भाष्य के अनुसार पाँच यम
परंपरा
सूत्र केवल नाम देता है; अर्थ भाष्य खोलता है। उसका पहला वाक्य ही दिशा तय कर देता है: अहिंसा का अर्थ है सब प्राणियों के प्रति हर तरह से और हर समय द्रोह न रखना। और बाकी यम और नियम उसी अहिंसा में जड़ें रखते हैं, उसी को पूरा करने के लिए हैं।
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये यम हैं।
| यम | भाष्य का अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| अहिंसा | सब प्राणियों के प्रति हर तरह से, हर समय द्रोह का अभाव | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य |
| सत्य | वाणी और मन वैसे हों जैसा देखा, अनुमान किया या सुना; और वाणी सबके हित में हो, किसी के विनाश के लिए नहीं | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य |
| अस्तेय | दूसरे की वस्तु को बिना अधिकार लेने से बचना, लोभ के बिना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य |
| ब्रह्मचर्य | गुप्त इंद्रिय का संयम | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य |
| अपरिग्रह | संग्रह के दोष देखकर वस्तुओं को न अपनाना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.30 पर भाष्य |
सत्य केवल सच बोलना नहीं
परंपरा
भाष्य का सत्य पर विचार आज भी उतना ही काम का है। वह कहता है कि बात धोखा देने वाली, भ्रमित करने वाली या अर्थहीन न हो, और सबके हित के लिए कही जाए। अगर कोई सच केवल किसी प्राणी के विनाश के लिए बोला जाए, तो वह सत्य नहीं रहता। इसलिए पहले सोचो कि सबका हित किसमें है, फिर बोलो।
महाव्रत और विरोधी विचार
ग्रंथ में
सूत्र कहता है कि जब ये यम जाति, स्थान, समय और परिस्थिति से बँधे बिना सब जगह पाले जाएँ, तब वे महाव्रत कहलाते हैं।
और जब मन में हिंसा जैसे विरोधी विचार उठें, तो उपाय है उनके उलटे भाव का चिंतन। सूत्र यह भी याद दिलाता है कि ऐसे विचार चाहे खुद किए हों, करवाए हों या केवल समर्थन किया हो, उनका फल अनंत दुख और अज्ञान है।
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥जब विरोधी विचार बाधा दें, तो उनके विपरीत भाव का चिंतन करें।
यमों का फल
ग्रंथ में
| यम | सूत्र का कथन | स्रोत |
|---|---|---|
| अहिंसा | उसके पास वैर छूट जाता है | पतंजलि योगसूत्र, 2.35 |
| सत्य | कर्म और फल उसकी वाणी के आश्रित होते हैं | पतंजलि योगसूत्र, 2.36 |
| अस्तेय | सब रत्न उसके सामने उपस्थित होते हैं | पतंजलि योगसूत्र, 2.37 |
| ब्रह्मचर्य | वीर्य (शक्ति) का लाभ | पतंजलि योगसूत्र, 2.38 |
| अपरिग्रह | जन्म के कारण का बोध | पतंजलि योगसूत्र, 2.39 |
हठ ग्रंथों में दस यम
ग्रंथ में
योगसूत्र पाँच यम देता है, पर हठयोग प्रदीपिका दस गिनाती है: अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, क्षमा, धैर्य, दया, आर्जव (नम्रता, सरलता), मिताहार और शौच।
योगतत्त्व उपनिषद् यमों में एक को सबसे मुख्य कहता है: लघ्वाहार, यानी हल्का भोजन; और कहता है कि दूसरा कोई उसके बराबर मुख्य नहीं।
आगे पढ़ें
- नियम — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान: भाष्य के अनुसार
- अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
- प्रत्याहार — इंद्रियों को भीतर समेटना: बाहरी और भीतरी साधना के बीच का पुल
- योग दर्शन — पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य
