यम

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह: भाष्य के अनुसार

संक्षेप में

यम अष्टांग योग का पहला अंग है, और इसके पाँच भाग हैं: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। भाष्य के अनुसार अहिंसा सबकी जड़ है, और बाकी यम-नियम उसी को पूरा करने के लिए हैं। बिना अपवाद के पाले जाएँ तो ये महाव्रत कहलाते हैं।

एक नज़र में

मूल सूत्र
योगसूत्र 2.30
मूल यम
अहिंसा (2.30 पर भाष्य)
महाव्रत
जाति, देश, काल, समय से न बँधे यम (2.31)
विरोधी विचार
प्रतिपक्ष-भावना (2.33)

भाष्य के अनुसार पाँच यम

परंपरा

सूत्र केवल नाम देता है; अर्थ भाष्य खोलता है। उसका पहला वाक्य ही दिशा तय कर देता है: अहिंसा का अर्थ है सब प्राणियों के प्रति हर तरह से और हर समय द्रोह न रखना। और बाकी यम और नियम उसी अहिंसा में जड़ें रखते हैं, उसी को पूरा करने के लिए हैं।

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये यम हैं।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.30
पाँच यम (व्यास-भाष्य के अनुसार)
यमभाष्य का अर्थस्रोत
अहिंसासब प्राणियों के प्रति हर तरह से, हर समय द्रोह का अभावयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य
सत्यवाणी और मन वैसे हों जैसा देखा, अनुमान किया या सुना; और वाणी सबके हित में हो, किसी के विनाश के लिए नहींयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य
अस्तेयदूसरे की वस्तु को बिना अधिकार लेने से बचना, लोभ के बिनायोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य
ब्रह्मचर्यगुप्त इंद्रिय का संयमयोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य
अपरिग्रहसंग्रह के दोष देखकर वस्तुओं को न अपनानायोग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य

सत्य केवल सच बोलना नहीं

परंपरा

भाष्य का सत्य पर विचार आज भी उतना ही काम का है। वह कहता है कि बात धोखा देने वाली, भ्रमित करने वाली या अर्थहीन न हो, और सबके हित के लिए कही जाए। अगर कोई सच केवल किसी प्राणी के विनाश के लिए बोला जाए, तो वह सत्य नहीं रहता। इसलिए पहले सोचो कि सबका हित किसमें है, फिर बोलो।

महाव्रत और विरोधी विचार

ग्रंथ में

सूत्र कहता है कि जब ये यम जाति, स्थान, समय और परिस्थिति से बँधे बिना सब जगह पाले जाएँ, तब वे महाव्रत कहलाते हैं।

और जब मन में हिंसा जैसे विरोधी विचार उठें, तो उपाय है उनके उलटे भाव का चिंतन। सूत्र यह भी याद दिलाता है कि ऐसे विचार चाहे खुद किए हों, करवाए हों या केवल समर्थन किया हो, उनका फल अनंत दुख और अज्ञान है।

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥

जब विरोधी विचार बाधा दें, तो उनके विपरीत भाव का चिंतन करें।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.33

यमों का फल

ग्रंथ में

हर यम में दृढ़ होने पर (सूत्रों के अनुसार)
यमसूत्र का कथनस्रोत
अहिंसाउसके पास वैर छूट जाता हैपतंजलि योगसूत्र, 2.35
सत्यकर्म और फल उसकी वाणी के आश्रित होते हैंपतंजलि योगसूत्र, 2.36
अस्तेयसब रत्न उसके सामने उपस्थित होते हैंपतंजलि योगसूत्र, 2.37
ब्रह्मचर्यवीर्य (शक्ति) का लाभपतंजलि योगसूत्र, 2.38
अपरिग्रहजन्म के कारण का बोधपतंजलि योगसूत्र, 2.39

हठ ग्रंथों में दस यम

ग्रंथ में

योगसूत्र पाँच यम देता है, पर हठयोग प्रदीपिका दस गिनाती है: अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, क्षमा, धैर्य, दया, आर्जव (नम्रता, सरलता), मिताहार और शौच।

योगतत्त्व उपनिषद् यमों में एक को सबसे मुख्य कहता है: लघ्वाहार, यानी हल्का भोजन; और कहता है कि दूसरा कोई उसके बराबर मुख्य नहीं।

आगे पढ़ें

  • नियम — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान: भाष्य के अनुसार
  • अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
  • प्रत्याहार — इंद्रियों को भीतर समेटना: बाहरी और भीतरी साधना के बीच का पुल
  • योग दर्शन — पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य

यम — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न