कैवल्य का अर्थ क्या है?
ग्रंथ में
"केवल" शब्द से बना कैवल्य अकेलेपन का अर्थ देता है, पर यहाँ अकेलापन दुख नहीं, मुक्ति है। सूत्र के अनुसार दुख का कारण द्रष्टा और दृश्य का संयोग है। जब अविद्या मिटने से यह संयोग नहीं रहता, तब उसे हान, यानी त्याग, और द्रष्टा का कैवल्य कहा जाता है।
तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम्॥उस (अविद्या) के अभाव से संयोग का अभाव होता है; यही हान है, और यही द्रष्टा का कैवल्य है।
विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥अडिग विवेक-ख्याति ही हान का उपाय है।
कैवल्य तक कैसे पहुँचते हैं?
ग्रंथ में
कैवल्य पाद एक सुंदर चित्र देता है: जो भेद को देख लेता है, उसकी "मैं क्या हूँ" वाली भावना शांत हो जाती है, और तब चित्त विवेक की ओर झुककर कैवल्य की ओर बहने लगता है।
सूत्र के अनुसार जो सबसे ऊँचे ज्ञान में भी कोई लाभ नहीं चाहता, उसे पूर्ण विवेक-ख्याति से धर्ममेघ समाधि मिलती है।
तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥तब चित्त विवेक की ओर झुका हुआ और कैवल्य की ओर बहता हुआ होता है।
योगसूत्र का अंतिम सूत्र
ग्रंथ में
योगसूत्र का अंतिम सूत्र कैवल्य की दो परिभाषाएँ एक साथ देता है। जब गुणों के पास पुरुष के लिए करने को कुछ न बचे और वे अपने कारण में लौट जाएँ, वह कैवल्य है। या फिर, चिति-शक्ति का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना कैवल्य है। इसी के साथ ग्रंथ समाप्त होता है।
धर्ममेघ समाधि और कैवल्य
ग्रंथ में
कैवल्य पाद बताता है कि विवेक की अवस्था में भी बीच-बीच के छिद्रों में पुराने संस्कारों से दूसरे प्रत्यय उठते हैं, और उन्हें क्लेशों की तरह ही हटाना होता है।
जो प्रसंख्यान (ऊँचे विवेक-ज्ञान) में भी कोई लाभ नहीं चाहता, उसे सब तरह की विवेक-ख्याति से धर्ममेघ समाधि मिलती है; उससे क्लेश और कर्म निवृत्त होते हैं।
तब सब आवरण और मल से मुक्त हुए ज्ञान के अनंत होने से जानने योग्य थोड़ा रह जाता है; और कृतार्थ हुए गुणों का परिणाम-क्रम समाप्त हो जाता है। सूत्र क्रम को क्षणों से जुड़ा, परिणाम के अंत में पकड़ में आने वाला बताता है।
विभूति पाद भी कैवल्य की बात करता है: सिद्धियों से भी वैराग्य होने पर दोषों का बीज नष्ट होता है और कैवल्य मिलता है; और सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष की शुद्धि बराबर होने पर कैवल्य होता है।
आगे पढ़ें
- कर्म और संस्कार — योगसूत्र में कर्माशय, उसका फल, और योगी का कर्म
- पाँच क्लेश — दुख की जड़: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश
- योग दर्शन — पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य
- धारणा, ध्यान और समाधि — योगसूत्र के तीन अंतरंग अंग, और उनका अंतर
