कर्माशय क्या है?
ग्रंथ में
हम जो भी करते हैं, वह खत्म होकर भी पूरी तरह खत्म नहीं होता; मन में उसकी छाप रह जाती है। सूत्र कहता है कि कर्माशय की जड़ क्लेश हैं, और उसका फल इसी जन्म में भी मिल सकता है और आगे के जन्म में भी।
जब तक जड़ बनी है, तब तक इसका पकना जाति, आयु और भोग के रूप में होता है। और ये फल सुख या दुख देने वाले होते हैं, क्योंकि उनके कारण पुण्य या अपुण्य होते हैं।
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः॥जड़ के रहते उसका फल जाति, आयु और भोग के रूप में होता है।
संस्कार और वासना
ग्रंथ में
कैवल्य पाद बताता है कि कर्म के अनुसार ही वे वासनाएँ प्रकट होती हैं जो उस फल के योग्य हैं। और सूत्र कहता है कि जन्म, स्थान और समय के अंतर से भी इनका क्रम नहीं टूटता, क्योंकि स्मृति और संस्कार एक ही रूप के हैं।
योगी का कर्म अलग क्यों है?
ग्रंथ में
सूत्र का एक कथन बहुत गहरा है: योगी का कर्म न शुक्ल (पुण्य) होता है, न कृष्ण (पाप); दूसरों का कर्म तीन प्रकार का होता है। इसका भाव गीता के अनासक्त कर्म से मिलता-जुलता है, जहाँ फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करने की बात है।
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्॥योगी का कर्म न शुक्ल है न कृष्ण; दूसरों का कर्म तीन प्रकार का होता है।
संस्कार और पिछले जन्म
ग्रंथ में
विभूति पाद के अनुसार संस्कारों का साक्षात्कार करने से पिछले जन्म का ज्ञान होता है।
कैवल्य पाद कहता है कि वासनाएँ अनादि हैं, क्योंकि जीने की इच्छा नित्य है। पर वे कारण, फल, आश्रय और आलंबन से बँधी हुई हैं, इसलिए इनके न रहने पर वासनाएँ भी नहीं रहतीं।
समाधि पाद के अनुसार ऋतंभरा प्रज्ञा से पैदा हुआ संस्कार दूसरे संस्कारों को रोकता है; यानी योग में संस्कार से ही संस्कार का अंत होता है।
आगे पढ़ें
- पाँच क्लेश — दुख की जड़: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश
- कैवल्य — योग का अंतिम लक्ष्य: द्रष्टा का अपने स्वरूप में ठहरना
- कर्म योग — काम छोड़ना नहीं, काम से बँधना छोड़ना: भगवद्गीता का मार्ग
- योग दर्शन — पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य
