कैवल्य

योग का अंतिम लक्ष्य: द्रष्टा का अपने स्वरूप में ठहरना

संक्षेप में

कैवल्य योगसूत्र में योग का अंतिम लक्ष्य है। सूत्र के अनुसार द्रष्टा और दृश्य का संयोग ही दुख का कारण है, और उस संयोग का न रहना कैवल्य है। इसका उपाय अडिग विवेक-ख्याति है। अंतिम सूत्र इसे चिति-शक्ति का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना कहता है।

एक नज़र में

परिभाषा
संयोग का अभाव, द्रष्टा का कैवल्य (2.25)
उपाय
अविप्लव विवेक-ख्याति (2.26)
पहले की अवस्था
धर्ममेघ समाधि (4.29)
अंतिम सूत्र
4.34

कैवल्य का अर्थ क्या है?

ग्रंथ में

"केवल" शब्द से बना कैवल्य अकेलेपन का अर्थ देता है, पर यहाँ अकेलापन दुख नहीं, मुक्ति है। सूत्र के अनुसार दुख का कारण द्रष्टा और दृश्य का संयोग है। जब अविद्या मिटने से यह संयोग नहीं रहता, तब उसे हान, यानी त्याग, और द्रष्टा का कैवल्य कहा जाता है।

तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम्॥

उस (अविद्या) के अभाव से संयोग का अभाव होता है; यही हान है, और यही द्रष्टा का कैवल्य है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.25
विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥

अडिग विवेक-ख्याति ही हान का उपाय है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 2.26

कैवल्य तक कैसे पहुँचते हैं?

ग्रंथ में

कैवल्य पाद एक सुंदर चित्र देता है: जो भेद को देख लेता है, उसकी "मैं क्या हूँ" वाली भावना शांत हो जाती है, और तब चित्त विवेक की ओर झुककर कैवल्य की ओर बहने लगता है।

सूत्र के अनुसार जो सबसे ऊँचे ज्ञान में भी कोई लाभ नहीं चाहता, उसे पूर्ण विवेक-ख्याति से धर्ममेघ समाधि मिलती है।

तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥

तब चित्त विवेक की ओर झुका हुआ और कैवल्य की ओर बहता हुआ होता है।

— पातञ्जलयोगसूत्राणि (Ānandāśrama Sanskrit Series 47), GRETIL पाठ, योगसूत्र 4.26

योगसूत्र का अंतिम सूत्र

ग्रंथ में

योगसूत्र का अंतिम सूत्र कैवल्य की दो परिभाषाएँ एक साथ देता है। जब गुणों के पास पुरुष के लिए करने को कुछ न बचे और वे अपने कारण में लौट जाएँ, वह कैवल्य है। या फिर, चिति-शक्ति का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना कैवल्य है। इसी के साथ ग्रंथ समाप्त होता है।

धर्ममेघ समाधि और कैवल्य

ग्रंथ में

कैवल्य पाद बताता है कि विवेक की अवस्था में भी बीच-बीच के छिद्रों में पुराने संस्कारों से दूसरे प्रत्यय उठते हैं, और उन्हें क्लेशों की तरह ही हटाना होता है।

जो प्रसंख्यान (ऊँचे विवेक-ज्ञान) में भी कोई लाभ नहीं चाहता, उसे सब तरह की विवेक-ख्याति से धर्ममेघ समाधि मिलती है; उससे क्लेश और कर्म निवृत्त होते हैं।

तब सब आवरण और मल से मुक्त हुए ज्ञान के अनंत होने से जानने योग्य थोड़ा रह जाता है; और कृतार्थ हुए गुणों का परिणाम-क्रम समाप्त हो जाता है। सूत्र क्रम को क्षणों से जुड़ा, परिणाम के अंत में पकड़ में आने वाला बताता है।

विभूति पाद भी कैवल्य की बात करता है: सिद्धियों से भी वैराग्य होने पर दोषों का बीज नष्ट होता है और कैवल्य मिलता है; और सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष की शुद्धि बराबर होने पर कैवल्य होता है।

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कैवल्य — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न