है; बीस बार का एक चक्र होता है।

शुरुआत के लिए वे एक चक्र में केवल 10 बार से शुरू करके धीरे-धीरे 20 तक बढ़ाने को कहते हैं, और हर चक्र के बाद दो मिनट विश्राम को। वे इसे बहुत शक्तिशाली अभ्यास कहते हैं, चेताते हैं कि ज़रा भी चक्कर आए तो अभ्यास रोककर कुछ सामान्य साँसें लें, और कहते हैं कि अपनी शक्ति से आगे कभी न जाएँ। अभ्यास के समय मन में ॐ का जप करने को भी वे कहते हैं।

ग्रंथों में भस्त्रिका के फल

ग्रंथ में

प्रदीपिका कहती है कि भस्त्रिका वात, पित्त और कफ को नष्ट करती है और जठराग्नि बढ़ाती है।

यह कुंडलिनी को शीघ्र जगाती है, नाड़ी-तंत्र को शुद्ध करती है, सुख देती है और हितकारी है; यह कफ को और ब्रह्म नाड़ी के मुख पर जमा अशुद्धियों को नष्ट करती है।

प्रदीपिका इसे भरपूर करने को कहती है, क्योंकि यह शरीर की तीन ग्रंथियों को भेदती है: छाती में ब्रह्म ग्रंथि, कंठ में विष्णु ग्रंथि, और भौंहों के बीच रुद्र ग्रंथि।

घेरंड संहिता कहती है कि जो बुद्धिमान इसे तीन बार करता है, वह कभी रोगी नहीं होता और सदा स्वस्थ रहता है।

भस्त्रिका में क्या सावधानी रखें?

यह अभ्यास गुरु से ही सीखिए

हठयोग प्रदीपिका स्वयं चेताती है: जैसे शेर, हाथी और बाघ धीरे-धीरे वश में किए जाते हैं, वैसे ही प्राण भी धीरे-धीरे; जल्दबाज़ी या ज़ोर से यह अभ्यासी को ही हानि पहुँचाता है। ठीक से किया प्राणायाम रोगों को मिटाता है, और गलत अभ्यास हिचकी, दमा, खाँसी, और सिर, कान व आँख के दर्द जैसे रोग पैदा करता है।

आयुष की पुस्तिका कहती है कि विशेष निर्देश के बिना साँस न रोकें, और NCCIH नए अभ्यासियों को ज़ोर की श्वास से बचने को कहता है। हृदय की समस्या, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था या कोई पुराना रोग हो, तो पहले चिकित्सक से पूछिए।

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भस्त्रिका — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न