चित्त और वृत्ति का अर्थ
ग्रंथ में
किसी शांत झील पर हवा चले तो उसमें लहरें उठती हैं, और तब पानी में तल दिखना बंद हो जाता है। योगसूत्र मन को इसी तरह देखता है। जब वृत्तियाँ शांत होती हैं, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में ठहरता है; और बाकी समय वह वृत्तियों जैसा ही हो जाता है।
सूत्र कहता है कि वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं, और हर वृत्ति क्लिष्ट (दुख देने वाली) या अक्लिष्ट (दुख न देने वाली) हो सकती है।
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।
वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥बाकी समय (द्रष्टा) वृत्तियों के समान रूप वाला होता है।
पाँच वृत्तियाँ कौन-सी हैं?
ग्रंथ में
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति (ये पाँच वृत्तियाँ हैं)।
| वृत्ति | सूत्र के अनुसार अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| प्रमाण | सही ज्ञान; उसके साधन प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम | पतंजलि योगसूत्र, 1.7 |
| विपर्यय | मिथ्या ज्ञान, जो वस्तु के असली रूप पर टिका न हो | पतंजलि योगसूत्र, 1.8 |
| विकल्प | शब्द से बना ज्ञान, जिसके पीछे कोई वस्तु न हो | पतंजलि योगसूत्र, 1.9 |
| निद्रा | अभाव के अनुभव पर टिकी वृत्ति | पतंजलि योगसूत्र, 1.10 |
| स्मृति | अनुभव किए विषय का न छूटना | पतंजलि योगसूत्र, 1.11 |
वृत्ति-निरोध का क्या अर्थ है?
ग्रंथ में
ध्यान देने वाली बात है कि निद्रा और स्मृति भी वृत्तियाँ हैं। यानी योग का अर्थ केवल बुरे विचार रोकना नहीं, मन की हर लहर को शांत करना है। इसका उपाय सूत्र तुरंत देता है: अभ्यास और वैराग्य।
चित्त की पाँच भूमियाँ
ग्रंथ में
पहले सूत्र के भाष्य में व्यास चित्त की पाँच अवस्थाएँ (भूमियाँ) बताते हैं: क्षिप्त (बेचैन), मूढ़ (मोह और जड़ता से भरा), विक्षिप्त (कभी स्थिर, कभी भटकता), एकाग्र (एक विषय पर टिका), और निरुद्ध (सब वृत्तियाँ रुकी हुई)।
भाष्य के अनुसार पहली दो भूमियों का योग से कोई संबंध नहीं, और विक्षिप्त चित्त में भी एकाग्रता बीच-बीच में भटकाव से दब जाती है, इसलिए उसे ठीक से योग नहीं कहा जा सकता। एकाग्र चित्त की वह अवस्था योग है जो किसी वास्तविक विषय को पूरी तरह प्रकाशित करती है, क्लेशों को घटाती है, कर्म के बंधन ढीले करती है, और सब वृत्तियों के निरोध को अपना लक्ष्य बनाती है।
आगे पढ़ें
- अभ्यास और वैराग्य — मन को थामने की दो चाबियाँ: योगसूत्र और गीता दोनों में
- पाँच क्लेश — दुख की जड़: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश
- योग दर्शन — पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य
- योग क्या है? — योग शब्द का अर्थ, उसकी परिभाषाएँ और उसका उद्देश्य
