भाष्य के अनुसार पाँच नियम
परंपरा
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, ये नियम हैं।
| नियम | भाष्य का अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|
| शौच | बाहरी: मिट्टी, जल आदि से और शुद्ध आहार से; भीतरी: चित्त के मल को धोना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.32 पर भाष्य |
| संतोष | जो साधन पास हैं, उनसे अधिक की लालसा न करना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.32 पर भाष्य |
| तप | भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी जैसे द्वंद्वों को सहना, और व्रत | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.32 पर भाष्य |
| स्वाध्याय | मोक्ष के शास्त्रों का अध्ययन, या प्रणव का जप | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.32 पर भाष्य |
| ईश्वर-प्रणिधान | सब कर्मों को परम गुरु ईश्वर को अर्पित करना | योग-सूत्र, भाष्य और टीका (Woods अनु.), सूत्र 2.32 पर भाष्य |
तीन नियम, जो क्रिया योग भी हैं
ग्रंथ में
इनमें से अंतिम तीन, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, साधन पाद के पहले सूत्र में क्रिया योग के नाम से भी आते हैं। सूत्र के अनुसार क्रिया योग समाधि की भावना और क्लेशों को कमज़ोर करने के लिए है।
तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान क्रिया योग हैं।
नियमों का फल
ग्रंथ में
शौच का एक और फल भी सूत्र बताता है: चित्त की शुद्धि, प्रसन्नता, एकाग्रता, इंद्रियों पर विजय और आत्म-दर्शन की योग्यता।
संतोषादनुत्तमः सुखलाभः॥संतोष से सबसे उत्तम सुख मिलता है।
| नियम | सूत्र का कथन | स्रोत |
|---|---|---|
| शौच | अपने शरीर से विरक्ति और दूसरों के संसर्ग से दूरी | पतंजलि योगसूत्र, 2.40 |
| संतोष | सबसे उत्तम सुख की प्राप्ति | पतंजलि योगसूत्र, 2.42 |
| तप | अशुद्धि के क्षय से शरीर और इंद्रियों की सिद्धि | पतंजलि योगसूत्र, 2.43 |
| स्वाध्याय | इष्ट देवता से संयोग | पतंजलि योगसूत्र, 2.44 |
| ईश्वर-प्रणिधान | समाधि की सिद्धि | पतंजलि योगसूत्र, 2.45 |
हठ ग्रंथों में दस नियम
ग्रंथ में
योगसूत्र पाँच नियम देता है, पर हठयोग प्रदीपिका योग जानने वालों के बताए दस नियम गिनाती है: तप, संतोष, आस्तिकता (ईश्वर में विश्वास), दान, ईश्वर-पूजा, सिद्धांत-वचनों का श्रवण, ह्री (गलत काम पर लज्जा), मति (बुद्धि), जप और यज्ञ।
योगतत्त्व उपनिषद् नियमों में अहिंसा को मुख्य कहता है, जबकि योगसूत्र अहिंसा को यमों में पहला रखता है।
योगसूत्र के तीन नियम, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, अलग से क्रियायोग भी कहलाते हैं, जिसका उद्देश्य समाधि की भावना और क्लेशों को पतला करना है।
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- यम — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह: भाष्य के अनुसार
- अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
- जप साधना — यज्ञों में जप-यज्ञ: गीता, योगसूत्र और भाष्य के अनुसार
- योग दर्शन — पतंजलि का योग: चित्त, क्लेश, कर्म और कैवल्य
