अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन क्या हैं?
बहुत लोग पूछते हैं कि अनुलोम-विलोम और नाड़ी शोधन में क्या अंतर है। आयुष मंत्रालय की पुस्तिका दोनों नाम एक ही अभ्यास के लिए साथ देती है, और इसकी मुख्य पहचान बताती है: बाईं और दाहिनी नासिका से बारी-बारी श्वास, कुंभक के बिना या उसके साथ। इसीलिए इस कोश में दोनों के लिए एक ही पृष्ठ है।
अनुलोम-विलोम कैसे करें?
आधुनिक अभ्यास
विधि आयुष के Common Yoga Protocol के अनुसार है। किसी भी सुखद आसन में बैठिए, रीढ़ और सिर सीधे, आँखें बंद, और कुछ गहरी साँसों से शरीर ढीला कीजिए।
- बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर ज्ञान मुद्रा में रखिए। दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा मोड़िए; अनामिका और छोटी उँगली बाईं नासिका पर, और अँगूठा दाहिनी नासिका पर रहेगा।
- बाईं नासिका खोलकर उससे साँस लीजिए।
- बाईं नासिका अनामिका और छोटी उँगली से बंद कीजिए, दाहिनी से अँगूठा हटाइए, और दाहिनी नासिका से साँस छोड़िए।
- अब दाहिनी नासिका से साँस लीजिए। साँस पूरी होने पर दाहिनी बंद करके बाईं खोलिए और उससे साँस छोड़िए। यह एक चक्र हुआ।
- ऐसे 4 चक्र और कीजिए।
साँस का अनुपात और गति
आधुनिक अभ्यास
शुरुआत में साँस लेने और छोड़ने का समय बराबर रखिए। धीरे-धीरे इसे 1:2 तक ले जाइए, यानी छोड़ना लेने से दुगना लंबा।
साँस धीमी, स्थिर और नियंत्रित हो; उस पर किसी तरह का ज़ोर या रुकावट न हो।
हठयोग प्रदीपिका में नाड़ी-शुद्धि
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका का वर्णन आज के प्रोटोकॉल से आगे का है। उसमें बाईं नासिका से साँस भरकर, उसे रोककर (कुंभक), दाहिनी से छोड़ने, फिर दाहिनी से भरकर, रोककर, बाईं से छोड़ने की बात है। ग्रंथ कहता है कि साँस धीरे छोड़ी जाए, ज़ोर से नहीं; और जिस नासिका से छोड़ी, उसी से फिर भरी जाए। ऐसे दाहिनी और बाईं नासिका से बारी-बारी अभ्यास करने से तीन महीने या उससे अधिक में अभ्यासी की सारी नाड़ियाँ शुद्ध हो जाती हैं। इस कुंभक वाले रूप को गुरु से ही सीखिए।
अनुलोम-विलोम नाम प्रदीपिका के श्लोकों में नहीं आता। Pancham Sinh के अनुवाद के साथ छपे दैनिक-अभ्यास वाले टिप्पण में बाईं (चंद्र) और फिर दाहिनी (सूर्य) नासिका से शुरू करने वाले इस क्रम को "अनुलोम और विलोम" कहा गया है।
घेरंड संहिता के सहित कुंभक में भी नासिकाएँ बारी-बारी बदली जाती हैं: बाईं से भरना, रोकना, दाहिनी से छोड़ना, फिर दाहिनी से भरना, रोकना, बाईं से छोड़ना। ग्रंथ उँगलियों का नियम भी देता है: दाहिनी नासिका अँगूठे से और बाईं अनामिका व छोटी उँगली से बंद की जाए, तर्जनी और मध्यमा कभी नहीं। आयुष की पुस्तिका भी तर्जनी और मध्यमा को मोड़कर यही हाथ-मुद्रा सिखाती है।
अनुलोम-विलोम का उद्देश्य
आयुष की पुस्तिका के अनुसार यह अभ्यास शांति लाता है, एकाग्रता में सहायक है, और तनाव व चिंता का स्तर घटाता है।
यह पारंपरिक और संस्थागत विवरण है। NCCIH के अनुसार योग के सामान्य अभ्यास में तनाव-प्रबंधन के लिए लाभ के संकेत मिले हैं, पर यह केवल इस एक अभ्यास की बात नहीं। यह किसी रोग का इलाज नहीं है।
अनुलोम-विलोम में क्या सावधानी रखें?
साँस मत रोकिए
आयुष के प्रोटोकॉल वाले अनुलोम-विलोम में साँस नहीं रोकी जाती। जब तक विशेष रूप से न कहा जाए, साँस रोकना नहीं है।
- पुराना रोग, हृदय की समस्या या गर्भावस्था हो तो पहले चिकित्सक या योग विशेषज्ञ से पूछिए।
- साँस पर ज़ोर डालने या चक्कर आने पर रुकिए और सामान्य साँस लीजिए।
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