ध्यान की विधि (आयुष प्रोटोकॉल)
आधुनिक अभ्यास
- किसी भी सुखद आसन में बैठिए, और पीठ को सहज रूप से सीधा रखिए।
- हाथ ज्ञान मुद्रा में रखिए: अँगूठे का सिरा तर्जनी के सिरे से मिलाकर गोला बनाइए, बाकी तीन उँगलियाँ सीधी और ढीली। हथेलियाँ ऊपर की ओर जाँघों पर।
- हाथ और कंधे ढीले रखिए। आँखें बंद करके, चेहरा हल्का-सा ऊपर रखकर बैठिए।
- ज़ोर से एकाग्र होने की ज़रूरत नहीं। भौंहों के बीच हल्का ध्यान रखिए और श्वास के प्रति सजग रहिए।
- विचारों को घुलने दीजिए, और एक शुद्ध विचार पर टिकने का प्रयास कीजिए।
गीता क्या कहती है?
ग्रंथ में
गीता ध्यान के लिए शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और स्थिर रखने को कहती है। और वह एक बात कहती है जो हर शुरुआती के काम की है: धीरे-धीरे, धैर्य से पकड़ी बुद्धि के साथ उपराम हो, और मन को आत्मा में टिकाकर कुछ और न सोचे।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से उसे रोककर आत्मा के ही वश में ले आओ।
रोज़ का ध्यान कैसे बनाएँ?
एक बात पहले
नीचे के सुझाव ग्रंथों से निकली हमारी सरल व्याख्या हैं, किसी ग्रंथ की शब्दशः विधि नहीं।
- रोज़ एक ही समय और एक ही जगह चुनिए; सूत्र कहता है कि अभ्यास निरंतरता से दृढ़ होता है।
- कुछ मिनट से शुरू कीजिए। गीता "धीरे-धीरे" की बात करती है, एक दिन में सब पाने की नहीं।
- मन भटके तो खीझिए नहीं; उसे लौटाना ही अभ्यास है।
गीता के छठे अध्याय की पूरी विधि
ग्रंथ में
गीता के अनुसार ध्यान करने वाला एकांत में, अकेला रहकर, मन और शरीर को वश में रखकर, कोई आशा और संग्रह न रखते हुए, अपने को निरंतर योग में लगाए।
आसन के बारे में गीता कहती है: किसी स्वच्छ जगह पर, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा, अपना आसन दृढ़ता से जमाए, जिस पर कपड़ा, मृगछाला और कुश बिछे हों। उस आसन पर बैठकर, मन को एक बिंदु पर लगाकर, मन और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में करके आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
शरीर, सिर और गर्दन को सम और अचल रखकर, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्र भाग को देखते हुए, इधर-उधर न देखते हुए; शांत मन से, भय-रहित होकर, ब्रह्मचारी के नियम में रहकर, मन को रोककर भगवान में लगाकर, उन्हें ही परम लक्ष्य मानकर बैठे। Telang की टिप्पणी के अनुसार नासाग्र पर दृष्टि इसलिए कि दृष्टि भटके नहीं; आँखें पूरी बंद करने से नींद आने का डर रहता है।
ऐसे निरंतर अभ्यास से मन वश में रखने वाला योगी वह शांति पाता है जो मुक्ति में परिणत होती है।
संतुलन पर गीता की बात हर शुरुआती के काम की है: योग न बहुत खाने वाले का है, न बिल्कुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का, न सदा जागने वाले का। दुखों को नष्ट करने वाला योग उसी का है जिसका भोजन और विहार उचित है, जो सब कामों में उचित परिश्रम करता है, और उचित समय पर सोता और जागता है।
ध्यान की अवस्था के लिए गीता की प्रसिद्ध उपमा: जैसे बिना हवा वाली जगह में रखा दीपक नहीं काँपता, वैसा ही मन को वश में किए योगी का चित्त है।
जिस अवस्था में अभ्यास से रोका गया मन शांत हो जाता है, जिसमें अपने से अपने को देखकर साधक अपने में ही संतुष्ट रहता है, जिसमें इंद्रियों से परे का, केवल बुद्धि से पकड़ में आने वाला अनंत सुख मिलता है, जिसे पाकर वह सत्य से नहीं डिगता और बड़े दुख से भी नहीं हिलता, दुख के संयोग से उस वियोग को योग जानना चाहिए। गीता कहती है कि यह योग दृढ़ता से और बिना हताश हुए करना चाहिए।
अर्जुन कहते हैं कि मन चंचल, उद्दंड, बलवान और हठी है, और उसे रोकना वायु को रोकने जितना कठिन है। भगवान मानते हैं कि मन सचमुच कठिनाई से वश में होता है, पर कहते हैं कि निरंतर अभ्यास और वैराग्य से उसे रोका जा सकता है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् में ध्यान की जगह और शरीर
ग्रंथ में
श्वेताश्वतर उपनिषद् कहता है कि बुद्धिमान व्यक्ति शरीर के तीन ऊँचे भागों, छाती, गर्दन और सिर, को सम रखे, और इंद्रियों को मन के साथ हृदय की ओर मोड़े; तब वह ब्रह्म की नाव से भय देने वाली सब धाराओं को पार कर लेता है।
श्वासों को संयत करके, सब हलचलों को वश में करके, वह नाक से धीमी साँस छोड़े; और जैसे दुष्ट घोड़ों से जुते रथ को सँभाला जाता है, वैसे ही बिना चूके मन को रोके।
अभ्यास की जगह के लिए उपनिषद् कहता है: समतल, स्वच्छ, कंकड़, आग और धूल से रहित, जहाँ की आवाज़ें, पानी और कुंज मन को भाएँ, आँखों को न चुभे, और जहाँ आश्रय और गुफाएँ हों।
उपनिषद् के अनुसार योग के आरंभ में ब्रह्म के प्रकट होने से पहले धुंध भरा धुआँ, सूर्य, अग्नि, वायु, जुगनू, बिजली, स्फटिक और चंद्रमा जैसे रूप दिखते हैं। योग के पहले फल ये बताए गए हैं: हल्कापन, आरोग्य, स्थिरता, अच्छा रंग, स्वर की मधुरता, अच्छी गंध और मल-मूत्र की कमी।
उपनिषद् की उपमा: जैसे धूल से मैला हुआ धातु का दर्पण साफ़ करने पर फिर चमक उठता है, वैसे ही देहधारी आत्मा का सच्चा स्वरूप देखकर संतुष्ट और शोक-रहित हो जाता है।
ध्यान में क्या सावधानी रखें?
ध्यान चिकित्सा का विकल्प नहीं
ध्यान को किसी रोग के इलाज की जगह, या चिकित्सक से मिलने में देर का कारण मत बनाइए।
- ध्यान में जोखिम आम तौर पर कम माने जाते हैं, पर इसकी सुरक्षा पर कम ही अध्ययन हुए हैं, इसलिए पक्का कुछ नहीं कहा जा सकता।
- 2020 की एक समीक्षा में 83 में से 55 अध्ययनों ने ध्यान से जुड़े नकारात्मक अनुभव दर्ज किए; सबसे आम चिंता और अवसाद थे। अभ्यास में बेचैनी बढ़े तो रुकिए और किसी अनुभवी से बात कीजिए।
- जिनसे सीख रहे हैं, उनके प्रशिक्षण और अनुभव के बारे में पूछिए।
आगे पढ़ें
- श्वास ध्यान — साँस के सहारे मन को टिकाना: योगसूत्र, गीता और आज का अभ्यास
- मंत्र ध्यान — ॐ पर ध्यान: योगसूत्र और मुण्डक उपनिषद् में
- ध्यान योग — भगवद्गीता का छठा अध्याय: मन को एक जगह टिकाने का मार्ग
- अभ्यास और वैराग्य — मन को थामने की दो चाबियाँ: योगसूत्र और गीता दोनों में

