भ्रामरी प्राणायाम

भौंरे की गुंजन जैसी ध्वनि के साथ श्वास छोड़ने का अभ्यास

संक्षेप में

भ्रामरी वह प्राणायाम है जिसमें साँस छोड़ते समय भौंरे जैसी गहरी गुंजन की जाती है। नाम भ्रमर, यानी काले भौंरे से बना है। हठयोग प्रदीपिका इसे आठ कुंभकों में गिनती है। आयुष मंत्रालय इसे ध्यान की तैयारी का उपयोगी अभ्यास बताता है।

सुखद आसन में बैठे साधक, आँखें बंद, भ्रामरी के लिए अँगूठों से कान बंद किए हुए

एक नज़र में

नाम का अर्थ
भ्रमर (काला भौंरा) से
बैठने की स्थिति
कोई भी सुखद आसन
शुरुआती अभ्यास
5 चक्र (Common Yoga Protocol)
ग्रंथों में
हठयोग प्रदीपिका 2.44, 2.68; घेरंड संहिता 5.46, 5.78–82
किन्हें नहीं
नाक या कान के संक्रमण में

भ्रामरी प्राणायाम क्या है?

शाम को किसी शांत बगीचे में भौंरे की धीमी गुंजन सुनी हो, तो आपने इस प्राणायाम की ध्वनि पहले ही सुन रखी है। अभ्यास करने वाला स्वयं वही गुंजन अपने भीतर पैदा करता है। इसलिए इसमें ध्यान अपने आप ध्वनि पर टिकने लगता है।

भ्रामरी प्राणायाम कैसे करें?

आधुनिक अभ्यास

आयुष मंत्रालय की पुस्तिका इसके दो रूप देती है। पहला सरल है, और शुरुआत उसी से कीजिए। किसी भी सुखद आसन में बैठकर आँखें बंद कर लीजिए।

  1. नाक से गहरी साँस भरिए।
  2. साँस को धीरे और नियंत्रित ढंग से छोड़ते हुए भौंरे जैसी गहरी, एक-सी गुंजन कीजिए। यह एक चक्र हुआ।
  3. इसे 4 बार और दोहराइए।

षण्मुखी मुद्रा के साथ भ्रामरी

आधुनिक अभ्यास

दूसरे रूप में गुंजन वही रहती है, बस हाथों से इंद्रियाँ ढक ली जाती हैं, जिससे ध्वनि भीतर सुनाई देती है। पुस्तिका इसे षण्मुखी मुद्रा कहती है। साँस भरने के बाद अँगूठों से कान, तर्जनी से आँखें, और अनामिका व छोटी उँगली से मुँह बंद कीजिए। मध्यमा नाक के पास रहे, पर नाक को बंद न करे। फिर गुंजन के साथ साँस छोड़िए और कुल 5 चक्र कीजिए।

ग्रंथों में भ्रामरी का वर्णन

ग्रंथ में

पुराने ग्रंथों की भ्रामरी आज के अभ्यास से कुछ अलग है, और यह जानना रोचक है। वहाँ इसे कुंभक कहा गया है। हठयोग प्रदीपिका में वायु को वेग से भरते और धीरे छोड़ते समय भृंग जैसी ध्वनि करने को कहा गया है।

घेरंड संहिता का वर्णन और भी अलग है। वहाँ रात्रि में, जहाँ जीवों की ध्वनि न हो, हाथों से कान बंद करके पूरक और कुंभक करने को कहा गया है, और इसका लक्ष्य भीतर की ध्वनियों को सुनना है।

घेरंड संहिता बताती है कि तब दाहिने कान में तरह-तरह के भीतरी नाद सुनाई देते हैं, एक क्रम में: पहले झींगुर जैसी ध्वनि, फिर वीणा, फिर गर्जन, फिर ढोल, फिर भौंरा, फिर घंटियाँ, फिर काँसे के घंटे, तुरही, नगाड़े, मृदंग, युद्ध के ढोल और दुंदुभि।

रोज़ के अभ्यास से ऐसे अनेक नाद पहचाने जाते हैं, और सबसे अंत में हृदय से उठने वाला अनाहत नाद सुनाई देता है। ग्रंथ कहता है कि उस नाद की एक गूँज है, उस गूँज में एक ज्योति है, और उसी ज्योति में मन को डुबोना चाहिए; मन के लीन होने पर वह विष्णु के परम पद को पाता है। भ्रामरी कुंभक में सफलता से समाधि में सफलता मिलती है।

Swami Sivananda प्रदीपिका और घेरंड, दोनों के रूप बताते हैं: पद्मासन या सिद्धासन में दोनों नासिकाओं से नर भौंरे जैसी ध्वनि के साथ तेज़ी से भरना और मादा भौंरे की गुंजन के साथ छोड़ना; और घेरंड वाला रूप, जिसमें दोनों अँगूठों से कान बंद करके, सहज जितना हो उतना रोककर, रात को शांत एकांत में अभ्यास किया जाता है, जिसमें भीतर के अनाहत नाद सुनाई देते हैं।

दो ग्रंथों में भ्रामरी
ग्रंथअभ्यासबताया गया फलस्रोत
हठयोग प्रदीपिकावेग से पूरक, धीमा रेचक, दोनों में ध्वनियोगियों के मन में आनंद की अवस्थाहठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 2.68
घेरंड संहितारात्रि में, कान बंद करके पूरक और कुंभकभीतर की ध्वनियाँ, अनाहत नाद, समाधिघेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 5.78–82
आयुष प्रोटोकॉलगहरी साँस, धीमा रेचक, गुंजनतनाव में राहत, ध्यान की तैयारीCommon Yoga Protocol (आयुष मंत्रालय), Bhramari, pp. 37–38

भ्रामरी का उद्देश्य और लाभ

आयुष मंत्रालय की पुस्तिका के अनुसार भ्रामरी तनाव कम करने में सहायक है, मन और तंत्रिका तंत्र पर शांत प्रभाव डालती है, और एकाग्रता व ध्यान की तैयारी के लिए उपयोगी है।

यह पारंपरिक और संस्थागत विवरण है, किसी रोग के इलाज का दावा नहीं। अमेरिकी NCCIH के अनुसार योग के सामान्य अभ्यास में तनाव-प्रबंधन के लिए लाभ के संकेत मिले हैं, पर यह केवल भ्रामरी की बात नहीं है। चिंता, अवसाद या उच्च रक्तचाप जैसी स्थिति में यह चिकित्सा का विकल्प नहीं है।

भ्रामरी में क्या सावधानी रखें?

किन्हें यह नहीं करना चाहिए

नाक या कान में संक्रमण हो तो यह अभ्यास न कीजिए।

  • पुराना रोग या हृदय की समस्या हो तो अभ्यास से पहले चिकित्सक या योग चिकित्सक से पूछिए।
  • गर्भावस्था में योग विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही अभ्यास कीजिए।
  • साँस को ज़ोर से न रोकिए। जब तक विशेष रूप से न कहा जाए, श्वास रोकना नहीं है, और ग्रंथों वाला कुंभक योग्य गुरु से ही सीखिए।

भ्रामरी की आम ग़लतियाँ

आधुनिक अभ्यास

  • गुंजन को ज़ोर से करना: ध्वनि गहरी और एक-सी हो, साँस धीरे और नियंत्रित निकले।
  • षण्मुखी में नाक बंद कर देना: मध्यमा उँगली नाक के पास रहे, उसे बंद न करे।
  • थकान या जल्दबाज़ी में करना: अभ्यास धीरे और शांत अवस्था में ही कीजिए।

आगे पढ़ें

  • अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन) — बारी-बारी नासिका से श्वास: आयुष प्रोटोकॉल और हठयोग प्रदीपिका
  • उज्जायी — गले से ध्वनि वाली श्वास: हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता का कुंभक
  • प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास
  • ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर

भ्रामरी प्राणायाम — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न